Ranchi : पिछले कुछ वर्षों में देश के कई राज्यों में क्षेत्रीय दलों में टूट, विभाजन और नेताओं के पलायन की घटनाएं बढ़ी हैं. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन घटनाक्रमों का सबसे बड़ा लाभ भारतीय जनता पार्टी को मिलता दिखाई देता है। हालांकि दिलचस्प बात यह है कि भाजपा ने इन दलों को अपने भीतर समाहित करने के बजाय उन्हें सहयोगी दलों के रूप में बनाए रखना पसंद किया है.
भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दल लंबे समय तक राष्ट्रीय दलों के मुकाबले एक मजबूत राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरते रहे हैं.
लेकिन हाल के वर्षों में कई राज्यों में इन दलों की स्थिति कमजोर होती नजर आ रही है. कहीं पार्टी में औपचारिक विभाजन हुआ है तो कहीं प्रभावशाली नेताओं के पार्टी छोड़ने से संगठन पर असर पड़ा है.

इसे भी पढे : झारखंड हाईकोर्ट की सरकार को फटकार. बालू घाटों की टेंडर राशि ब्याज समेत लौटाने का आदेश
महाराष्ट्र में सबसे स्पष्ट दिखी तस्वीर
महाराष्ट्र में पहले शिवसेना और बाद में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) में हुए विभाजन ने राष्ट्रीय राजनीति का ध्यान खींचा. दोनों ही मामलों में पार्टी का एक बड़ा धड़ा भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन के करीब पहुंच गया. हालांकि इन दलों का भाजपा में विलय नहीं हुआ, बल्कि उन्होंने अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनाए रखी.
इसी वजह से राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी होती रही कि भाजपा सहयोगी दलों को खत्म करने के बजाय उन्हें अपने राजनीतिक गठबंधन का हिस्सा बनाकर रखना पसंद करती है.
बिहार और उत्तर प्रदेश में भी बने ऐसे समीकरण
बिहार में जदयू और अन्य क्षेत्रीय दलों को लेकर समय-समय पर राजनीतिक अटकलें सामने आती रही हैं. वहीं लोक जनशक्ति पार्टी के विभाजन के बाद भी अलग-अलग धड़े भाजपा के साथ खड़े दिखाई दिए.
उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी से अलग होकर शिवपाल सिंह यादव ने अपनी अलग राजनीतिक राह बनाई थी. हालांकि बाद में राजनीतिक परिस्थितियां बदलती रहीं, लेकिन उस दौर में भी भाजपा को अप्रत्यक्ष राजनीतिक लाभ मिलने की चर्चा होती रही.
दक्षिण और पूर्वी भारत में भी क्षेत्रीय दलों पर दबाव
ओडिशा में बीजद, तेलंगाना में बीआरएस और आंध्र प्रदेश में वाईएसआर कांग्रेस जैसे दलों को भी हाल के वर्षों में चुनौतियों का सामना करना पड़ा है. कई प्रभावशाली नेताओं ने पार्टी छोड़ी या भाजपा का दामन थामा. इससे इन दलों की संगठनात्मक ताकत पर असर पड़ा.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि क्षेत्रीय दलों की कमजोरी का सीधा असर राज्यों की राजनीति और राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष की ताकत पर पड़ता है.
क्या बन रहा है सत्ता समर्थक ‘थर्ड फ्रंट’?
भारतीय राजनीति में ‘थर्ड फ्रंट’ की अवधारणा आमतौर पर केंद्र की सत्ता के विकल्प के रूप में देखी जाती रही है. लेकिन मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में एक अलग तस्वीर उभरती दिखाई दे रही है.
कई ऐसे दल या नेता, जो कभी भाजपा के विरोधी माने जाते थे, आज उसके सहयोगी या समर्थक के रूप में नजर आते हैं. ऐसे में कुछ राजनीतिक विश्लेषक इसे एक नए तरह के ‘थर्ड फ्रंट’ के रूप में देखते हैं, जो सत्ता के खिलाफ नहीं बल्कि सत्ता के पक्ष में खड़ा है.
हालांकि भाजपा का कहना है कि विभिन्न दलों के नेता विकास और स्थिर शासन के एजेंडे से प्रभावित होकर उसके साथ आते हैं. दूसरी ओर विपक्षी दल आरोप लगाते हैं कि राजनीतिक दबाव और बदलते समीकरणों के कारण क्षेत्रीय दल कमजोर हो रहे हैं.
आगे क्या?
क्षेत्रीय दलों की भूमिका भारतीय लोकतंत्र में हमेशा महत्वपूर्ण रही है. लेकिन मौजूदा दौर में जिस तरह राजनीतिक समीकरण बदल रहे हैं, उसने कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं. क्या यह केवल राजनीतिक पुनर्संरचना है, या फिर क्षेत्रीय राजनीति के प्रभाव में स्थायी बदलाव का संकेत ? इस सवाल का जवाब आने वाले चुनाव और बदलते राजनीतिक गठबंधन तय करेंगे.
इसे भी पढे : झारखंड में मौसम के दो रंग: कई जिलों में बारिश से राहत, पलामू-गढ़वा-चतरा में लू का अलर्ट
