RANCHI : राजनीति में कुछ चेहरे विरासत से पहचान बनाते हैं और कुछ अपने संघर्षों से इतिहास लिखते हैं. झारखंड मुक्ति मोर्चा की ओर से राज्यसभा उम्मीदवार बनाए गए बैद्यनाथ राम उन्हीं नेताओं में शामिल हैं, जिन्होंने साधारण जीवन से निकलकर प्रदेश की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई. एक शिक्षक से लेकर विधायक, मंत्री और अब राज्यसभा उम्मीदवार तक का उनका सफर आसान नहीं रहा. इस यात्रा में राजनीतिक उतार-चढ़ाव भी आए, दल बदलने के फैसलों पर सवाल भी उठे और कई बार हार का सामना भी करना पड़ा. लेकिन उन्होंने कभी सार्वजनिक जीवन से दूरी नहीं बनाई.

द्यनाथ राम के संघर्ष
लातेहार जिले की धरती से आने वाले बैद्यनाथ राम ने अपने पेशेवर जीवन की शुरुआत एक शिक्षक के रूप में की थी. समाज के बीच काम करने के दौरान उन्होंने महसूस किया कि केवल शिक्षा ही नहीं, बल्कि नीतिगत फैसलों में भागीदारी भी जरूरी है. इसी सोच ने उन्हें राजनीति की ओर आकर्षित किया. प्रभात खबर की रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने शिक्षक की नौकरी छोड़ सक्रिय राजनीति में कदम रखा और धीरे-धीरे जननेता के रूप में अपनी पहचान बनाई. बैद्यनाथ राम का राजनीतिक सफर कई पड़ावों से गुजरा. उन्होंने अलग-अलग राजनीतिक दलों में काम किया. शुरुआती दौर में जनता दल यूनाइटेड से जुड़े, बाद में भारतीय जनता पार्टी का दामन थामा और प्रदेश राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई. लातेहार विधानसभा क्षेत्र, जो अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट है, वहां से उन्होंने कई चुनाव लड़े और जनता का विश्वास हासिल किया. वे तीन बार विधायक चुने गए और मंत्री पद की जिम्मेदारी भी संभाली. वर्ष 2019 के विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने भाजपा छोड़ झारखंड मुक्ति मोर्चा का हाथ थाम लिया. इसके बाद झामुमो ने उन्हें पार्टी का उपाध्यक्ष बनाया और दलित चेहरे के रूप में आगे बढ़ाया.
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द्यनाथ राम का सफर हमेशा सुर्खियों से भरा नहीं रहा. कई बार उन्हें राजनीतिक विरोध का सामना करना पड़ा. पार्टी बदलने के फैसलों को लेकर आलोचना हुई. चुनावी हार भी मिली और समर्थकों के बीच असंतोष की स्थिति भी बनी. लेकिन हर बार उन्होंने खुद को फिर से खड़ा किया. राजनीति में टिके रहना जितना मुश्किल होता है, उतना ही कठिन होता है जनता का भरोसा बनाए रखना. बैद्यनाथ राम ने गांव-गांव जाकर लोगों के बीच अपनी उपस्थिति बनाए रखी और सामाजिक मुद्दों को उठाते रहे. झारखंड की राजनीति में बैद्यनाथ राम को दलित समाज के प्रभावशाली नेताओं में गिना जाता है. लंबे समय तक जमीनी राजनीति करने के कारण उनकी पहचान केवल एक दल विशेष तक सीमित नहीं रही, बल्कि वे सामाजिक प्रतिनिधित्व के प्रतीक के रूप में भी उभरे. झामुमो ने उन्हें अपने सबसे प्रमुख दलित चेहरों में शामिल करते हुए राज्यसभा के लिए उम्मीदवार बनाया, जिसे राजनीतिक जानकार दलित प्रतिनिधित्व को मजबूत करने की रणनीति के रूप में भी देख रहे हैं.
जून 2026 में झारखंड मुक्ति मोर्चा द्वारा उन्हें राज्यसभा उम्मीदवार घोषित
जून 2026 में झारखंड मुक्ति मोर्चा द्वारा उन्हें राज्यसभा उम्मीदवार घोषित किया जाना उनके लंबे राजनीतिक जीवन का नया अध्याय माना जा रहा है. अगर वे राज्यसभा पहुंचते हैं, तो यह सिर्फ उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं होगी, बल्कि लातेहार जैसे अपेक्षाकृत पिछड़े इलाके से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति तक पहुंचने की प्रेरक कहानी भी होगी. कभी स्कूल की कक्षाओं में बच्चों को भविष्य का पाठ पढ़ाने वाले बैद्यनाथ राम आज खुद राजनीतिक संघर्ष की ऐसी किताब बन चुके हैं, जिसे पढ़कर यह समझा जा सकता है कि लोकतंत्र में कोई भी सफर अंतिम नहीं होता. हार के बाद वापसी, आलोचनाओं के बीच स्वीकार्यता और जमीन से जुड़े रहने का जज्बा ही एक नेता की असली पूंजी होती है. अब राज्यसभा की इस नई परीक्षा में बैद्यनाथ राम के सामने सिर्फ चुनाव जीतने की चुनौती नहीं है, बल्कि उन उम्मीदों पर खरा उतरने की जिम्मेदारी भी है, जो झारखंड के दूर-दराज इलाकों से लेकर दलित समाज के लोगों ने उनसे जोड़ रखी हैं.
“सियासत की सीढ़ियां विरासत से नहीं, संघर्ष से भी चढ़ी जाती हैं बैद्यनाथ राम की कहानी इसी विश्वास का नाम है.”
