RANCHI : झारखंड में आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं की हकीकत सोशल मीडिया के विज्ञापनों और दावों से कोसों दूर ज़मीन पर दम तोड़ती दिख रही है. हाल ही में सामने आई 108 एम्बुलेंस की बदहाली ने राज्य के स्वास्थ्य महकमे की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. जिस आपातकालीन एम्बुलेंस का मुख्य काम गंभीर रूप से बीमार मरीज़ों को समय पर अस्पताल पहुंचाकर ज़िंदगी बचाना था, आज वह खुद लाचार और ‘बीमार’ नजर आ रही है. आलम यह है कि मरीज़ को अस्पताल पहुंचाने से पहले इस एम्बुलेंस को खुद गैराज (गाड़ियों के अस्पताल) ले जाने की नौबत आ गई है. स्टार्ट न हो पाने के कारण इसे दूसरी गाड़ी के पीछे एक मोटी रस्सी से बांधकर घसीटना पड़ रहा है.
खिड़कियों से शीशे गायब, जुगाड़ के नाम पर तिरपाल

बरसात के इस मौसम में गाड़ी की स्थिति किसी बड़े खतरे से कम नहीं है. खिड़कियों से कांच के शीशे पूरी तरह गायब हैं और उनकी जगह जुगाड़ के तौर पर एक फटा हुआ तिरपाल बांधा गया है. ऐसी स्थिति में आपात स्थिति में अस्पताल ले जाए जा रहे मरीज़ को बारिश और ठंडी हवाओं से बचाना नामुमकिन है.
कागज़ों में चमचमाती गाड़ियां, ज़मीन पर खटारा इंतज़ाम
यह नज़ारा सीधे तौर पर उन सरकारी दावों पर तंज कसता है, जिनमें स्वास्थ्य व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए नए एम्बुलेंस शामिल करने की बातें कही गई थीं। सवाल यह उठता है कि:
- करोड़ों रुपये की लागत से खरीदी जाने वाली नई एम्बुलेंस आखिर ज़मीन पर क्यों नज़र नहीं आ रहीं?
- जीवनरक्षक कही जाने वाली गाड़ियों का रूटीन मेंटेनेंस क्यों नहीं किया जा रहा?
- अगर आपात स्थिति में किसी गरीब और ग्रामीण मरीज़ को इस सेवा की ज़रूरत पड़ी, तो क्या उसकी जान ऐसे ही जुगाड़ के भरोसे छोड़ दी जाएगी?

गाड़ी की बॉडी पर ‘भारत सरकार’ और ‘झारखंड सरकार’ दोनों का नाम बड़े अक्षरों में दर्ज है, लेकिन इस दुर्दशा की ज़िम्मेदारी लेने के लिए कोई आगे नहीं आ रहा. स्वास्थ मंत्री इरफ़ान अंसारी जी बड़े बड़े भाषण देने और रील्स बनाने से फुर्सत मिल गयी हो तो जरा जमीनी हकीकत पर भी नज़र डाल ले .
