रांची : झारखंड के सरकारी स्कूलों में चलने वाली मध्याह्न भोजन (मिड-डे मील) योजना वित्तीय संकट का सामना कर रही है. चालू वित्तीय वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही समाप्त होने के बावजूद राज्य के स्कूलों को अब तक खाना पकाने की लागत यानी कुकिंग कॉस्ट की राशि नहीं मिली है. इससे राज्य के करीब 35,500 सरकारी स्कूलों में योजना के संचालन को लेकर चिंता बढ़ गई है.

स्कूल प्रबंधन और शिक्षा विभाग से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि यदि जल्द राशि जारी नहीं की गई तो योजना के संचालन में गंभीर कठिनाइयां पैदा हो सकती हैं. इसका असर राज्य के लगभग 30 लाख छात्र-छात्राओं पर पड़ सकता है, जो प्रतिदिन स्कूलों में मिलने वाले मध्याह्न भोजन पर निर्भर हैं.
क्या है मिड-डे मील योजना ?
मध्याह्न भोजन योजना का उद्देश्य सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराना है. इस योजना को अब पीएम पोषण योजना के नाम से संचालित किया जाता है.
विशेषज्ञों का मानना है कि यह योजना केवल बच्चों के पोषण से जुड़ी नहीं है, बल्कि स्कूलों में नामांकन बढ़ाने, ड्रॉपआउट कम करने और नियमित उपस्थिति सुनिश्चित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है.
झारखंड जैसे राज्य में, जहां बड़ी संख्या में बच्चे आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आते हैं, वहां इस योजना का महत्व और बढ़ जाता है.
कुकिंग कॉस्ट क्या होती है?
मध्याह्न भोजन योजना के तहत केंद्र और राज्य सरकार की ओर से स्कूलों को भोजन तैयार करने के लिए राशि उपलब्ध कराई जाती है. इसी राशि को कुकिंग कॉस्ट कहा जाता है.
इस पैसे से दाल, सब्जी, मसाले, तेल, ईंधन और अन्य जरूरी सामग्री खरीदी जाती है. इसके अलावा भोजन तैयार करने की प्रक्रिया से जुड़े कई खर्च भी इसी राशि से पूरे किए जाते हैं.
यदि यह राशि समय पर नहीं मिले तो स्कूलों के लिए भोजन तैयार करना मुश्किल हो जाता है.
स्कूलों के सामने क्या चुनौती है ?
जानकारी के अनुसार वित्तीय वर्ष शुरू हुए तीन महीने से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन कई स्कूलों के खातों में अब तक कुकिंग कॉस्ट की राशि नहीं पहुंची है.
कई विद्यालयों ने स्थानीय स्तर पर उधार लेकर या पुराने बचे हुए संसाधनों के सहारे भोजन व्यवस्था जारी रखने की कोशिश की है. लेकिन यह व्यवस्था लंबे समय तक चल पाना मुश्किल माना जा रहा है.
स्कूल प्रबंधन समितियों का कहना है कि दुकानदार भी सीमित समय तक ही उधार में खाद्यान्न और अन्य सामग्री उपलब्ध करा सकते हैं.
30 लाख बच्चों पर पड़ सकता है असर
झारखंड में लगभग 30 लाख बच्चे प्रतिदिन मिड-डे मील योजना का लाभ लेते हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि यदि योजना बाधित होती है तो इसका सीधा असर बच्चों के पोषण स्तर और स्कूलों में उपस्थिति पर पड़ सकता है.
ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर इलाकों में कई बच्चों के लिए स्कूल में मिलने वाला भोजन दिन का सबसे महत्वपूर्ण भोजन होता है.
ऐसे में योजना में किसी भी तरह की रुकावट सामाजिक और शैक्षणिक दोनों स्तरों पर असर डाल सकती है.
क्या है देरी की वजह?
अधिकारियों के अनुसार राशि जारी होने की प्रक्रिया में प्रशासनिक और वित्तीय कारणों से देरी हुई है. हालांकि शिक्षा विभाग और संबंधित एजेंसियों की ओर से राशि उपलब्ध कराने की प्रक्रिया जारी होने की बात कही जा रही है.
अब तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि सभी स्कूलों तक राशि कब तक पहुंच पाएगी.
विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
शिक्षा और बाल अधिकार से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि मिड-डे मील जैसी योजनाओं में वित्तीय देरी का सबसे ज्यादा असर बच्चों पर पड़ता है.
उनका मानना है कि सरकारों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि ऐसी योजनाओं के लिए धनराशि समय पर उपलब्ध हो, ताकि स्कूलों को संचालन में किसी तरह की परेशानी न हो.
आगे क्या ?
फिलहाल राज्य के हजारों स्कूल राशि जारी होने का इंतजार कर रहे हैं. यदि जल्द फंड उपलब्ध कराया जाता है तो योजना सामान्य रूप से चलती रहेगी. लेकिन देरी बढ़ने पर कई स्कूलों में भोजन व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता. ऐसे में आने वाले कुछ सप्ताह झारखंड की मध्याह्न भोजन योजना के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं.
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