Ranchi : झारखंड में वन अधिकार कानून (Forest Rights Act-FRA) लागू होने के करीब दो दशक बाद भी बड़ी संख्या में आदिवासी अपने अधिकारों की पूर्ण मान्यता का इंतजार कर रहे हैं. जंगलों और वन भूमि पर पीढ़ियों से निर्भर समुदायों का सवाल है कि जब उनकी आजीविका,खेती और सामाजिक जीवन का आधार वन हैं, तो उन्हें सामुदायिक वन अधिकारों के तहत अब तक व्यापक स्तर पर अधिकार पत्र (पट्टा) क्यों नहीं मिल सके हैं.

वर्ष 2006 में संसद ने अनुसूचित जनजाति एवं अन्य पारंपरिक वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम पारित किया था, जिसे 2008 में लागू किया गया. इस कानून का उद्देश्य वनवासियों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय को दूर करना और उन्हें उनकी पुश्तैनी भूमि तथा वन संसाधनों पर कानूनी अधिकार प्रदान करना था. कानून के तहत व्यक्तिगत और सामुदायिक दोनों प्रकार के वन अधिकारों को मान्यता दी गई है. साथ ही ग्राम सभाओं को वन संरक्षण, प्रबंधन और संसाधनों के उपयोग में महत्वपूर्ण भूमिका सौंपी गई है.
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देशभर में लाखों दावों का निपटारा, लेकिन झारखंड की रफ्तार धीमी
जनजातीय कार्य मंत्रालय के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, देशभर में वन अधिकार कानून के तहत अब तक 51 लाख से अधिक दावे दाखिल किए जा चुके हैं. इनमें से 25 लाख से अधिक दावों को मंजूरी दी गई है, जबकि 43 लाख से अधिक मामलों का निपटारा किया जा चुका है.
हालांकि झारखंड में दावों के निपटारे की गति राष्ट्रीय औसत की तुलना में धीमी दिखाई देती है. राज्य में सामुदायिक वन अधिकार (CFR) के लिए लगभग 4 हजार दावे दाखिल किए गए, लेकिन इनमें से केवल करीब 2 हजार मामलों का ही निपटारा हो सका है.
वहीं व्यक्तिगत वन अधिकार पट्टों के लिए दाखिल लगभग 1 लाख 53 हजार दावों में से करीब 1 लाख 4 हजार मामलों का निपटारा किया गया है. इसके बावजूद हजारों दावे अब भी विभिन्न स्तरों पर लंबित हैं, जिसके कारण बड़ी संख्या में आदिवासी परिवार अधिकार पत्र मिलने की प्रतीक्षा कर रहे हैं.
अन्य राज्यों की तुलना में पीछे झारखंड
वन अधिकार कानून के क्रियान्वयन के मामले में महाराष्ट्र, ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और तेलंगाना को अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों में गिना जाता है. इन राज्यों में सामुदायिक वन अधिकारों की मान्यता और दावों के निपटारे की प्रक्रिया अधिक तेज रही है.
इसके विपरीत झारखंड, गुजरात, राजस्थान, जम्मू-कश्मीर तथा पूर्वोत्तर के कई राज्यों में दावों के निपटारे की प्रक्रिया अपेक्षाकृत धीमी बताई जाती है. विशेषज्ञों का मानना है कि प्रशासनिक प्रक्रियाओं की जटिलता, जागरूकता की कमी और स्थानीय स्तर पर समन्वय की चुनौतियां इसके प्रमुख कारणों में शामिल हैं.
अधिकारों की मान्यता में देरी से बढ़ रही नाराजगी
वन अधिकारों के मुद्दे पर लंबे समय से काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता जेम्स हेरेंज का कहना है कि झारखंड में बड़ी संख्या में आदिवासी परिवार आज भी उन अधिकारों से वंचित हैं, जिन्हें कानून ने लगभग दो दशक पहले मान्यता दी थी.
उनके अनुसार, विशेष रूप से सामुदायिक वन अधिकारों के मामलों में हो रही देरी से ग्रामीण और आदिवासी समुदायों में असंतोष बढ़ रहा है. उनका मानना है कि यदि वन अधिकार कानून का प्रभावी ढंग से क्रियान्वयन किया जाए, तो इससे न केवल भूमि और संसाधनों पर समुदायों के अधिकार मजबूत होंगे, बल्कि जंगलों के संरक्षण और प्रबंधन में स्थानीय लोगों की भागीदारी भी बढ़ेगी.
ग्राम सभाओं को अधिकार सौंपने की मांग
आदिवासी संगठनों और वन अधिकार कार्यकर्ताओं ने राज्य सरकार से लंबित दावों के शीघ्र निपटारे की मांग की है. उनका कहना है कि सामुदायिक वन अधिकारों की व्यापक मान्यता और ग्राम सभाओं को कानून के अनुरूप अधिकारों का हस्तांतरण आवश्यक है.
संगठनों का तर्क है कि वन अधिकार कानून की वास्तविक सफलता तभी मानी जाएगी, जब जंगलों की रक्षा करने वाले समुदायों को उनके वैधानिक अधिकार पूरी तरह मिल सकें. उनका कहना है कि अधिकार पत्रों के वितरण में देरी न केवल कानून की मूल भावना को प्रभावित करती है, बल्कि वनवासियों के सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण की प्रक्रिया को भी धीमा करती है.
क्यों महत्वपूर्ण है सामुदायिक वन अधिकार ?
सामुदायिक वन अधिकारों के तहत ग्राम सभाओं को अपने पारंपरिक वन क्षेत्रों के संरक्षण, प्रबंधन और उपयोग का अधिकार मिलता है. इसके माध्यम से स्थानीय समुदाय वन उपज के संग्रहण, जल स्रोतों के संरक्षण और जैव विविधता के प्रबंधन में अधिक प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि झारखंड में लंबित दावों का समयबद्ध निपटारा किया जाता है, तो इससे आदिवासी समुदायों की आजीविका मजबूत होगी, स्थानीय स्वशासन को बढ़ावा मिलेगा और वन संरक्षण की प्रक्रिया भी अधिक सहभागी और टिकाऊ बन सकेगी.
फिलहाल, वन अधिकार कानून लागू होने के करीब 20 वर्ष बाद भी झारखंड के हजारों आदिवासी परिवार और सैकड़ों ग्राम सभाएं अपने अधिकारों की औपचारिक मान्यता और पट्टों की प्रतीक्षा कर रही हैं. यही कारण है कि वन अधिकारों का मुद्दा राज्य में एक बार फिर चर्चा और मांगों के केंद्र में आ गया है.
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