RANCHI : सोनम वांगचुक को भले ही पुलिस ने जंतर-मंतर से हटाकर हिरासत में ले लिया हो. लेकिन इससे एक सवाल और गहरा हो गया है कि क्या किसी आंदोलनकारी को हटाने भर से उसके विचारों और उसकी मांगों को भी खत्म किया जा सकता है? इतिहास गवाह है कि विचारों को कभी गिरफ्तार नहीं किया जा सकता. उन्हें केवल संवाद और समाधान से ही जवाब दिया जा सकता है.

क्या महात्मा गांधी के देश में सत्याग्रह की भी अब कोई जगह नहीं रही?
सर्वोच्च न्यायालय के कई फैसलों में यह स्पष्ट किया गया है कि किसी भी अनशनकारी के जीवन और स्वास्थ्य की रक्षा करना राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी है. लेकिन यह जिम्मेदारी किसी नागरिक के शांतिपूर्ण विरोध और अपनी बात रखने के मौलिक अधिकार को समाप्त करने का लाइसेंस नहीं बन सकती. संविधान प्रत्येक नागरिक को शांतिपूर्ण तरीके से अपनी आवाज उठाने का अधिकार देता है. ऐसे में यदि कोई व्यक्ति अहिंसक तरीके से अपनी मांगों को लेकर अनशन पर बैठता है. तो लोकतांत्रिक व्यवस्था की पहली जिम्मेदारी उससे संवाद करना होनी चाहिए. न कि उसे बलपूर्वक हटाना. सोनम वांगचुक का आंदोलन केवल एक व्यक्ति का आंदोलन नहीं रह गया है. यह उन लाखों युवाओं, छात्रों और नागरिकों की भावनाओं का प्रतीक बन गया है जो व्यवस्था से जवाब चाहते हैं. जंतर-मंतर से उन्हें हटाया जा सकता है. लेकिन उनके आंदोलन ने लोगों के मन में जो चेतना पैदा की है. उसे किसी पुलिस कार्रवाई या प्रशासनिक आदेश से खत्म नहीं किया जा सकता.
इसे भी पढ़े : रांची: सरकारी जमीन पर अतिक्रमण के खिलाफ नगर निगम सख्त
यह पूरा घटनाक्रम एक बार फिर महात्मा गांधी के सत्याग्रह की याद दिलाता है. गांधीजी ने दुनिया को सिखाया था कि अहिंसा और नैतिक शक्ति किसी भी सत्ता से अधिक प्रभावशाली होती है. आज जब एक शांतिपूर्ण अनशन राष्ट्रीय बहस का विषय बन रहा है. तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या हम गांधी के विचारों से दूर होते जा रहे हैं. या फिर वही विचार आज भी सत्ता से जवाब मांगने का सबसे प्रभावी लोकतांत्रिक माध्यम हैं.लोकतंत्र की असली ताकत विरोध की आवाज को दबाने में नहीं. बल्कि उसे सुनने और उसका समाधान खोजने में होती है. सरकारें आती-जाती रहती हैं. लेकिन लोकतांत्रिक परंपराएं और संवैधानिक अधिकार हमेशा कायम रहने चाहिए. किसी भी सरकार की परिपक्वता इस बात से तय होती है कि वह असहमति को कितना सम्मान देती है. अब देश पूछ रहा है. क्या सरकार संवाद का रास्ता चुनेगी या टकराव का? क्या शांतिपूर्ण आंदोलन करने वालों की मांगों को सुना जाएगा या उन्हें केवल हटाकर यह मान लिया जाएगा कि आंदोलन खत्म हो गया? क्योंकि आंदोलन किसी मंच, किसी तंबू या किसी धरना स्थल से नहीं चलता. आंदोलन लोगों के विश्वास, उनके सवालों और न्याय की उम्मीद से चलता है. और जब तक उन सवालों के जवाब नहीं मिलते. तब तक आंदोलन की भावना जीवित रहती है.
