RANCHI : पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद झारखंड की राजनीति भी अचानक गरमा गई है. राज्य में जल्द होने वाले राज्यसभा चुनाव को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ने अपनी रणनीति तेज कर दी है. राजनीतिक समीकरणों के साथ-साथ अब भावनात्मक और पारिवारिक पहलू भी इस चुनाव को दिलचस्प बना रहे हैं.
झारखंड से राज्यसभा की दो सीटें खाली होने जा रही हैं। इनमें एक सीट झामुमो संस्थापक और पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन की मानी जा रही है, जबकि दूसरी सीट भाजपा नेता दीपक प्रकाश के कार्यकाल से जुड़ी है. मौजूदा विधानसभा संख्या बल को देखते हुए एक सीट पर झामुमो की दावेदारी मजबूत मानी जा रही है, लेकिन दूसरी सीट को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है.
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सीता सोरेन के नाम पर भाजपा की रणनीति, बढ़ सकती है झामुमो की राजनीतिक मुश्किलें
सबसे ज्यादा चर्चा भाजपा की संभावित रणनीति को लेकर हो रही है. राजनीतिक गलियारों में अटकलें हैं कि भाजपा सीता सोरेन को राज्यसभा उम्मीदवार बनाकर बड़ा दांव चल सकती है. सीता सोरेन, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की बड़ी भाभी और दिवंगत दुर्गा सोरेन की पत्नी हैं. ऐसे में चुनाव केवल राजनीतिक मुकाबला नहीं रहेगा, बल्कि पारिवारिक और भावनात्मक मुद्दा भी बन सकता है.
अगर भाजपा सीता सोरेन को मैदान में उतारती है, तो झामुमो के सामने असहज स्थिति पैदा हो सकती है. पार्टी यदि उनका समर्थन नहीं करती है तो भाजपा इसे आदिवासी समाज और सोरेन परिवार के सम्मान से जोड़कर बड़ा मुद्दा बना सकती है. वहीं दूसरी ओर, अगर झामुमो किसी तरह की नरमी दिखाता है तो कांग्रेस इसे गठबंधन धर्म के खिलाफ कदम बताते हुए सवाल उठा सकती है.
राज्यसभा सीट पर कांग्रेस की नजर, गठबंधन में बढ़ सकती है अंदरूनी खींचतान
इधर कांग्रेस भी राज्यसभा में अपनी हिस्सेदारी चाहती है. पार्टी के भीतर लगातार यह मांग उठ रही है कि गठबंधन सरकार में होने के नाते उसे एक सीट मिलनी चाहिए. हालांकि फिलहाल झामुमो सीट छोड़ने के पक्ष में नजर नहीं आ रहा है. इसके बावजूद कांग्रेस खुलकर टकराव की स्थिति में जाने से बच रही है, क्योंकि झारखंड उन चुनिंदा राज्यों में शामिल है जहां कांग्रेस अभी सत्ता में साझेदार है.
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस बार झारखंड का राज्यसभा चुनाव सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं होगा. इसमें गठबंधन की मजबूती, पारिवारिक रिश्ते, आदिवासी राजनीति और विपक्ष की रणनीति सभी की बड़ी परीक्षा होने वाली है.
