RANCHI : जमुई की घटनाएं एक बड़ा सवाल खड़ा करती हैं. आखिर दो पुरुषों के बीच की लड़ाई में मां-बहन को गाली क्यों दी जाती है? गलती किसी की भी हो, पाबंदी लड़कियों पर ही क्यों लगती है? क्या महिला सुरक्षा के नाम पर बेटियों को घर में बंद करना ही एकमात्र रास्ता है?
समाज में जब भी महिलाओं के खिलाफ कोई घटना होती है, तो सबसे पहले सवाल उठता है कि पुलिस क्या कर रही थी? कानून-व्यवस्था कहां थी? अपराधी को सजा कब मिलेगी? ये सवाल बिल्कुल जायज हैं. लेकिन एक सवाल ऐसा भी है, जिस पर अक्सर लोग बात करने से बचते हैं. आखिर महिलाओं के खिलाफ हिंसा और गाली-गलौज की सोच आती कहां से है?
जरा सोचिए, सड़क पर दो पुरुषों के बीच किसी बात को लेकर झगड़ा हो जाए, तो गुस्से में गाली किसे दी जाती है? अक्सर मां-बहन को. जमीन का विवाद हो, पैसे का झगड़ा हो या पुरानी रंजिश, कई बार दूसरे पुरुष को नीचा दिखाने के लिए उसके घर की महिलाओं को निशाना बनाया जाता है.
अब सवाल यह है कि जब लड़ाई दो पुरुषों के बीच है, तो उसमें किसी महिला का क्या कसूर?
दो मर्दों की लड़ाई में मां-बहन को गाली क्यों?
हमारे समाज में एक पुरानी सोच आज भी जड़ जमाए बैठी है. घर की इज्जत का पूरा बोझ महिलाओं के कंधों पर डाल दिया जाता है. बेटी क्या पहनेगी, कहां जाएगी, किससे बात करेगी और कितने बजे घर लौटेगी, इन सब पर नजर रखी जाती है.
लेकिन जब बात बेटों की आती है, तो वही सख्ती अक्सर गायब हो जाती है.
किसी पुरुष को गुस्सा आता है, तो वह सामने वाले को गाली देने के लिए उसकी मां या बहन का नाम लेता है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि समाज ने महिलाओं की इज्जत को पुरुषों के सम्मान से जोड़ दिया है. यानी एक पुरुष दूसरे पुरुष को चोट पहुंचाने के लिए उस महिला को निशाना बनाता है, जिसका उस झगड़े से कोई लेना-देना ही नहीं होता.
सबसे बड़ी बात यह है कि गाली देने वाला पुरुष होता है, गाली सुनने वाली महिला होती है और अपमानित महसूस करने वाला भी अक्सर दूसरा पुरुष होता है. इस पूरे मामले में महिला की अपनी पहचान और उसकी भावनाएं कहीं पीछे छूट जाती हैं.
जमुई की घटनाएं और लड़कियों की आजादी पर लगती पाबंदी
बिहार के जमुई और आसपास के इलाकों में महिलाओं के खिलाफ हिंसा और छेड़खानी जैसी घटनाओं को लेकर एक बड़ा सवाल उठता है. जब किसी लड़की के साथ बदसलूकी होती है या किसी विवाद में महिला को निशाना बनाया जाता है, तो उसका असर सिर्फ उस एक परिवार तक सीमित नहीं रहता. पूरे इलाके में डर का माहौल बनने लगता है.
कई बार ऐसी घटनाओं के बाद परिवार अपनी बेटियों को स्कूल या कॉलेज जाने से रोकने लगते हैं. बाहर निकलने, मोबाइल इस्तेमाल करने और दोस्तों से मिलने तक पर पाबंदी लगा दी जाती है. लेकिन जरा सोचिए, अगर गलती किसी लड़के ने की है, तो उसकी सजा लड़की को क्यों मिले?
अगर किसी लड़की के साथ छेड़खानी होती है, तो सवाल यह होना चाहिए कि छेड़खानी करने वाले के खिलाफ क्या कार्रवाई हुई. लेकिन कई बार सवाल लड़की के कपड़ों, उसके बाहर जाने के समय और उसके व्यवहार पर उठने लगते हैं.
यहीं से शुरू होती है वह सोच, जिसमें गलती किसी और की होती है और पाबंदी किसी और पर लगा दी जाती है.
बेटियों को संस्कार, तो बेटों को क्यों नहीं?
बचपन से लड़कियों को सिखाया जाता है कि धीरे बोलो, ढंग से बैठो, ज्यादा मत हंसो, शाम होने से पहले घर लौट आओ और अपनी इज्जत का ध्यान रखो.
लेकिन क्या कभी उतनी ही गंभीरता से लड़कों को भी सिखाया जाता है कि किसी लड़की को घूरना गलत है? उसकी मर्जी के बिना उसे छूना गलत है? किसी महिला के नाम पर गाली देना भी उसका अपमान करना है? अक्सर घरों में लड़कों की गलत भाषा को यह कहकर टाल दिया जाता है कि लड़के हैं, ऐसा तो चलता है.
यही सोच आगे चलकर बड़ी समस्या बन सकती है. बेटियों को सुरक्षित रहने की सीख देना जरूरी है, लेकिन बेटों को दूसरों की सुरक्षा और सम्मान की जिम्मेदारी समझाना भी उतना ही जरूरी है. बच्चों को यह समझना होगा कि महिला किसी की मां, बहन, पत्नी या बेटी होने से पहले एक इंसान है. उसकी अपनी पहचान है, अपनी पसंद है और अपने अधिकार हैं.
सिर्फ कानून सख्त करने से क्या सब ठीक हो जाएगा?
महिलाओं के खिलाफ अपराध रोकने के लिए कानून का सख्त होना, पुलिस की सक्रियता और समय पर न्याय मिलना बेहद जरूरी है. लेकिन क्या सिर्फ कानून से लोगों की सोच बदल सकती है?
अगर घर में ही महिलाओं के नाम पर गाली देना आम बात है, अगर लड़कियों की आजादी पर रोक लगाना आसान समाधान माना जाता है और अगर लड़कों की गलतियों को नजरअंदाज किया जाता है, तो बदलाव की शुरुआत कहां से होगी?
कानून अपराध होने के बाद कार्रवाई कर सकता है, लेकिन अपराध की सोच को बदलने के लिए परिवार, स्कूल और समाज को भी अपनी भूमिका निभानी होगी.
बच्चों को छोटी उम्र से ही सम्मान, बराबरी और सहमति का मतलब समझाना होगा. किसी महिला का अपमान करने वाली भाषा को मजाक कहकर टालने के बजाय उसका विरोध करना होगा.
बेटियों को घर में बंद करना समाधान है या डर के आगे हार?
जब किसी इलाके में छेड़खानी या हिंसा की घटना होती है, तो अक्सर सबसे पहले लड़कियों की आजादी पर सवाल उठने लगते हैं. कपड़े कैसे पहनने चाहिए? कितने बजे बाहर निकलना चाहिए? मोबाइल रखना चाहिए या नहीं?
लेकिन एक बार यह भी सोचिए कि अगर हर घटना के बाद लड़कियों की आजादी कम कर दी जाएगी, तो उनकी पढ़ाई, नौकरी और आगे बढ़ने के मौके कैसे बचेंगे?
सुरक्षा का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि लड़कियां घर से बाहर ही न निकलें. सुरक्षा का मतलब यह होना चाहिए कि वे बिना डर के स्कूल जा सकें, नौकरी कर सकें और अपनी जिंदगी के फैसले खुद ले सकें. इसके लिए अपराध करने वालों को जवाबदेह ठहराना और समाज की सोच बदलना दोनों जरूरी हैं.
आखिर बदलाव की शुरुआत कहां से हो?
बदलाव की शुरुआत किसी बड़े भाषण या अभियान से नहीं, बल्कि घर की छोटी-छोटी बातों से हो सकती है.
- बेटा गाली दे, तो उसे भी उसी तरह टोकिए जैसे बेटी को गलत व्यवहार पर टोकते हैं.
- मां-बहन के नाम पर गाली को मजाक बताकर नजरअंदाज मत कीजिए.
- लड़कियों की आजादी पर रोक लगाने से पहले अपराध करने वाले के खिलाफ कार्रवाई की बात कीजिए.
- बच्चों को समझाइए कि किसी की मर्जी और सम्मान का ख्याल रखना जरूरी है.
- लड़कियों और लड़कों, दोनों को बराबरी और जिम्मेदारी की सीख दीजिए.
अब सवाल आपसे है…
जब दो पुरुषों के बीच झगड़ा होता है, तो गाली किसी महिला को क्यों दी जाती है?
जब गलती किसी लड़के की होती है, तो घर में पाबंदी लड़की पर क्यों लगती है?
और अगर महिला सुरक्षा की शुरुआत घर से होती है, तो क्या अब बेटों की परवरिश पर भी उतनी ही गंभीरता से बात करने का समय नहीं आ गया है?
क्योंकि बेटियों को बचाने के लिए उन्हें घर में बंद करना नहीं, बल्कि ऐसा समाज बनाना जरूरी है जहां उन्हें डर के बिना जीने का हक मिले.
