RANCHI : IAS संजीव बेसरा… क्या सड़क पर मरने वाले लोगों की मौत भी आपके लिए सिर्फ एक आंकड़ा है? सड़क हादसों में लोग मरते रहे. परिवार उजड़ते रहे. किसी घर का बेटा गया, किसी का पति, किसी का पिता और किसी का भाई. लेकिन जिस व्यवस्था की जिम्मेदारी सड़क सुरक्षा मजबूत करने की है, उसी व्यवस्था के सामने अब सवाल खड़ा है कि 166 करोड़ रुपये की रोड सेफ्टी योजनाओं की प्रगति आखिर इतनी सुस्त क्यों है? और इस सवाल के केंद्र में हैं IAS संजीव बेसरा, जो झारखंड के परिवहन आयुक्त हैं.
मामला मामूली नहीं है. 166 करोड़ रुपये की योजनाएं सड़क हादसों और मौतों को कम करने के लिए मंजूर हुई थीं. ब्लैक स्पॉट सुधरने थे, संवेदनशील जगहों पर सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होनी थी, CCTV, ANPR और दूसरे रोड सेफ्टी सिस्टम लगने थे. लेकिन योजनाओं की अपेक्षित प्रगति नहीं हुई.
अब विभाग ने मांगा संजीव बेसरा से दूसरी बार स्पष्टीकरण
यानी जनता की जान बचाने के लिए मंजूर करोड़ों रुपये की योजनाओं पर काम की रफ्तार पूछने के लिए सरकार को दूसरी बार नोटिस भेजना पड़ रहा है. कमाल है साहब! सड़क पर मौत की रफ्तार तेज है और रोड सेफ्टी की फाइल की रफ्तार इतनी धीमी कि उसे चलाने के लिए भी नोटिस भेजना पड़ रहा है.
सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर 166 करोड़ रुपये सड़क सुरक्षा के लिए हैं, तो इनका असर जमीन पर कितना दिखा? कितने ब्लैक स्पॉट सुधरे? कितने CCTV और ANPR सिस्टम लगे? कितने दुर्घटना संभावित स्थान सुरक्षित हुए? और जिन योजनाओं को समय पर पूरा होना था, वे अब तक अपेक्षित गति से क्यों नहीं बढ़ सकीं? क्या परिवहन विभाग को सिर्फ हादसे के बाद आंकड़े गिनने के लिए रखा गया है या हादसे रोकने की भी कोई जिम्मेदारी है?

करोड़ों की योजना, लेकिन जवाब के लिए दूसरी बार नोटिस
रिपोर्ट के मुताबिक विभाग पहले भी संजीव बेसरा से स्पष्टीकरण मांग चुका था. जवाब समय पर नहीं मिलने के बाद अब दूसरी बार जवाब तलब किया गया है. यानी मामला सिर्फ योजना की धीमी प्रगति तक सीमित नहीं है. सवाल यह भी है कि पहली बार मांगे गए स्पष्टीकरण का जवाब समय पर क्यों नहीं दिया गया? जनता के पैसे से चलने वाली योजना में देरी हो, तो जवाबदेही तय होनी चाहिए. और जब योजना का उद्देश्य सीधे लोगों की जान बचाना हो, तब तो जवाबदेही और भी गंभीर हो जाती है. क्योंकि सड़क पर मरने वाला कोई आंकड़ा नहीं होता. उसके पीछे एक पूरा परिवार होता है.
अब संजीव बेसरा को जवाब देना होगा
166 करोड़ रुपये की रोड सेफ्टी योजनाओं पर सवाल उठ रहे हैं. विभाग दूसरी बार स्पष्टीकरण मांग रहा है. ऐसे में अब सिर्फ फाइल में जवाब नहीं, काम का हिसाब चाहिए. सरकार को यह बताना चाहिए कि पिछले महीनों में सड़क सुरक्षा के लिए स्वीकृत राशि का कितना इस्तेमाल हुआ और उसका जमीन पर क्या परिणाम आया.
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और संजीव बेसरा को भी बताना होगा कि आखिर उन योजनाओं की अपेक्षित प्रगति क्यों नहीं हुई. क्योंकि कुर्सी सिर्फ अधिकार नहीं देती, जिम्मेदारी भी देती है. अगर सड़क सुरक्षा की योजनाएं ही धीमी पड़ जाएं, तो सवाल उठेगा ही कि आखिर परिवहन विभाग की प्राथमिकता क्या है? सड़क पर लोगों की जिंदगी या सरकारी फाइलों की जिंदगी? और यही सवाल अब IAS संजीव बेसरा के सामने खड़ा है.
