RANCHI : झारखंड की राजनीति में आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन के अधिकारों की बात लगभग हर राजनीतिक दल करता है. आदिवासी अस्मिता, संस्कृति और पहचान की रक्षा को लेकर राजनीतिक मंचों से बड़े-बड़े दावे भी किए जाते हैं. लेकिन जब एक युवा आदिवासी महिला नेत्री जमीन पर उतरकर इन मुद्दों को लेकर संघर्ष कर रही थी, तब उसे कितना राजनीतिक और सामाजिक समर्थन मिला? यह सवाल अब निशा भगत की असामयिक मृत्यु के बाद उठ रहा है.
निशा भगत की मृत्यु के बाद राजनीतिक और सामाजिक संगठनों की ओर से शोक संवेदनाएं व्यक्त की जा रही हैं. सोशल मीडिया पर भी उन्हें याद किया जा रहा है. लेकिन इस बीच एक सवाल लगातार चर्चा में है कि जब निशा भगत भू-माफिया के खिलाफ आवाज उठा रही थीं, अपनी सुरक्षा को लेकर चिंता जता रही थीं और प्रशासन से मदद मांग रही थीं, तब उनके साथ कौन खड़ा था?
निशा भगत का संघर्ष केवल किसी राजनीतिक दल या संगठन तक सीमित नहीं था. वह आदिवासी अधिकारों, सरना धर्म, पेसा कानून, जमीन की सुरक्षा और सांस्कृतिक पहचान जैसे मुद्दों पर लगातार सक्रिय रही थीं. उन्होंने इन सवालों को लेकर आंदोलन किए, पदयात्रा निकाली और राजनीतिक मंचों पर भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई.
लेकिन राजनीतिक मतभेदों के बाद जब वह अपनी पार्टी से अलग हुईं, तो उनका राजनीतिक आधार भी कमजोर पड़ गया. ऐसे में उनकी मृत्यु ने झारखंड की राजनीति और आदिवासी समाज के सामने एक असहज सवाल खड़ा कर दिया है-क्या राजनीतिक दल किसी संघर्षरत व्यक्ति के साथ केवल तब तक खड़े रहते हैं, जब तक वह उनके संगठन का हिस्सा होता है?
बेंगलुरु की नौकरी छोड़कर लौटी थीं गुमला
निशा भगत की जिंदगी का एक महत्वपूर्ण पहलू उनका सामाजिक संघर्ष है. उन्होंने होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई पूरी करने के बाद बेंगलुरु में नौकरी की थी. वह चाहतीं तो एक सामान्य शहरी जीवन जी सकती थीं, लेकिन उन्होंने झारखंड लौटकर आदिवासी समाज से जुड़े मुद्दों पर काम करने का रास्ता चुना.
उनके पिता हांदू भगत झारखंड आंदोलन से जुड़े रहे हैं. बताया जाता है कि पिता के सामाजिक और राजनीतिक विचारों का निशा पर गहरा प्रभाव था. झारखंड में आदिवासी जमीन पर कथित अवैध कब्जे, सांस्कृतिक पहचान और संवैधानिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों ने उन्हें सामाजिक गतिविधियों की ओर प्रेरित किया. गुमला लौटने के बाद उन्होंने आदिवासी समाज के मुद्दों पर सक्रियता बढ़ाई. उनका मानना था कि जल, जंगल और जमीन की रक्षा के बिना आदिवासी समाज की पहचान सुरक्षित नहीं रह सकती.
सरना धर्म और डी-लिस्टिंग के मुद्दे पर किया था प्रदर्शन
निशा भगत के संघर्ष का एक चर्चित अध्याय सरना धर्म और डी-लिस्टिंग की मांग से जुड़ा रहा. उन्होंने धर्मांतरण के बाद अनुसूचित जनजाति की सूची में बने रहने के मुद्दे पर अपनी असहमति जाहिर की थी. उनका तर्क था कि धर्मांतरित आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति की सूची से बाहर करने पर विचार होना चाहिए, ताकि मूल आदिवासी समुदाय के अधिकारों और आरक्षण की रक्षा की जा सके.

इस मांग को लेकर उन्होंने दिसंबर 2025 में रांची में राजभवन के सामने प्रदर्शन किया था. इस दौरान उन्होंने सार्वजनिक रूप से मुंडन कराकर अपना विरोध दर्ज कराया. उनके इस प्रदर्शन की चर्चा झारखंड के साथ दूसरे राज्यों में भी हुई थी. हालांकि, डी-लिस्टिंग का मुद्दा आदिवासी समाज के भीतर भी अलग-अलग विचारों और मतभेदों का विषय रहा है. निशा भगत इस बहस में अपनी स्पष्ट वैचारिक स्थिति के साथ सक्रिय थीं.
पेसा कानून लागू कराने के लिए निकाली थी पदयात्रा
निशा भगत का एक अन्य महत्वपूर्ण संघर्ष पेसा कानून को पूरी तरह लागू कराने की मांग से जुड़ा था. जुलाई 2025 में उन्होंने गुमला जिले के सिसई प्रखंड स्थित आदिवासी नेता कार्तिक उरांव के समाधि स्थल से रांची तक पदयात्रा का नेतृत्व किया था. इस पदयात्रा के जरिए उन्होंने अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभाओं को अधिकार देने और आदिवासियों के स्वशासन से जुड़े पेसा कानून को प्रभावी ढंग से लागू करने की मांग उठाई थी.

बताया जाता है कि इस यात्रा में बड़ी संख्या में ग्रामीण महिलाएं और युवा शामिल हुए थे. करीब 40 किलोमीटर की इस पदयात्रा के माध्यम से निशा ने आदिवासी अधिकारों के सवाल को फिर से राजनीतिक चर्चा के केंद्र में लाने की कोशिश की थी. इसके अलावा वह छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (सीएनटी) और संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम (एसपीटी) की रक्षा को लेकर भी मुखर थीं.
भू-माफिया के खिलाफ संघर्ष और प्रशासन से शिकायत
निशा भगत के संघर्ष का सबसे संवेदनशील पहलू जमीन से जुड़े विवादों को लेकर सामने आया. वह रांची और आसपास के इलाकों में आदिवासियों की जमीन पर कथित अवैध कब्जे के खिलाफ आवाज उठा रही थीं. इस दौरान उन्होंने भू-माफिया और जमीन के कारोबार से जुड़े लोगों पर गंभीर आरोप लगाए थे. उनके पिता हांदू भगत की ओर से पुलिस में दर्ज कराई गई शिकायत के अनुसार, निशा को सोशल मीडिया पर निशाना बनाया जा रहा था. उनके चरित्र पर कथित रूप से लांछन लगाए जा रहे थे और उन्हें अपमानजनक टिप्पणियों का सामना करना पड़ रहा था.

परिवार की शिकायत में घर में चोरी या डकैती की घटना का भी उल्लेख किया गया था.इस संबंध में पिठौरिया थाने में शिकायत और पुलिस से मदद मांगने की बात सामने आई थी. निशा के अंतिम सोशल मीडिया संदेशों और वीडियो में भी उनकी परेशानी तथा व्यवस्था के प्रति नाराजगी दिखाई देने की बात कही जा रही है. हालांकि, इन सभी आरोपों और घटनाओं की स्वतंत्र जांच जरूरी है. यह भी जांच का विषय है कि उन्होंने अपनी सुरक्षा को लेकर कब-कब प्रशासन से संपर्क किया और उन शिकायतों पर क्या कार्रवाई हुई.
चुनाव लड़ी, फिर राजनीतिक रूप से पड़ गईं अकेली
निशा भगत ने अपने सामाजिक संघर्ष को राजनीतिक स्तर पर आगे बढ़ाने की भी कोशिश की थी. वर्ष 2024 के झारखंड विधानसभा चुनाव में उन्होंने झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (जेएलकेएम) के टिकट पर गुमला विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा था. हालांकि, उन्हें जीत नहीं मिली.

बाद में पार्टी के साथ वैचारिक मतभेद सामने आए और उन्हें संगठन से निष्कासित कर दिया गया. इसके बाद वह राजनीतिक रूप से अलग-थलग पड़ गईं. यहीं से राजनीतिक दलों की भूमिका को लेकर सवाल उठ रहे हैं. झारखंड में आदिवासी अधिकारों की राजनीति करने वाले कई दल और संगठन हैं. कोई सरना धर्म की बात करता है, कोई सीएनटी-एसपीटी कानून की रक्षा का दावा करता है, तो कोई आदिवासी अस्मिता और जमीन की सुरक्षा को अपना प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बताता है.
लेकिन निशा भगत जैसे कार्यकर्ताओं को जब जमीन पर संघर्ष करना पड़ता है, तो क्या संगठन उनके साथ खड़े होते हैं? क्या उन्हें कानूनी सहायता, सुरक्षा और राजनीतिक समर्थन मिलता है? उनकी मृत्यु के बाद सामने आ रही संवेदनाओं के बीच इन सवालों पर चर्चा जरूरी है.
मौत के बाद सोशल मीडिया पर संवेदनाएं, लेकिन संघर्ष के दिनों में कौन था साथ?
निशा भगत की मृत्यु के बाद सोशल मीडिया पर उनके पुराने वीडियो और संदेश साझा किए जा रहे हैं. कई लोग उनके संघर्ष को याद कर रहे हैं और उन्हें आदिवासी समाज की मुखर आवाज बता रहे हैं. लेकिन यह घटना समाज के सामने एक और सवाल रखती है-क्या हम किसी व्यक्ति के संघर्ष को उसके जीवित रहते उतनी गंभीरता से लेते हैं, जितनी उसकी मृत्यु के बाद लेते हैं?

जब कोई महिला जमीन के अधिकारों के लिए आवाज उठाती है, कथित भू-माफिया के खिलाफ शिकायत करती है और अपनी सुरक्षा को लेकर चिंता जताती है, तो क्या समाज, राजनीतिक संगठन और प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं बनती कि समय रहते उसकी बात सुनी जाए?
निशा भगत के मामले में उठे आरोपों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए. उनकी ओर से की गई शिकायतों, पुलिस की कार्रवाई और जमीन विवाद से जुड़े तथ्यों को सामने लाना जरूरी है. किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद केवल शोक संदेश देना पर्याप्त नहीं है. जरूरी यह है कि उन परिस्थितियों की पड़ताल हो, जिनमें वह लगातार परेशानियों का सामना कर रही थीं.
अब सवाल केवल निशा भगत का नहीं, व्यवस्था का भी है
निशा भगत की मृत्यु ने झारखंड में महिला सुरक्षा, आदिवासी अधिकारों और राजनीतिक संगठनों की जवाबदेही को लेकर गंभीर बहस खड़ी कर दी है. एक युवा आदिवासी महिला नेत्री, जिसने अपनी पढ़ाई और नौकरी के बाद सामाजिक संघर्ष का रास्ता चुना, जिसने पेसा कानून से लेकर जमीन की सुरक्षा तक कई मुद्दों पर आवाज उठाई, उसके जीवन के अंतिम दिनों में सामने आई परेशानियों की जांच जरूरी है.
यह भी जरूरी है कि प्रशासन उनकी ओर से की गई शिकायतों को लेकर स्थिति स्पष्ट करे. यदि किसी स्तर पर लापरवाही हुई है, तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए. साथ ही, सोशल मीडिया पर उन्हें निशाना बनाने और कथित तौर पर धमकाने के आरोपों की भी जांच होनी चाहिए. निशा भगत की मृत्यु को केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी मानकर भूल जाना उचित नहीं होगा. यह घटना उन तमाम महिलाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं की सुरक्षा पर सवाल उठाती है, जो अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाते हैं और कई बार अकेले पड़ जाते हैं.
सबसे बड़ा सवाल यही है कि निशा भगत के संघर्ष के दिनों में राजनीतिक दल कहां थे? उनकी शिकायतों पर व्यवस्था ने कितनी गंभीरता दिखाई? और क्या उनकी मृत्यु के बाद उमड़ी संवेदनाएं झारखंड में आदिवासी महिलाओं की सुरक्षा और अधिकारों को लेकर किसी ठोस बदलाव का आधार बनेंगी? इन सवालों के जवाब केवल शोक संदेशों से नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच, जवाबदेही और ठोस कार्रवाई से मिलेंगे.
