Ranchi : झारखंड में होने वाला राज्यसभा चुनाव सिर्फ एक संसदीय प्रक्रिया नहीं, बल्कि महागठबंधन के भीतर शक्ति संतुलन की बड़ी परीक्षा बनता जा रहा है.जेएमएम और कांग्रेस के बीच सीट शेयरिंग को लेकर खींचतान तेज है. चर्चा है कि जेएमएम दोनों सीटों पर अपना दावा मजबूत रखना चाहती है, जबकि कांग्रेस कम से कम एक सीट चाहती है.राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो यह विवाद अचानक पैदा नहीं हुआ. असम विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस ने जेएमएम को अपेक्षित महत्व नहीं दिया था। अब जेएमएम उसी राजनीतिक संदेश का जवाब देने की कोशिश कर सकती है.
अगर कांग्रेस को सीट नहीं मिलती है, तो उसके सामने दो विकल्प होंगे—या तो गठबंधन में रहकर समझौता करे, या राजनीतिक दबाव बनाने के लिए आक्रामक रुख अपनाए. हालांकि सरकार गिराने जैसा फैसला कांग्रेस के लिए भी आसान नहीं होगा.झारखंड विधानसभा की वर्तमान संख्या को देखते हुए दोनों दलों की मजबूरी भी एक-दूसरे से जुड़ी हुई है. इसलिए टकराव के बावजूद समझौते की संभावना पूरी तरह खत्म नहीं मानी जा रही।लेकिन इतना तय है कि राज्यसभा चुनाव ने महागठबंधन के भीतर छिपी असहजता को खुलकर सामने ला दिया है.
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महागठबंधन के पास संख्या बल पूरा, लेकिन तालमेल में बड़ी कमी
राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन प्रक्रिया शुरू हो चुकी है.राज्य की दो सीटों पर चुनाव होना है और 8 जून नामांकन की अंतिम तारीख तय की गई है. इसी के साथ महागठबंधन के भीतर राजनीतिक हलचल भी तेज हो गई है.विधानसभा में 34 विधायकों के साथ जेएमएम यानी झारखंड मुक्ति मोर्चा सबसे बड़ी पार्टी है. राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए 28 विधायकों के समर्थन की जरूरत होती है.
ऐसे में जेएमएम की एक सीट पर जीत लगभग तय मानी जा रही है. इसके बाद पार्टी के पास 6 अतिरिक्त वोट बचेंगे।अब सबसे बड़ा सवाल दूसरी सीट को लेकर खड़ा हो गया है. महागठबंधन की ओर से यह सीट किस दल को मिलेगी, इस पर अब तक स्पष्ट तस्वीर सामने नहीं आई है.कांग्रेस दूसरी सीट के लिए पूरा जोर लगा रही है. पार्टी ने प्रणव झा को उम्मीदवार बनाया है, लेकिन मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की ओर से अभी तक औपचारिक सहमति नहीं मिली है.
महागठबंधन के पास कुल 58 विधायक हैं। संख्या बल के हिसाब से गठबंधन दोनों सीटें आसानी से जीत सकता है. लेकिन इसके लिए सभी सहयोगी दलों के बीच बेहतर तालमेल और समन्वय जरूरी होगा.फिलहाल गठबंधन के भीतर जिस तरह की खींचतान दिखाई दे रही है, उसने राजनीतिक चर्चाओं को और तेज कर दिया है.
महागठबंधन में बढ़ी खटास! राजद ने जताई नाराजगी
चुनाव को लेकर महागठबंधन के भीतर असंतोष खुलकर सामने आने लगा है. गठबंधन में शामिल राष्ट्रीय जनता दल यानी RJD ने नाराजगी जताते हुए कहा है कि अब तक जेएमएम या कांग्रेस की ओर से उनसे कोई सलाह-मशविरा नहीं किया गया है.राजद के झारखंड विधानसभा में चार विधायक हैं. बुधवार को पार्टी विधायकों की बैठक हुई, जिसमें राज्यसभा चुनाव को लेकर चर्चा की गई. बैठक के बाद विधायकों ने कहा कि वे महागठबंधन का हिस्सा हैं, लेकिन उन्हें पूरी प्रक्रिया से अलग रखा जा रहा है.
राजद नेताओं ने कहा कि ऐसा महसूस हो रहा है जैसे पार्टी को साइडलाइन करने की कोशिश की जा रही है. हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अंतिम फैसला लालू प्रसाद यादव के निर्देश के अनुसार ही लिया जाएगा।उधर, भाकपा माले ने भी इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया दी है. माले के दो विधायक हैं और पार्टी ने मांग की है कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन जल्द से जल्द महागठबंधन की बैठक बुलाएं ताकि राज्यसभा चुनाव को लेकर साझा रणनीति तय की जा सके.राज्यसभा चुनाव से पहले सहयोगी दलों की नाराजगी ने महागठबंधन की अंदरूनी राजनीति को और गर्म कर दिया है.
महागठबंधन में कांग्रेस की कोशिशें जारी, लेकिन सहमति दूर
महागठबंधन के भीतर राजनीतिक गणित को जटिल बना दिया है. खासकर कांग्रेस के लिए यह चुनाव रणनीतिक चुनौती बनता जा रहा है.विधानसभा में कांग्रेस के पास 16 विधायक हैं, जबकि राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए 28 वोटों की जरूरत होती है. इसका मतलब साफ है कि कांग्रेस अपने दम पर चुनाव नहीं जीत सकती.अगर महागठबंधन की दूसरी सीट कांग्रेस को मिलती है, तो उसे जेएमएम के 6, राजद के 4 और भाकपा माले के 2 विधायकों का समर्थन जुटाना होगा.
लेकिन समस्या यही है कि जिन दलों के समर्थन पर कांग्रेस की जीत निर्भर है, उन्हीं दलों से अब तक पर्याप्त संवाद नहीं हो पाया है. सूत्रों के मुताबिक गुरुवार तक कांग्रेस ने राजद और भाकपा माले से औपचारिक बातचीत भी नहीं की थी. इससे सहयोगी दलों में असहजता बढ़ रही है.दूसरी ओर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की चुप्पी को भी राजनीतिक संकेत के तौर पर देखा जा रहा है. कांग्रेस लगातार दूसरी सीट पर दावा मजबूत करने की कोशिश कर रही है, लेकिन जेएमएम अब तक खुलकर समर्थन देने के मूड में नहीं दिख रही. यही वजह है कि संख्या बल मजबूत होने के बावजूद महागठबंधन के भीतर तालमेल की कमी साफ दिखाई दे रही है.
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