RANCHI : झारखंड की राजनीति में एक बार फिर वही पुराना सवाल गूंज रहा है कि क्या इस राज्य में प्रतिभाओं की कमी है या फिर राजनीतिक दलों को झारखंड के लोगों पर भरोसा नहीं रहा. 2026 के राज्यसभा चुनाव में यह सवाल इसलिए और तेज हो गया है क्योंकि जिन दो उम्मीदवारों को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा है, उनमें से कोई भी झारखंड का नहीं है. एक ओर कांग्रेस ने अपने उम्मीदवार के तौर पर प्रणव झा पर दांव लगाया है, तो दूसरी ओर भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी मैदान में हैं.
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सवाल सिर्फ दो सीटों का नहीं
तो दूसरी ओर भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी मैदान में हैं. दिलचस्प बात यह है कि दोनों ही उम्मीदवारों का झारखंड से सीधा सामाजिक और भौगोलिक जुड़ाव नहीं है. ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर जिस राज्य ने अलग पहचान और स्वाभिमान की लंबी लड़ाई लड़कर अपना अस्तित्व हासिल किया, उसी राज्य की नुमाइंदगी के लिए स्थानीय चेहरों को क्यों नजरअंदाज किया जा रहा है. झारखंड आंदोलन की बुनियाद जल, जंगल और जमीन के अधिकारों तथा स्थानीय अस्मिता की रक्षा के लिए रखी गई थी.
आंदोलनकारियों ने सपना देखा था कि राज्य बनने के बाद यहां के आदिवासी, मूलवासी और स्थानीय प्रतिभाओं को निर्णय लेने की प्रक्रिया में प्राथमिकता मिलेगी, लेकिन राज्य गठन के 26 वर्षों बाद भी राज्यसभा जैसे महत्वपूर्ण मंच के लिए बाहरी चेहरों का चयन कई सवाल खड़े करता है. कांग्रेस प्रत्याशी प्रणव झा लंबे समय से सक्रिय राजनीति का हिस्सा रहे हैं और पार्टी संगठन में उनकी अपनी भूमिका रही है, वहीं परिमल नाथवानी देश के बड़े उद्योगपतियों में गिने जाते हैं और झारखंड से पहले भी राज्यसभा का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं. उनके समर्थक दावा करते हैं कि उन्होंने राज्य के विकास और निवेश को लेकर पहल की, जबकि विरोधियों का कहना है कि झारखंड को ऐसे प्रतिनिधि चाहिए जो यहां की मिट्टी, संस्कृति और जमीनी समस्याओं को करीब से समझते हों.
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सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या झारखंड में योग्य नेताओं और बुद्धिजीवियों का अभाव है, क्या राज्य की राजनीति में स्थानीय चेहरों की भूमिका केवल विधानसभा तक सीमित रह गई है, या फिर राज्यसभा अब राजनीतिक समीकरण साधने और रणनीतिक नियुक्तियों का मंच बनकर रह गई है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संविधान किसी भी भारतीय नागरिक को किसी भी राज्य से राज्यसभा चुनाव लड़ने का अधिकार देता है, इसलिए कानूनी रूप से इसमें कोई विवाद नहीं है, लेकिन राजनीति केवल कानून का विषय नहीं होती बल्कि वह भावनाओं, प्रतिनिधित्व और जनविश्वास से भी संचालित होती है। ऐसे में यह बहस स्वाभाविक है कि झारखंड की आवाज आखिर कौन उठाएगा, वह जो यहां की मिट्टी में पला-बढ़ा है या वह जिसे राजनीतिक दलों ने अपनी रणनीति के तहत चुना है.
18 जून को मतदान होगा और नतीजे भी सामने आ जाएंगे. यह तय हो जाएगा कि राज्यसभा की दो सीटों पर कौन पहुंचेगा, लेकिन चुनावी नतीजों से इतर एक सवाल शायद फिर भी अनुत्तरित रह जाएगा कि क्या झारखंड अपनी ही धरती पर नेतृत्व के लिए अब भी बाहरी चेहरों पर निर्भर रहेगा या आने वाले समय में राज्य की अस्मिता और स्थानीय प्रतिनिधित्व को प्राथमिकता मिलेगी. क्योंकि यह सिर्फ दो सीटों का चुनाव नहीं है, यह उस भरोसे की परीक्षा भी है कि झारखंड की आवाज उठाने का अधिकार आखिर किसे मिलना चाहिए- झारखंड को जीने वालों को या झारखंड को राजनीतिक अवसर के रूप में देखने वालों को.
सूचना : खबर में दिखाए गए दोनों तस्वीरें एआई (AI) तकनीक की सहायता से जनरेट की गई हैं. इनका उद्देश्य केवल सांकेतिक और प्रस्तुतीकरण के लिए दृश्य रूप में विषय को दर्शाना है. इन्हें वास्तविक तस्वीरें न माना जाए.
