RANCHI : झारखंड में गंभीर रूप से बीमार मरीजों को बेहतर इलाज के लिए दूसरे शहरों तक पहुंचाना अब पहले से अधिक महंगा हो गया है. इसकी एक बड़ी वजह राज्य सरकार की एयर एंबुलेंस सेवा का लंबे समय से बंद होना है. 23 फरवरी 2026 को चतरा में हुए विमान हादसे में सात लोगों की मौत के बाद बंद की गई यह सेवा छह महीने से अधिक समय बीतने के बावजूद दोबारा शुरू नहीं हो सकी है. दूसरी ओर, निजी एयर एंबुलेंस कंपनियों के किराये में भारी बढ़ोतरी की जानकारी सामने आई है. रांची से दिल्ली तक मरीज को ले जाने के लिए अब करीब 13 लाख रुपये तक खर्च करने पड़ रहे हैं, जबकि पहले यह खर्च लगभग 6.5 लाख रुपये तक थी .

यह मामला केवल एक सरकारी सेवा के बंद होने का नहीं है. यह उन परिवारों की परेशानी से जुड़ा है, जिनके सामने गंभीर बीमारी, इलाज के लिए दूसरे शहर जाने की जरूरत और लाखों रुपये जुटाने की चुनौती एक साथ खड़ी हो जाती है. ऐसे समय में एयर एंबुलेंस कई मरीजों के लिए सुविधा भर नहीं, बल्कि समय पर बेहतर चिकित्सा तक पहुंचने का माध्यम होती है.
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सरकारी सेवा की बहाली से जुड़ी फाइल मुख्यमंत्री कार्यालय (सीएमओ) में अनुमोदन के लिए भेजे जाने की जानकारी सामने आई है. हालांकि, सेवा कब तक शुरू होगी, इस बारे में अब तक कोई स्पष्ट आधिकारिक समयसीमा सामने नहीं आई है.
छह महीने से अधिक समय से बंद सेवा, बहाली की तारीख तय नहीं
झारखंड सरकार की एयर एंबुलेंस सेवा का उद्देश्य गंभीर मरीजों को अपेक्षाकृत कम खर्च में राज्य से बाहर स्थित बड़े अस्पतालों तक पहुंचाने में मदद करना था. इसके जरिए दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, हैदराबाद और अन्य शहरों में इलाज के लिए मरीजों को ले जाया जाता था.
23 फरवरी 2026 को चतरा में एयर एंबुलेंस विमान दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद यह सेवा बंद कर दी गई. हादसे में विमान में सवार सभी सात लोगों की मौत हो गई थी। इसके बाद सुरक्षा और जांच से जुड़ी प्रक्रियाओं के बीच सेवा दोबारा शुरू नहीं हो सकी.

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि दुर्घटना के बाद सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा और आवश्यक प्रक्रियाओं को पूरा करते हुए सेवा बहाल करने की दिशा में क्या कदम उठाए गए हैं. क्या नई व्यवस्था तैयार की जा रही है? क्या किसी दूसरी विमानन कंपनी के माध्यम से सेवा शुरू करने की योजना है? और मरीजों को राहत देने के लिए अंतरिम व्यवस्था क्यों नहीं दिखाई दे रही है?
इन सवालों के जवाब सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं हैं. फाइल मुख्यमंत्री कार्यालय में अनुमोदन के लिए भेजे जाने की जानकारी जरूर है, लेकिन केवल फाइल भेजे जाने से मरीजों को राहत नहीं मिलती. जब तक सेवा बहाल नहीं होती या कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं बनती, तब तक जरूरतमंद परिवारों को निजी कंपनियों पर निर्भर रहना पड़ सकता है.
दिल्ली का किराया 6.5 लाख से बढ़कर 13 लाख रुपये तक
सरकारी एयर एंबुलेंस सेवा बंद होने के बाद निजी कंपनियों के किराये में बढ़ोतरी का दावा किया जा रहा है. उपलब्ध जानकारी के अनुसार, रांची से दिल्ली तक एयर एंबुलेंस का किराया पहले लगभग 6.5 लाख रुपये था, जो अब बढ़कर 13 लाख रुपये तक पहुंच गया है.

यानी दिल्ली तक मरीज को पहुंचाने के लिए खर्च लगभग दोगुना हो गया है. हालांकि, एयर एंबुलेंस का वास्तविक किराया विमान के प्रकार, मरीज की चिकित्सा संबंधी जरूरतों, दूरी, उपलब्धता और अन्य सेवाओं के आधार पर अलग-अलग हो सकता है. इसलिए बताए गए किराये को सभी कंपनियों की एक समान दर नहीं माना जाना चाहिए.
अन्य शहरों के लिए भी खर्च बढ़ने की जानकारी सामने आई है.
- रांची से दिल्ली: पहले लगभग 6.5 लाख रुपये, अब करीब 13 लाख रुपये तक.
- रांची से मुंबई: पहले लगभग 11 से 12 लाख रुपये, अब 16 से 17 लाख रुपये तक.
- रांची से चेन्नई और वेल्लोर: पहले लगभग 12 से 13 लाख रुपये, अब 17 से 18 लाख रुपये तक.
- रांची से हैदराबाद: अब लगभग 15 से 16 लाख रुपये तक खर्च होने की जानकारी है.
इन आंकड़ों के आधार पर स्पष्ट है कि गंभीर मरीज को दूसरे शहर तक पहुंचाने का खर्च कई परिवारों की आर्थिक क्षमता से बाहर जा सकता है. हालांकि, इन दरों की स्वतंत्र पुष्टि और अलग-अलग कंपनियों के वर्तमान मूल्य विवरण के बिना इन्हें बाजार की सार्वभौमिक दर नहीं माना जा सकता.
55 हजार रुपये प्रति घंटे की सरकारी सेवा से निजी किराये तक का अंतर
पहले राज्य सरकार की एयर एंबुलेंस सेवा लगभग 55 हजार रुपये प्रति घंटे की दर से उपलब्ध कराए जाने की जानकारी दी गई थी. इसका उद्देश्य मरीजों को लंबी दूरी तक पहुंचाने के लिए अपेक्षाकृत किफायती विकल्प उपलब्ध कराना था.
लेकिन सरकारी सेवा बंद होने के बाद मरीजों के परिजनों को निजी कंपनियों से संपर्क करना पड़ रहा है. यहां सवाल केवल किराये में अंतर का नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था का भी है जो आपात स्थिति में मरीजों को समय पर चिकित्सा सुविधा तक पहुंचाने में मदद करती है.
मान लीजिए, किसी परिवार के सदस्य को रांची से दिल्ली के किसी बड़े अस्पताल में तत्काल ले जाने की जरूरत है. परिवार को एक ओर अस्पताल के इलाज, जांच और भर्ती का खर्च जुटाना है, तो दूसरी ओर विमान से मरीज को ले जाने के लिए लाखों रुपये की व्यवस्था भी करनी है. ऐसी परिस्थिति में समय और पैसा दोनों निर्णायक हो जाते हैं. परिवार को यह तय करना पड़ सकता है कि वह इतनी बड़ी रकम कहां से जुटाए, किस कंपनी से संपर्क करे और कितनी जल्दी विमान उपलब्ध हो पाएगा.
यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि एयर एंबुलेंस की जरूरत हर मरीज को नहीं होती. मरीज की स्थिति, चिकित्सकीय सलाह और उपलब्ध परिवहन विकल्पों के आधार पर इसका निर्णय लिया जाता है. लेकिन जिन मरीजों के लिए हवाई चिकित्सा परिवहन आवश्यक हो, उनके सामने किफायती और समय पर उपलब्ध विकल्प होना महत्वपूर्ण है.
हर महीने 13 से 15 उड़ानों की जरूरत, अब निजी कंपनियों पर निर्भरता
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, रांची से हर महीने औसतन 13 से 15 एयर एंबुलेंस उड़ानें संचालित होती रही हैं. इन उड़ानों के जरिए गंभीर मरीजों को दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद, बेंगलुरु, कोलकाता और चेन्नई जैसे शहरों तक पहुंचाया जाता है. यह संख्या बताती है कि राज्य में एयर एंबुलेंस की मांग का सवाल केवल किसी एक मरीज या परिवार तक सीमित नहीं है. गंभीर बीमारी, दुर्घटना अथवा ऐसी चिकित्सा परिस्थितियों में, जहां दूसरे शहर के अस्पताल में उपचार की आवश्यकता हो, एयर एंबुलेंस महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है.

हालांकि, प्रति माह 13 से 15 उड़ानों का यह आंकड़ा किस अवधि के अभिलेखों पर आधारित है, इसकी आधिकारिक पुष्टि आवश्यक है. इसी तरह, सरकारी सेवा बंद होने के बाद निजी कंपनियों के माध्यम से कितने मरीजों को ले जाया गया और कितने परिवारों को अधिक खर्च उठाना पड़ा, इसका विस्तृत सार्वजनिक आंकड़ा सामने आना भी जरूरी है.
सरकारी सेवा की अनुपलब्धता के बीच मरीजों के परिजनों को निजी विकल्प तलाशने पड़ रहे हैं.ऐसे में किराये की पारदर्शिता, विमान की उपलब्धता, चिकित्सा सहायता और आपातकालीन प्रतिक्रिया जैसे मुद्दे भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं.
टोल फ्री नंबर पर संपर्क करने पर भी नहीं मिली स्पष्ट जानकारी
सरकारी एयर एंबुलेंस सेवा की बहाली के संबंध में जानकारी लेने के लिए 0651-4665515 और 8210594073 नंबरों पर संपर्क किए जाने की जानकारी दी गई है. बताया गया कि सेवा दोबारा शुरू होने के संबंध में फिलहाल कोई आधिकारिक सूचना उपलब्ध नहीं है. दूसरी ओर, बहाली से संबंधित फाइल मुख्यमंत्री कार्यालय में अनुमोदन के लिए भेजे जाने की बात सामने आई है.
इस स्थिति में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न सेवा की बहाली की समयसीमा का है। क्या सरकार ने सेवा दोबारा शुरू करने के लिए कोई लक्ष्य निर्धारित किया है? क्या विमान दुर्घटना के बाद आवश्यक सुरक्षा समीक्षा पूरी हो चुकी है? क्या किसी वैकल्पिक एजेंसी के माध्यम से मरीजों को राहत देने की योजना है?
इन सवालों पर संबंधित विभाग और सरकार की ओर से स्पष्ट जानकारी मिलने से मरीजों तथा उनके परिजनों को राहत मिल सकती है. साथ ही, इससे यह भी स्पष्ट होगा कि सेवा बहाल करने की प्रक्रिया किस चरण में है.
चतरा हादसे में सात लोगों की मौत के बाद बंद हुई थी सेवा
23 फरवरी 2026 को रांची से दिल्ली जा रहा बीचक्राफ्ट किंग एयर सी90ए विमान चतरा में दुर्घटनाग्रस्त हो गया था. विमान में दो पायलट, दो चिकित्सा कर्मी, एक मरीज और दो अटेंडेंट सहित सात लोग सवार थे. हादसे में सभी सात लोगों की मौत हो गई थी.

विमान दुर्घटना जांच ब्यूरो (एएआईबी) की प्रारंभिक रिपोर्ट के संबंध में उपलब्ध जानकारी के अनुसार, उड़ान भरने के लगभग 17 मिनट बाद विमान खराब मौसम के बीच दुर्घटनाग्रस्त हुआ था. दुर्घटना की जांच और उसके कारणों से संबंधित निष्कर्षों को अंतिम जांच रिपोर्ट से अलग समझना जरूरी है. प्रारंभिक रिपोर्ट के आधार पर दुर्घटना के सभी कारणों को अंतिम रूप से तय नहीं माना जा सकता.
यह हादसा बेहद गंभीर था. विमान में मरीज के साथ चिकित्सा कर्मी और चालक दल के सदस्य भी सवार थे. ऐसी दुर्घटना के बाद सुरक्षा मानकों की समीक्षा और आवश्यक सुधार करना स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण है. लेकिन इसके साथ ही यह सवाल भी उठता है कि दुर्घटना के बाद मरीजों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था बनाने की दिशा में क्या किया गया.सुरक्षा सुनिश्चित करना और मरीजों को समय पर चिकित्सा परिवहन उपलब्ध कराना-दोनों ही महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां हैं। इनके बीच संतुलन बनाने के लिए स्पष्ट नीति, समयबद्ध कार्रवाई और सार्वजनिक जानकारी आवश्यक है.
सवाल सिर्फ एयर एंबुलेंस का नहीं, गंभीर मरीजों की पहुंच का है
झारखंड जैसे राज्य में, जहां गंभीर मरीजों को कई बार बेहतर या विशेष उपचार के लिए दूसरे राज्यों के अस्पतालों तक जाना पड़ता है, वहां सुलभ चिकित्सा परिवहन व्यवस्था का महत्व बढ़ जाता है. एयर एंबुलेंस सेवा का उपयोग सीमित परिस्थितियों में होता है, लेकिन जिन मरीजों को इसकी जरूरत पड़ती है, उनके लिए समय पर उपलब्धता बेहद अहम हो सकती है.

ऐसे परिवारों के सामने पहले ही इलाज का खर्च, अस्पताल में भर्ती, जांच, दवाइयां और परिजनों के रहने जैसी कई चुनौतियां होती हैं. यदि मरीज को दूसरे शहर तक पहुंचाने के लिए ही 13 से 18 लाख रुपये तक खर्च करने पड़ें, तो यह आर्थिक दबाव और बढ़ा सकता है.
हालांकि, किराये में बढ़ोतरी के लिए केवल सरकारी सेवा के बंद होने को ही एकमात्र कारण मानने से पहले निजी कंपनियों की दरों, परिचालन लागत और उपलब्ध विमानों की स्थिति की भी जांच जरूरी है. फिर भी सरकारी सेवा की लंबी अनुपलब्धता और निजी किराये में सामने आया अंतर सरकार से जवाबदेही तथा स्पष्टता की मांग करता है.
सरकार के सामने अब कुछ अहम विकल्प हैं-सुरक्षा मानकों का पालन करते हुए पुरानी सेवा को बहाल करना, किसी वैकल्पिक एजेंसी के माध्यम से सेवा उपलब्ध कराना, किराये और उपलब्धता की पारदर्शी जानकारी देना तथा जरूरतमंद मरीजों के लिए सहायता की संभावनाओं पर विचार करना।
अब सरकार से जवाब की प्रतीक्षा
चतरा विमान हादसे में सात लोगों की मौत के बाद एयर एंबुलेंस सेवा का बंद होना सुरक्षा और जांच से जुड़ी गंभीर परिस्थितियों से संबंधित है. लेकिन छह महीने से अधिक समय बीतने के बाद भी बहाली की कोई स्पष्ट तारीख सामने न आने से मरीजों और उनके परिजनों की चिंता बनी हुई है.
दिल्ली के लिए किराया 6.5 लाख रुपये से बढ़कर 13 लाख रुपये तक पहुंचने की जानकारी और अन्य शहरों के लिए बढ़ते खर्च ने इस मुद्दे को और गंभीर बना दिया है। दूसरी ओर, मुख्यमंत्री कार्यालय में लंबित बताई जा रही फाइल की वर्तमान स्थिति और सेवा बहाली की समयसीमा को लेकर आधिकारिक स्पष्टीकरण आवश्यक है.
सबसे बड़ा सवाल यही है-झारखंड में गंभीर मरीजों को समय पर और अपेक्षाकृत कम खर्च में दूसरे शहरों तक पहुंचाने वाली सरकारी एयर एंबुलेंस सेवा आखिर कब शुरू होगी?
जब तक सरकार की ओर से स्पष्ट समयसीमा और वैकल्पिक व्यवस्था की जानकारी सामने नहीं आती, तब तक इस सवाल का सीधा असर उन परिवारों पर पड़ता रहेगा, जिनके लिए इलाज तक पहुंचना ही एक बड़ी चुनौती है.
