RANCHI : झारखंड कांग्रेस की नई संगठनात्मक कमेटियों के गठन के बाद अब परिसीमन समिति को लेकर सियासत गरमा गई है. पार्टी द्वारा गठित पांच सदस्यीय परिसीमन समिति में किसी भी आदिवासी नेता को शामिल नहीं किए जाने पर सवाल उठने लगे हैं. राजनीतिक गलियारों में इस बात को लेकर चर्चा तेज है कि जिस राज्य की राजनीति में आदिवासी समाज की अहम भूमिका रही है, वहां परिसीमन जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर आदिवासी प्रतिनिधित्व का अभाव कई सवाल खड़े करता है.
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, झारखंड कांग्रेस ने हाल ही में नई प्रदेश कमेटी और विभिन्न समितियों का गठन किया है. इनमें अभियान समिति, समन्वय समिति, चुनाव प्रबंधन समिति और परिसीमन समिति शामिल हैं. हालांकि, परिसीमन समिति में एक भी आदिवासी सदस्य को जगह नहीं दी गई है.
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परिसीमन पर बढ़ी सियासत, आदिवासी प्रतिनिधित्व पर सवाल
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि परिसीमन का सीधा असर अनुसूचित जनजाति (ST) सीटों और आदिवासी बहुल क्षेत्रों पर पड़ सकता है. ऐसे में समिति में आदिवासी नेताओं की अनुपस्थिति को विपक्ष और सामाजिक संगठनों द्वारा बड़ा मुद्दा बनाया जा सकता है. इधर, कांग्रेस लगातार राष्ट्रीय स्तर पर परिसीमन को बड़ा राजनीतिक मुद्दा बता रही है. पार्टी का आरोप है कि केंद्र सरकार परिसीमन के जरिए राजनीतिक संतुलन बदलने की कोशिश कर रही है. कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में भी इस मुद्दे पर विस्तार से चर्चा हुई थी और पार्टी ने इसे “असल मुद्दा” बताया था.
आदिवासी प्रतिनिधित्व नहीं होने पर कांग्रेस घिरी, बढ़ सकती है राजनीतिक बहस
झारखंड की राजनीति में आदिवासी समुदाय की भागीदारी हमेशा से अहम रही है. राज्य गठन आंदोलन से लेकर सत्ता की राजनीति तक आदिवासी नेतृत्व केंद्र में रहा है. ऐसे में कांग्रेस की परिसीमन समिति में आदिवासी प्रतिनिधित्व नहीं होने को लेकर अब पार्टी के अंदर और बाहर दोनों जगह सवाल उठने लगे हैं.
हालांकि, कांग्रेस की ओर से इस मामले में अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन आने वाले दिनों में यह मुद्दा राजनीतिक बहस का बड़ा विषय बन सकता है.
