रांची : झारखंड में धार्मिक प्रार्थना, मिशनरी स्कूलों और संवैधानिक अधिकारों को लेकर एक नई बहस शुरू हो गई है. इस बार चर्चा का केंद्र कोई राजनीतिक दल या सामाजिक संगठन नहीं, बल्कि राज्य के दो वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी हैं. एक ओर भारतीय राजस्व सेवा (IRS) की अधिकारी निशा उरांव हैं, जबकि दूसरी ओर झारखंड पुलिस में पदस्थापित किशोर कुमार रजक हैं. दोनों अधिकारियों ने अपने-अपने सोशल मीडिया मंचों पर इस विषय पर विचार व्यक्त किए, जिसके बाद यह मुद्दा सार्वजनिक चर्चा का विषय बन गया.

IRS अधिकारी निशा उरांव ने क्या लिखा ?
निशा उरांव ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में मिशनरी स्कूलों में होने वाली दैनिक प्रार्थना और सनातन मंत्रों को लेकर कथित “दोहरे मापदंड” का प्रश्न उठाया.
उन्होंने लिखा कि मिशनरी स्कूलों में प्रतिदिन प्रभु यीशु की प्रार्थना और उनकी स्तुति में भजन कराए जाते हैं. उनके अनुसार, उन्होंने स्वयं कुछ समय तक मिशनरी स्कूल में शिक्षा प्राप्त की थी, जहाँ विद्यार्थियों को प्रभु यीशु की स्तुति से जुड़े गीतों और प्रार्थनाओं का नियमित अभ्यास कराया जाता था. उन्होंने कहा कि उस समय किसी सनातनी परिवार की ओर से इस पर आपत्ति नहीं जताई गई.
अपनी पोस्ट में उन्होंने यह प्रश्न भी उठाया कि यदि किसी मिशनरी स्कूल में ईसाई प्रार्थना को लेकर विरोध नहीं होता, तो सनातन मंत्रों के उच्चारण पर कुछ वर्गों की ओर से आपत्ति क्यों दर्ज की जाती है. उन्होंने इसे “दोहरा रवैया” बताया.
इसके साथ ही उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि कई मिशनरी स्कूलों को सरकारी योजनाओं के तहत आर्थिक सहायता भी प्राप्त होती है.
DSP किशोर कुमार रजक ने दिया संवैधानिक आधार पर जवाब
निशा उरांव की पोस्ट के बाद DSP किशोर कुमार रजक ने अपने सोशल मीडिया मंच पर विस्तृत प्रतिक्रिया दी. उन्होंने धार्मिक स्वतंत्रता और शिक्षा से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों का उल्लेख करते हुए अपनी बात रखी.
उन्होंने लिखा कि संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक नागरिक को धर्म की स्वतंत्रता प्रदान करता है, जबकि अनुच्छेद 26 धार्मिक संस्थाओं को अपने धार्मिक मामलों के संचालन का अधिकार देता है. वहीं अनुच्छेद 28 यह स्पष्ट करता है कि धार्मिक शिक्षा पर प्रतिबंध केवल पूर्णतः राज्य द्वारा वित्तपोषित शिक्षण संस्थानों पर लागू होता है.
उन्होंने कहा कि निजी धार्मिक अथवा अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान संविधान की निर्धारित सीमाओं—जैसे सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य—के अधीन रहते हुए अपनी धार्मिक शिक्षा और प्रार्थना जारी रख सकते हैं।
हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई संस्थान सरकारी सहायता प्राप्त करता है, तो वह किसी छात्र को उसकी इच्छा या उसके अभिभावकों की सहमति के बिना धार्मिक अनुष्ठान में भाग लेने के लिए बाध्य नहीं कर सकता.
केवल मिशनरी स्कूलों तक सीमित नहीं है यह व्यवस्था
DSP किशोर कुमार रजक ने अपनी प्रतिक्रिया में यह भी कहा कि यह व्यवस्था केवल मिशनरी स्कूलों पर लागू नहीं होती.
उन्होंने उदाहरण देते हुए लिखा कि विद्या भारती, सरस्वती शिशु मंदिर, सरस्वती विद्या मंदिर, रामकृष्ण मिशन, चिन्मय मिशन, ब्रह्मो समाज से जुड़े कुछ विद्यालयों तथा वैदिक परंपरा पर आधारित गुरुकुलों में भी सुबह सरस्वती वंदना, गायत्री मंत्र और शांति पाठ जैसी धार्मिक प्रार्थनाएँ कराई जाती हैं. इन संस्थानों में भी विभिन्न धर्मों के विद्यार्थी अध्ययन करते हैं.
उनका कहना था कि संविधान प्रत्येक धार्मिक संस्था को अपने धर्म के अनुसार प्रार्थना कराने का अधिकार देता है. लेकिन किसी भी छात्र पर उसकी इच्छा के विरुद्ध धार्मिक अनुष्ठान थोपना उचित नहीं माना जा सकता. उन्होंने यह भी लिखा कि यदि किसी अभिभावक को किसी धार्मिक संस्था की व्यवस्था स्वीकार नहीं है, तो वे अपने बच्चों का प्रवेश किसी अन्य विद्यालय में करा सकते हैं.
बहस का केंद्र क्या है?
दोनों अधिकारियों की पोस्ट अलग-अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत करती हैं.
निशा उरांव का प्रश्न धार्मिक आचरण के संदर्भ में समान व्यवहार और कथित दोहरे मानकों पर केंद्रित है. वहीं किशोर कुमार रजक ने संवैधानिक प्रावधानों का हवाला देते हुए धार्मिक संस्थानों के अधिकार और विद्यार्थियों की स्वतंत्रता के बीच संतुलन की बात कही है.
इस बहस ने एक बार फिर यह प्रश्न सामने ला दिया है कि धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन किस प्रकार स्थापित किया जाए तथा शिक्षा संस्थानों में धार्मिक गतिविधियों की संवैधानिक सीमाएँ क्या हैं.
क्या प्रशासनिक अधिकारियों की सार्वजनिक टिप्पणियों पर भी चर्चा होनी चाहिए ?
इस पूरे घटनाक्रम का एक दूसरा पहलू भी है. दोनों ही व्यक्ति झारखंड में वरिष्ठ प्रशासनिक पदों पर कार्यरत अधिकारी हैं. ऐसे में उनके सोशल मीडिया पर व्यक्त विचारों को सामान्य नागरिक की टिप्पणी की तुलना में अधिक गंभीरता से देखा जाता है.
भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था में अधिकारियों से अपेक्षा की जाती है कि वे संविधान और कानून के अनुरूप निष्पक्षता बनाए रखें तथा सभी धर्मों, समुदायों और नागरिकों के प्रति समान दृष्टिकोण रखें. वहीं संविधान प्रत्येक नागरिक की तरह अधिकारियों को भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है. ऐसे में जब कोई अधिकारी धर्म जैसे संवेदनशील विषय पर सार्वजनिक टिप्पणी करता है, तो उसके सामाजिक और प्रशासनिक प्रभाव को लेकर भी चर्चा होना स्वाभाविक माना जाता है.
निष्कर्ष
यह विवाद केवल मिशनरी स्कूलों या सनातन मंत्रों तक सीमित नहीं है. इसके केंद्र में धार्मिक स्वतंत्रता, विद्यार्थियों के अधिकार, सरकारी सहायता प्राप्त संस्थानों की संवैधानिक जिम्मेदारियाँ तथा सार्वजनिक पदों पर बैठे अधिकारियों की भूमिका जैसे व्यापक प्रश्न हैं.
आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह बहस केवल सोशल मीडिया तक सीमित रहती है या फिर शिक्षा, संविधान और प्रशासनिक मर्यादाओं पर व्यापक सार्वजनिक विमर्श का विषय बनती है.
