RANCHI : दशकों से देश की ऊर्जा राजधानी कहे जाने वाले झरिया की पहचान कोयले की खदानों, भूमिगत आग और भू-धंसान जैसी समस्याओं से जुड़ी रही है. लेकिन अब यही कोयलांचल एक नई ऊर्जा क्रांति का गवाह बनने जा रहा है. झरिया की धरती के नीचे छिपी मीथेन गैस को उपयोगी ईंधन में बदलने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है. कोल इंडिया की पहली कोल बेड मीथेन (सीबीएम) परियोजना यहां तेजी से आकार ले रही है और उम्मीद है कि अगले एक वर्ष के भीतर बड़े पैमाने पर व्यावसायिक उत्पादन शुरू हो जाएगा.
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झरिया में आकार ले रही कोल इंडिया की पहली सीबीएम परियोजना
यह परियोजना केवल ऊर्जा उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि झरिया की दशकों पुरानी समस्याओं के समाधान की दिशा में भी अहम मानी जा रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि इससे खदानों में सुरक्षा बढ़ेगी, मीथेन गैस से होने वाले हादसों का खतरा कम होगा और भू-धंसान व भूमिगत आग जैसी चुनौतियों पर नियंत्रण पाने में मदद मिल सकती है. दरअसल, झरिया की कोयला परतों के भीतर बड़ी मात्रा में मीथेन गैस मौजूद है. अब तक यह गैस खनन कार्यों के लिए सबसे बड़े जोखिमों में शामिल रही है, क्योंकि इसकी वजह से विस्फोट और दुर्घटनाओं की आशंका बनी रहती है. लेकिन अब इसी गैस को निकालकर स्वच्छ ऊर्जा के रूप में इस्तेमाल करने की योजना को जमीन पर उतारा जा रहा है.
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क्या है कोल बेड मीथेन?
कोल बेड मीथेन एक प्रकार की प्राकृतिक गैस है, जो लाखों वर्षों तक कोयले के निर्माण की प्रक्रिया के दौरान उसकी परतों में उच्च दबाव के साथ जमा रहती है. इसकी ऊष्मा क्षमता लगभग 8500 किलो कैलोरी प्रति किलोग्राम बताई जाती है, जो प्राकृतिक गैस के बराबर मानी जाती है. यही वजह है कि इसे स्वच्छ और उच्च गुणवत्ता वाला ईंधन माना जाता है.इस गैस का उपयोग घरेलू रसोई तक पाइपलाइन के जरिए पीएनजी पहुंचाने, वाहनों के लिए सीएनजी उपलब्ध कराने, उद्योगों, रासायनिक इकाइयों और उर्वरक निर्माण जैसे क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर किया जा सकता है. इससे पारंपरिक ईंधनों पर निर्भरता भी कम होगी.
झरिया में कहां बन रही है परियोजना?
कोल इंडिया की यह पहली सीबीएम परियोजना बीसीसीएल के मुनीडीह क्षेत्र में विकसित की जा रही है. झरिया सीबीएम ब्लॉक-1 के नाम से विकसित हो रही यह परियोजना करीब 26.55 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली हुई है. इसमें कपूरिया, मुनीडीह और सिंघरा के भू-वैज्ञानिक क्षेत्र शामिल हैं. अनुमान के मुताबिक, इस ब्लॉक में करीब 25 बिलियन क्यूबिक मीटर मीथेन गैस का भंडार मौजूद है, जो आने वाले वर्षों में ऊर्जा क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है.
वर्ष 2020 में वैश्विक निविदा प्रक्रिया के बाद प्रभा एनर्जी लिमिटेड को इस परियोजना का डेवलपर चुना गया था. इसके बाद 2021 में राजस्व साझेदारी समझौते पर हस्ताक्षर किए गए. इस समझौते के तहत बीसीसीएल को परियोजना से होने वाली आय का 10 प्रतिशत हिस्सा मिलेगा.
झरिया की बदल सकती है तस्वीर
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह परियोजना तय समय पर सफलतापूर्वक शुरू हो जाती है, तो झरिया की पहचान सिर्फ कोयले की नगरी के रूप में नहीं रहेगी. यह इलाका स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन के राष्ट्रीय केंद्र के रूप में भी उभर सकता है. इससे रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे, राजस्व में वृद्धि होगी और पर्यावरण के अनुकूल ऊर्जा व्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा. कोयले की आग से जूझती रही झरिया की धरती अब स्वच्छ ऊर्जा की नई कहानी लिखने की तैयारी में है. अगर सब कुछ योजना के अनुसार आगे बढ़ा, तो आने वाले वर्षों में झरिया देश को सिर्फ कोयला ही नहीं, बल्कि भविष्य का हरित ईंधन भी उपलब्ध कराएगा.
