RANCHI : डुमरी विधायक जयराम महतो और धनबाद के बरवड्डा थाना प्रभारी के बीच कथित बातचीत का ऑडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद कानूनी बहस छिड़ गई है. बातचीत में कथित तौर पर इस्तेमाल की गई अभद्र भाषा और ‘देख लेने’ की धमकी के आधार पर पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की कई धाराओं में प्राथमिकी दर्ज की है. इस पूरे मामले के सामने आने के बाद यह सवाल उठ रहा है कि क्या WhatsApp की निजी और Encrypted कॉल को रिकॉर्ड करना कानूनी रूप से मान्य है और क्या इस आधार पर किसी विधायक पर आपराधिक केस चल सकता है.
WhatsApp Encryption का मतलब पूरी Privacy नहीं
सोशल मीडिया पर एक बड़ा भ्रम यह फैलाया जा रहा है कि WhatsApp कॉल ‘End-to-End Encrypted’ होती है, इसलिए यह पूरी तरह निजी बातचीत है और इसे रिकॉर्ड कर केस दर्ज करना निजता के अधिकार का उल्लंघन है. तकनीकी और कानूनी दृष्टि से यह तर्क सही नहीं है। एन्क्रिप्शन केवल नेटवर्क के बीच किसी तीसरे पक्ष या खुद कंपनी को बातचीत सुनने से रोकता है. लेकिन जिस व्यक्ति से कॉल पर बात की जा रही है, आवाज़ सीधे उसके डिवाइस तक पहुंचती है. यदि कॉल प्राप्त करने वाला व्यक्ति अपने स्तर पर उसे रिकॉर्ड करता है, तो इसमें कोई एन्क्रिप्शन नहीं टूटता.
निजी कॉल पर भी लागू होता है कानून
कानून बातचीत के माध्यम से नहीं, बल्कि उसमें किए गए कृत्य और मंशा से तय होता है. इसे ऐसे समझा जा सकता है कि यदि दो लोग किसी बंद कमरे में बैठकर किसी अपराध की योजना बनाते हैं, तो सिर्फ इसलिए अपराध खत्म नहीं हो जाता कि कमरा बंद था और बातचीत निजी थी. ठीक उसी तरह, एन्क्रिप्टेड कॉल पर दी गई कथित धमकी, ब्लैकमेलिंग या सरकारी अधिकारी को उसके काम से रोकने का प्रयास भी केवल तकनीक के आधार पर कानूनी सुरक्षा नहीं पा सकता. इस मामले में दूसरा अहम पहलू विधायी विशेषाधिकार का है. संविधान के अनुच्छेद 194 के तहत विधायकों को विधानसभा के भीतर भाषण, मतदान और विधायी कार्यों के लिए सुरक्षा मिलती है. हालांकि, यह विशेषाधिकार सदन के बाहर किसी पुलिस अधिकारी या आम नागरिक को फोन पर कथित धमकी देने के मामले में आपराधिक कानून से छूट नहीं देता. सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट किया है कि विधायी विशेषाधिकार कानून से ऊपर होने का कोई लाइसेंस नहीं है.
कानून से ऊपर नहीं है एन्क्रिप्टेड कॉल और विधायक का विशेषाधिकार
अदालत में यह मामला तकनीकी दावों से ज्यादा साक्ष्यों पर टिकेगा. प्राथमिकी दर्ज होना अपराध सिद्ध होने का प्रमाण नहीं है. अभियोजन पक्ष को अदालत में ऑडियो की फॉरेंसिक जांच, आवाज़ की प्रामाणिकता, टेम्परिंग का अभाव और बातचीत का पूरा संदर्भ साबित करना होगा. यह भी सिद्ध करना होगा कि कहे गए शब्द कानूनन ‘आपराधिक धमकी’ और ‘सरकारी कार्य में बाधा’ के आवश्यक तत्वों को पूरा करते हैं या नहीं. WhatsApp का End-to-End Encryption केवल बातचीत को सुरक्षित रखने वाला एक ताला है, अदालत से बचने की कोई कानूनी ढाल नहीं. अंततः यह मामला तकनीक या पद से तय नहीं होगा, बल्कि बातचीत की प्रामाणिकता, मंशा, संदर्भ और अदालत में पेश किए जाने वाले पुख्ता सबूतों के आधार पर ही इसकी कानूनी दिशा तय होगी.
