RANCHI : भारतीय खेल जगत के लिए एशियन गेम्स का यह प्रदर्शन ऐतिहासिक रहा. खास बात यह है कि इस स्वर्णिम सफलता में झारखंड की छह महिला खिलाड़ियों की अहम भूमिका रही. हॉकी और रिकर्व तीरंदाजी में झारखंड की बेटियों ने शानदार प्रदर्शन करते हुए देश की झोली में दो ऐतिहासिक स्वर्ण पदक डाले. भारतीय महिला हॉकी टीम ने 44 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक अपने नाम किया.
टीम की कमान सिमडेगा की रहने वाली स्टार खिलाड़ी सलीमा टेटे के हाथों में रही. उनके साथ झारखंड की ओलंपियन निक्की प्रधान, ब्यूटी डुंगडुंग और दीपिका सोरेंग भी भारतीय टीम का हिस्सा रहीं. वहीं, रिकर्व तीरंदाजी में जमशेदपुर स्थित टाटा आर्चरी अकादमी की अंकिता भकत और हजारीबाग एसटीसी पदमा की पूर्व प्रशिक्षु कीर्ति शर्मा ने भी शानदार प्रदर्शन किया और भारत को एक और ऐतिहासिक गोल्ड दिलाने में योगदान दिया.
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गांव के मैदान से भारतीय हॉकी टीम की कप्तानी तक पहुंचीं सलीमा टेटे
सिमडेगा के बड़की छापर गांव की रहने वाली सलीमा टेटे के लिए हॉकी महज एक खेल नहीं, बल्कि बचपन से ही उनकी जिंदगी का हिस्सा रही है. उनके पिता सुलक्षण टेटे स्थानीय हॉकी खिलाड़ी होने के साथ किसान भी रहे हैं. सलीमा बचपन में अपने पिता के साथ गांव में होने वाले हॉकी टूर्नामेंट देखने जाया करती थीं. यहीं से उनके भीतर हॉकी के प्रति जुनून पैदा हुआ. बाद में सिमडेगा के प्रशिक्षण केंद्र में कोच प्रतिमा बरवा के मार्गदर्शन ने उनकी प्रतिभा को सही दिशा दी. सीमित संसाधनों वाले ग्रामीण परिवेश से निकलकर सलीमा ने कड़ी मेहनत के दम पर 2017 में भारतीय सीनियर टीम में जगह बनाई. आज वही सलीमा भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तान हैं.
बांस की स्टिक और गेंद से शुरू हुआ निक्की प्रधान का सफर
खूंटी के हेसल गांव की निक्की प्रधान की कहानी भी संघर्ष और जुनून की मिसाल है. गांव में खेल सुविधाएं बेहद सीमित थीं. निक्की ने बचपन में बांस की स्टिक और बांस की गेंद से हॉकी खेलना शुरू किया. स्कूल के शिक्षक दशरथ महतो ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया. आठवीं कक्षा के बाद निक्की को रांची के बरियातू स्थित बालिका हॉकी सेंटर भेजा गया, जहां उन्हें बेहतर प्रशिक्षण और आगे बढ़ने का मंच मिला. परिवार की शुरुआती झिझक और गांव की कठिन परिस्थितियों के बावजूद निक्की ने अपनी मेहनत जारी रखी और राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई. वह भारतीय हॉकी टीम की अहम खिलाड़ी बनीं और ओलंपिक तक देश का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं.
उधार के उपकरणों से अभ्यास, फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर चमकीं अंकिता भकत
कोलकाता में पली-बढ़ीं अंकिता भकत का शुरुआती जीवन भी आसान नहीं था. उनके पिता शांतनु भकत दूध बेचकर परिवार चलाते थे. तीरंदाजी के महंगे उपकरण खरीदना परिवार के लिए आसान नहीं था. अंकिता ने स्थानीय क्लब में उधार के उपकरणों से तीरंदाजी का अभ्यास शुरू किया. उनकी प्रतिभा को देखते हुए 2014 में महज 16 साल की उम्र में उन्हें जमशेदपुर स्थित टाटा आर्चरी अकादमी से जुड़ने का मौका मिला. टाटा आर्चरी अकादमी में पद्मश्री पूर्णिमा महतो और कोच धर्मेंद्र तिवारी जैसे प्रशिक्षकों के मार्गदर्शन में उनकी प्रतिभा को अंतरराष्ट्रीय स्तर के लिए तराशा गया. इसके बाद अंकिता ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में अपनी पहचान बनाई और अब एशियन गेम्स में भारत की स्वर्णिम सफलता का हिस्सा बनीं.
झारखंड की बेटियों ने दिखाया, हुनर को सिर्फ एक मौके की जरूरत
सलीमा टेटे से लेकर निक्की प्रधान और अंकिता भकत तक, इन खिलाड़ियों की कहानियों में एक समान बात नजर आती है – संसाधनों की कमी के बावजूद सपनों की कमी नहीं थी. गांव के छोटे मैदानों, बांस की हॉकी स्टिक और उधार के तीरंदाजी उपकरणों से शुरू हुआ सफर अब एशियन गेम्स के स्वर्ण पदक तक पहुंच चुका है. झारखंड की इन बेटियों ने एक बार फिर साबित किया है कि सही प्रशिक्षण, मेहनत और मौका मिले तो छोटे शहर और गांव की प्रतिभाएं भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश का नाम रोशन कर सकती हैं.
