RANCHI : झारखंड में प्रतियोगी परीक्षाओं का मतलब अब मेहनत, किताबें और लाइब्रेरी नहीं, बल्कि सही होटल, मजबूत दलाल और तगड़ी ‘डील’ बन चुका है. जेपीएससी-जेएसएससी की जिस व्यवस्था को नौजवानों के भविष्य की रखवाली करनी थी, उसने असल में अपनी दुकानों पर ‘नौकरी सेल’ का बोर्ड टांग रखा था. अभय तिवारी के कारनामों के बाद अब इस सिंडिकेट की जो नई परतें खुली हैं, वे साबित करती हैं कि सिस्टम सड़ा नहीं है, बल्कि सिस्टम ही इस काले कारोबार का पार्टनर बनकर बैठा था.
रैडिसन ब्लू से मोरहाबादी तक ऐसे बना ‘मेगा भर्ती प्लान’
सीआईडी के सामने हुए कबूलनामे बताते हैं कि परीक्षा कराने वाली दागी कंपनी TDPL को जेपीएससी का काम कोई मेरिट देखकर नहीं सौंपा गया था. इसके पीछे पूरे दो करोड़ रुपये की सीधी घूस और बिलिंग का 20 प्रतिशत कमीशन तत्कालीन अध्यक्ष एल. ख्यांगते की तिजोरी में पहुंचाने का ‘शानदार’ समझौता हुआ था. इस पूरी सेटिंग का सूत्रधार मुख्य सचिव आवास का कर्मचारी धर्मेंद्र था, जिसने अपना अलग से 20-25 लाख रुपये का सेवा शुल्क तय कर रखा था. डील को अमलीजामा पहनाने के लिए पहले रांची के आलीशान होटल रैडिसन ब्लू में गुप्त बैठकें हुईं और फिर मोरहाबादी मैदान की छांव में अंतिम रूप दिया गया. विडंबना देखिए जिस ऐतिहासिक मोरहाबादी मैदान में नौजवान अपने हक और न्याय के लिए लाठियां खाते हैं, उसी मैदान में बैठकर अधिकारियों और दलालों ने कुर्सियों की कीमत तय कर डाली.
48 सवाल हल करने पर भी सिलेक्शन: जादू या सिर्फ सेटिंग?
जून 2025 में एग्रीमेंट मिलने के बाद TDPL ने अपना ‘चमत्कार’ दिखाना शुरू कर दिया. 14वीं सिविल सेवा परीक्षा का रिजल्ट जब 2 जुलाई को आया, तो कटऑफ का कोई अता-पता नहीं था, लेकिन 48 सवाल हल करने वाले ‘महानुभाव’ अफसर बनने की लिस्ट में चमक रहे थे. रिजल्ट भी ऐसा क्रांतिकारी था जिस पर आयोग के सदस्यों के हस्ताक्षर तक जरूरी नहीं समझे गए. जब विधायक जयराम महतो के पत्रों और चौतरफा विरोध के बाद बवाल बढ़ा, तब जाकर सोई हुई जांच एजेंसियों की नींद खुली.
इस्तीफे, गिरफ्तारियां और परीक्षाओं का सामूहिक दाह संस्कार
सीआईडी के एक्टिव होते ही सिस्टम का यह ताश का महल ढहने लगा. 20 जुलाई को जेपीएससी दफ्तर में छापेमारी हुई और तत्कालीन अध्यक्ष एल. ख्यांगते ने चुपचाप इस्तीफा सौंपने में ही भलाई समझी. इसके बाद घबराहट में आयोग ने आनन-फानन में सिविल जज और एपीओ समेत तमाम 9 भर्ती परीक्षाएं रद्द या स्थगित कर दीं.32 घंटे की मैराथन पूछताछ और छापों के बाद अब तक 19 किरदार जेल पहुंच चुके हैं जिनमें कंपनी के निदेशक, मैनेजर, उप परीक्षा नियंत्रक श्वेता गुप्ता, ऑपरेटर धर्मेंद्र और फर्जी तरीके से पास होने वाले अभ्यर्थी शामिल हैं।
असली आका कब नपेंगे?
सड़कों पर छात्रों का आक्रोश, विधानसभा घेराव और 19 गिरफ्तारियों के बाद भी असली सवाल वहीं खड़ा है। क्या यह खेल सिर्फ इन 19 मोहरों तक सीमित था या पर्दे के पीछे उन कोचिंग माफियाओं और सफेदपोशों के चेहरे भी हैं जिन्हें अब तक बचाया जा रहा है? जेपीएससी की यह लूट तो बस एक ट्रेलर थी, असली तबाही तो जेएसएससी-सीजीएल में मची, जहां बोकारो के कमरों में 1.80 करोड़ की डील्स पर पेपर रटवाए जा रहे थे। जब तक इस पूरे नेक्सस की जड़ें नहीं खोदी जातीं, तब तक झारखंड के बेरोजगारों के लिए हर परीक्षा सिर्फ एक नया धोखा साबित होती रहेगी।
