RANCHI : आदिवासी छात्रावास नगराटोली के पुस्तकालय में शुक्रवार को आयोजित एक बैठक में जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं के छात्र-प्रतिनिधियों ने क्लस्टर प्रणाली को लेकर अपनी चिंताएं सामने रखीं.
बैठक की अध्यक्षता बिरसा उरांव ने की.बैठक में वक्ताओं ने कहा कि क्लस्टर प्रणाली के कारण जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं के अध्ययन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है.
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उनका कहना था कि यदि कॉलेजों में इन विषयों की सीटें घटती हैं या इन्हें सीमित किया जाता है, तो दूरदराज के गांवों से आने वाले विद्यार्थियों के लिए उच्च शिक्षा तक पहुंच और कठिन हो जाएगी.
छात्रों ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि वे जंगल और पहाड़ी क्षेत्रों के गांवों से कठिन परिस्थितियों में अपनी मातृभाषा की पढ़ाई करते हुए यहां तक पहुंचे हैं.
उनका कहना था कि वर्तमान में उनके छोटे भाई-बहन भी इसी व्यवस्था के तहत शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं.
ऐसे में यदि क्लस्टर प्रणाली के कारण स्थानीय कॉलेजों में विषयों की उपलब्धता कम होती है, तो ग्रामीण क्षेत्रों के अनेक विद्यार्थियों का उच्च शिक्षा का सपना अधूरा रह सकता है.
बैठक में मौजूद छात्रों ने यह भी कहा कि अधिकांश विद्यार्थी किसान परिवारों से आते हैं और आर्थिक स्थिति सीमित होने के कारण बड़े शहरों में रहकर पढ़ाई करना सभी के लिए संभव नहीं है.
बढ़ती महंगाई और रहने-खाने का खर्च उच्च शिक्षा को और चुनौतीपूर्ण बना रहा है.
प्रतिनिधियों ने राज्य सरकार से क्लस्टर प्रणाली पर पुनर्विचार करने की मांग करते हुए कहा कि जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं की पढ़ाई प्राथमिक विद्यालय स्तर से शुरू की जानी चाहिए.
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