RANCHI : झारखंड हाईकोर्ट ने कर्मचारियों के हक में अहम फैसला सुनाया है. कोर्ट ने कहा कि अगर कोई कर्मचारी अपने संवैधानिक अधिकारों के लिए अदालत जाता है, तो इससे नाराज होकर उसे नौकरी से निकालना मनमाना और कानून के खिलाफ है. जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने धरो उरांव और अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए कर्मचारियों को राहत दी है. अदालत ने सभी याचिकाकर्ताओं को छह सप्ताह के भीतर दोबारा नौकरी पर रखने का आदेश दिया है. साथ ही, उन्हें नौकरी से जुड़े पुराने लाभ देने और सेवा नियमित करने का औपचारिक आदेश जारी करने का निर्देश दिया गया है. कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार और उसकी एजेंसियों को कर्मचारियों के संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल करने पर उन्हें दंडित करने की प्रथा खत्म करनी चाहिए.
2004 में हुई थी नियुक्ति, 2017 में हटाया गया
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता अमृतांश वत्स ने अदालत में पक्ष रखा. उन्होंने बताया कि कर्मचारियों की नियुक्ति 2004 में स्वास्थ्य, चिकित्सा शिक्षा एवं परिवार कल्याण विभाग के इंजीनियरिंग सेल में लिपिक, टाइपिस्ट, चालक और पंप ऑपरेटर जैसे पदों पर संविदा के आधार पर हुई थी. आरोप है कि 2017 में इन्हें बिना किसी नोटिस के नौकरी से हटा दिया गया. जानकारी के अनुसार, 4 फरवरी 2017 को समन्वय पीठ ने कर्मचारियों की सेवा नियमित करने का आदेश दिया था. राज्य सरकार ने इस फैसले को चुनौती दी, लेकिन उसकी अपील खारिज हो गई. इसके बावजूद विभाग ने 14 अगस्त 2024 के आदेश के जरिए कर्मचारियों के नियमितीकरण के दावे को अस्वीकार कर दिया. इसके बाद कर्मचारी फिर हाईकोर्ट पहुंचे.

10 साल से ज्यादा काम करने वालों को राहत
हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ताओं ने 10 साल से अधिक समय तक लगातार काम किया था और उनकी नियुक्ति सक्षम प्राधिकारी से मंजूर थी. सरकार की ओर से यह तर्क दिया गया कि कर्मचारी स्वीकृत पदों पर नियुक्त नहीं थे, लेकिन अदालत ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया. कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि जहां काम की प्रकृति स्थायी और संस्थान के लिए जरूरी हो, वहां केवल संविदा या अस्थायी नियुक्ति का नाम देने से कर्मचारी का मामला स्वतः अवैध नहीं हो जाता. अदालत ने अनियमित और अवैध नियुक्ति के बीच अंतर पर भी जोर दिया.
15 साल से संविदा पर काम कर रहे चालकों को भी राहत
झारखंड हाईकोर्ट ने झारखंड ऊर्जा विकास निगम लिमिटेड (JUVNL) और उसकी सहयोगी कंपनियों में करीब 15 साल से संविदा पर काम कर रहे चालकों के नियमितीकरण को लेकर भी निर्देश दिया है. कोर्ट ने कहा कि केवल यह आधार बनाकर नियमितीकरण से इनकार नहीं किया जा सकता कि कर्मचारियों के पद स्वीकृत नहीं थे.
अदालत के अनुसार, लंबे समय से लगातार काम कर रहे और जरूरी योग्यता रखने वाले कर्मचारियों की नियुक्ति का मामला अधिक से अधिक अनियमित नियुक्ति का हो सकता है, जरूरी नहीं कि वह अवैध नियुक्ति हो. इंद्रदेव सिंह समेत कई चालकों ने इस मामले में अलग-अलग याचिकाएं दाखिल की थीं. समान मुद्दा होने के कारण अदालत ने सभी याचिकाओं की एक साथ सुनवाई की.
इस फैसले से लंबे समय से संविदा पर काम कर रहे कर्मचारियों के नियमितीकरण और नौकरी की सुरक्षा से जुड़ी बहस को महत्वपूर्ण कानूनी आधार मिला है. हालांकि, आदेश की वास्तविक सीमा और इसे लागू करने की प्रक्रिया हाईकोर्ट के विस्तृत फैसले और संबंधित विभाग के निर्देशों पर निर्भर करेगी.
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