RANCHI : एक अदद सरकारी नौकरी के लिए युवा अपनी जवानी खपा देते हैं, लेकिन अभय तिवारी उर्फ मनोज कुमार तिवारी के लिए सरकारी परीक्षाएं मानो वीकेंड की शॉपिंग थीं। महज 13 साल में 12-12 कठिन प्रतियोगी परीक्षाएं पास कर डालीं टीचर, BSO, रेंज फॉरेस्ट ऑफिसर, असिस्टेंट कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट्स… लिस्ट इतनी लंबी है कि गिनीज बुक वाले भी एंट्री करने से पहले दो बार पानी पीते. लेकिन यह अद्भुत ‘प्रतिभा’ किसी तपस्या का फल नहीं थी, बल्कि सिस्टम में लगी सेंध और गजब के तिगड़म का नतीजा थी। झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) की परीक्षा धांधली की जांच जब शुरू हुई, तो इस ऑल-राउंडर ‘महामानव’ का असली खेल बेपर्दा हो गया.
TDPL कनेक्शन: जहां से छपी ‘सफलता’ की स्क्रिप्ट
अभय तिवारी गोड्डा के पोड़ैयाहाट में प्रखंड आपूर्ति पदाधिकारी (BSO) की कुर्सी पर आराम फरमा रहे थे, पर इस कुर्सी तक पहुंचने से पहले वे TSR Data Processing Private Limited (TDPL) में मार्केटिंग मैनेजर थे. यह वही TDPL है, जिसे सरकारी भर्ती परीक्षाओं की OMR शीट्स और डेटा प्रोसेसिंग का जिम्मा मिला हुआ था। यानी जिस एजेंसी के हाथ में परीक्षा की पवित्रता थी, हमारे अभय बाबू वहीं के पूर्व मैनेजर निकले. इसे मात्र ‘संयोग’ कहना संयोग शब्द की तौहीन होगी.
OMR शीट का चमत्कार
जांच में जो बातें सामने आईं, वे किसी जादुई थ्रिलर से कम नहीं हैं:
- 500 संदेहास्पद OMR शीट्स: जनवरी 2026 में ही JPSC को शिकायत मिली थी कि पुराने फॉरेस्ट रेंज ऑफिसर और ACF परीक्षाओं की करीब 500 OMR शीट्स में कलाकारी की गई है.
- जादुई फॉर्मूला: कथित तौर पर ‘खास’ अभ्यर्थियों को सलाह दी जाती थी कि वे परीक्षा हॉल में कठिन सवालों के गोले खाली छोड़ आएं. बाकी का ‘सद्कार्य’ परीक्षा खत्म होने के बाद अंदरूनी पहुंच वाले कर देते थे।
- लाखों की बोली: इस दैवीय कृपा और पक्की नौकरी के बदले अभ्यर्थियों से लाखों रुपये की वसूली की जाती थी.
रांची का होटल बना ‘ग्रुप स्टडी’ का अड्डा
परीक्षाओं की तैयारी के लिए लाइब्रेरी की जरूरत होती है, लेकिन इस हाई-टेक सिंडिकेट के लिए रांची स्टेशन रोड का एक पूरा होटल ही 11 महीने की लीज पर ले लिया गया. जांच एजेंसियों का शक है कि 2021 में लीज पर लिया गया यह होटल कोई हॉस्पिटैलिटी का बिजनेस नहीं, बल्कि अभ्यर्थियों से मिलने, सौदे तय करने और नकदी की आवाजाही का कंट्रोल रूम था.
जब ताश के पत्तों की तरह ढहा नेटवर्क
शिकायतें दबी रहीं, लेकिन जब सोशल मीडिया पर बवाल हुआ और CID/SIT मैदान में उतरी, तो ’12 नौकरियों वाले बाबू’ का तिलिस्म टूट गया:
- अभय तिवारी सलाखों के पीछे पहुंचे.
- उनके पीछे-पीछे TDPL के डायरेक्टर रामवीर सिंह भी लपेटे में आए.
- परीक्षा की शुचिता की रखवाली करने वाली JPSC की उप परीक्षा नियंत्रक श्वेता गुप्ता भी गिरफ्तार हुईं.
- JPSC कर्मी सोनू कुमार और सहयोगी अरविंद कुमार समेत गिरफ्तारियों का आंकड़ा दहाई पार कर गया.
यह सिर्फ एक शातिर BSO के पकड़े जाने का किस्सा नहीं है. असली सवाल यह है कि दागी एजेंसी को बार-बार ठेका किसकी मेहरबानी से मिला? जनवरी में आई शिकायत की फाइल पर कौन कुंडली मारकर बैठा था? अभय तिवारी इस पूरे रैकेट के ‘डायरेक्टर’ हैं या सिर्फ सिस्टम के बड़े मगरमच्छों के आगे नाचने वाली एक छोटी सी कठपुतली, इसका जवाब CID की अगली चार्जशीट तय करेगी.
