RANCHI : झारखंड हाईकोर्ट ने नाबालिग बच्ची की कस्टडी से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि हनाफी मुस्लिम कानून के तहत बेटी के बालिग होने तक उसकी हिजानत यानी कस्टडी का प्राथमिक अधिकार मां को प्राप्त है. हालांकि, अदालत ने यह भी साफ किया कि कस्टडी के किसी भी मामले में बच्चे का कल्याण सबसे सर्वोपरि रहेगा. जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की डिवीजन बेंच ने रांची स्थित एडिशनल फैमिली कोर्ट के उस एकतरफा आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें मां को करीब चार साल की बेटी को एक सप्ताह के भीतर पिता को सौंपने का निर्देश दिया गया था.
फैमिली कोर्ट के एकतरफा आदेश को हाईकोर्ट ने किया रद्द
मामला एक दंपति के बीच बच्ची की कस्टडी को लेकर था. दंपति का निकाह 6 सितंबर 2020 को मुस्लिम रीति-रिवाज के अनुसार हुआ था. इसके बाद 11 जनवरी 2022 को उनकी बेटी का जन्म हुआ. आपसी मतभेद के बाद मां 2 मार्च 2022 से बच्ची को अपने साथ लेकर अलग रहने लगी. इसके बाद पिता ने बच्ची की कस्टडी हासिल करने के लिए गार्जियनशिप सूट दाखिल किया. फैमिली कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए इसे एकतरफा चलाया और बाद में पिता के पक्ष में फैसला सुना दिया. आदेश में मां को बच्ची को एक सप्ताह के भीतर पिता को सौंपने का निर्देश दिया गया था. इसके खिलाफ मां ने झारखंड हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया. मां की ओर से दलील दी गई कि उन्हें मामले में सुनवाई का उचित अवसर नहीं मिला और गार्जियनशिप केस का नोटिस भी उन्हें विधिवत प्राप्त नहीं हुआ था.
हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट की प्रक्रिया पर उठाए सवाल
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड देखने के बाद पाया कि फैमिली कोर्ट ने 13 अक्टूबर 2025 को मामले को एकतरफा घोषित कर दिया था, जबकि अंतिम फैसला 19 मई 2026 को सुनाया गया. डिवीजन बेंच ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने सिविल प्रक्रिया संहिता के प्रावधानों का पालन किए बिना जल्दबाजी में एकतरफा कार्रवाई की. अदालत ने यह भी गौर किया कि महिला उसी फैमिली कोर्ट में भरण-पोषण यानी मेंटेनेंस से जुड़े मामले में लगातार पेश हो रही थी. इसके बावजूद गार्जियनशिप केस की जानकारी उसे नहीं दिए जाने की बात सामने आई.
हनाफी कानून में मां को बेटी की कस्टडी का प्राथमिक अधिकार
मुस्लिम कानून के तहत हिजानत यानी बच्चे की कस्टडी के प्रावधानों का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि हनाफी कानून के अनुसार मां को बेटे की सात वर्ष की उम्र तक और बेटी के बालिग होने तक कस्टडी का प्राथमिक अधिकार माना जाता है. हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि यह अधिकार पूर्ण या सर्वोपरि नहीं है. कस्टडी के मामलों में सबसे महत्वपूर्ण पहलू बच्चे का कल्याण और उसका सर्वोत्तम हित है.
दोनों पक्षों को सुनना जरूरी
हाईकोर्ट ने कहा कि नाबालिग बच्चे की कस्टडी जैसे संवेदनशील मामले में किसी एक पक्ष को सुने बिना फैसला नहीं किया जा सकता. दोनों पक्षों को उचित अवसर देना जरूरी है, ताकि अदालत बच्चे के हित को ध्यान में रखते हुए निष्पक्ष फैसला कर सके. इसी आधार पर हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के एकतरफा आदेश को रद्द करते हुए मामले को कानून के अनुसार आगे सुनवाई के लिए वापस भेज दिया.
इसे भी पढ़े : मानसून की विदाई के बीच बदला मौसम, रांची समेत 14 जिलों में बारिश और तेज हवा का अलर्ट
