रांची : झारखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा हुआ है. सवाल यह नहीं है कि कोई व्यक्ति अपने इलाज के लिए सरकारी अस्पताल चुने या निजी अस्पताल. सवाल यह है कि जिस सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर आम लोगों को भरोसा करने के लिए कहा जाता है, क्या उसी व्यवस्था पर राज्य के जनप्रतिनिधियों को भी भरोसा है? दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य के 33 प्रमुख जनप्रतिनिधियों-मंत्रियों और विधायकों में से- 73 प्रतिशत यानी 24 लोग इलाज या स्वास्थ्य जांच के लिए निजी अस्पतालों अथवा दिल्ली, वेल्लोर, गुरुग्राम और हैदराबाद जैसे शहरों का रुख करते हैं.
रिपोर्ट में शामिल जनप्रतिनिधियों के बयानों के मुताबिक, वित्त मंत्री राधा कृष्ण किशोर ने बताया कि जरूरत पड़ने पर वे निजी डॉक्टरों से परामर्श लेते हैं. पेयजल मंत्री योगेंद्र प्रसाद के बारे में रिपोर्ट में कहा गया है कि वे परिवार के नियमित स्वास्थ्य परीक्षण के लिए वेल्लोर जाते हैं. जल संसाधन मंत्री हफीजुल हसन इलाज के लिए दिल्ली जाते हैं, जबकि स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी ने कहा कि सामान्य जांच स्थानीय स्तर पर ही कराई जाती है.

यह तस्वीर केवल कुछ मंत्रियों के इलाज की पसंद तक सीमित नहीं है. रिपोर्ट में विधायकों के इलाज को लेकर भी इसी तरह की स्थिति सामने आने का दावा किया गया है.
निजी अस्पतालों और दूसरे शहरों का रुख क्यों?
राज्य के कई जनप्रतिनिधियों के बारे में रिपोर्ट में बताया गया है कि वे गंभीर बीमारी या विशेष उपचार की जरूरत होने पर राज्य से बाहर के बड़े अस्पतालों का रुख करते हैं. रिपोर्ट में विधायक सीपी सिंह के इलाज के लिए गुरुग्राम, दिल्ली और चेन्नई जैसे शहरों का उल्लेख है. सुरेश बैठा के इलाज के लिए रांची के निजी अस्पताल, सरयू राय के लिए हैदराबाद और प्रदीप प्रसाद के लिए हजारीबाग के निजी अस्पताल का जिक्र किया गया है.
रिपोर्ट के अनुसार, 26 विधायकों में से 19 विधायक निजी अस्पतालों में इलाज कराते हैं. यह आंकड़ा 73 प्रतिशत बैठता है. यहीं से बहस केवल इस बात की नहीं रह जाती कि कोई नेता अपना इलाज कहां कराता है. असली सवाल सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की गुणवत्ता, उपलब्धता और उस पर भरोसे का है.
जिस रिम्स पर जनता निर्भर है, वहां क्या स्थिति है?
झारखंड में रिम्स को राज्य की सबसे बड़ी सरकारी चिकित्सा संस्थाओं में गिना जाता है. बड़ी संख्या में मरीज यहां इलाज के लिए पहुंचते हैं. लेकिन सरकारी अस्पतालों में भीड़, संसाधनों की उपलब्धता, चिकित्सकों की संख्या और अत्याधुनिक उपचार सुविधाओं को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं. रिम्स की व्यवस्था और मरीजों को मिलने वाली सुविधाओं को लेकर मीडिया में समय-समय पर रिपोर्टें प्रकाशित होती रही हैं.
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ऐसे में सवाल उठता है कि अगर किसी आम मरीज को विशेषज्ञ उपचार की जरूरत पड़ती है, तो उसके पास कितने विकल्प बचते हैं? एक संपन्न व्यक्ति दिल्ली, गुरुग्राम, हैदराबाद या वेल्लोर जा सकता है। निजी अस्पताल में लाखों रुपये खर्च कर सकता है। लेकिन उस गरीब या मध्यमवर्गीय परिवार का क्या, जिसके पास दूसरे शहर जाने का खर्च तक नहीं है?
सवाल नेताओं से ज्यादा व्यवस्था से
यहां एक बात स्पष्ट करना जरूरी है. किसी मंत्री या विधायक का निजी अस्पताल में इलाज कराना अपने आप में कोई गलत काम नहीं है. हर व्यक्ति को अपनी चिकित्सा सुविधा चुनने का अधिकार है. समस्या तब पैदा होती है जब सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की कमियां लगातार बनी रहें और उसका सबसे ज्यादा असर उन लोगों पर पड़े जिनके पास निजी इलाज का विकल्प नहीं है. यही वजह है कि 73 प्रतिशत जनप्रतिनिधियों के निजी अस्पतालों या दूसरे शहरों में इलाज कराने की खबर को स्वास्थ्य व्यवस्था के आईने के रूप में देखा जा रहा है. जनप्रतिनिधि बेहतर चिकित्सा सुविधा चुन सकते हैं. आम आदमी के पास अक्सर यह विकल्प नहीं होता.
आम मरीज की सबसे बड़ी चिंता क्या है?
झारखंड के सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने वाले मरीजों की शिकायतें अलग-अलग स्तर पर सामने आती रही हैं-कहीं बेड की कमी, कहीं विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी, कहीं उपकरणों की उपलब्धता और कहीं जांच सुविधाओं को लेकर सवाल. ऐसे में गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीज के सामने दो ही रास्ते दिखाई देते हैं.
या तो वह सरकारी अस्पताल में उपलब्ध सुविधाओं के भरोसे इलाज कराए,या फिर कर्ज लेकर, जमीन बेचकर अथवा परिवार की जमा पूंजी खर्च करके निजी अस्पताल या दूसरे शहर का रुख करे.यह स्थिति केवल स्वास्थ्य विभाग का विषय नहीं है. यह सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति और सरकारी जवाबदेही का भी सवाल है.
स्वास्थ्य मंत्री के लिए सबसे बड़ा सवाल
दिलचस्प बात यह है कि इस बहस के केंद्र में राज्य के स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी का नाम भी आता है.अगर सामान्य स्वास्थ्य जांच राज्य में ही हो सकती है, तो यह अच्छी बात है. लेकिन जब गंभीर बीमारी के उपचार की बात आती है, तब क्या झारखंड के सरकारी अस्पताल मरीजों को उसी स्तर की सुविधा दे पाते हैं, जिसकी उन्हें जरूरत होती है?
यही वह सवाल है जिसका जवाब केवल बयान से नहीं, बल्कि अस्पतालों में उपलब्ध डॉक्टरों, उपकरणों, बेड, जांच सुविधाओं और उपचार के वास्तविक आंकड़ों से मिलना चाहिए.
जनता को भाषण नहीं, भरोसेमंद अस्पताल चाहिए
आखिरकार सवाल यह नहीं है कि मंत्री या विधायक कहां इलाज कराते हैं. सवाल यह है कि क्या झारखंड का आम नागरिक अपने सरकारी अस्पताल में बिना भय और आर्थिक दबाव के बेहतर इलाज करा सकता है? अगर सरकारी अस्पतालों में पर्याप्त बेड हैं, विशेषज्ञ चिकित्सक उपलब्ध हैं, अत्याधुनिक उपकरण काम कर रहे हैं और गंभीर बीमारियों का समुचित उपचार संभव है, तो आम आदमी को निजी अस्पतालों की ओर जाने की मजबूरी क्यों हो?
और अगर व्यवस्था में कमियां हैं, तो उन्हें दूर करने की जिम्मेदारी किसकी है? यही जनप्रतिनिधि स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए नीतियां बनाते हैं, बजट पर चर्चा करते हैं और सरकार से जवाब मांगते हैं. इसलिए 73 प्रतिशत जनप्रतिनिधियों के निजी अस्पतालों या दूसरे शहरों में इलाज कराने की खबर को केवल नेताओं की चिकित्सा पसंद के तौर पर देखने के बजाय एक बड़े सवाल के रूप में देखना होगा
जिस सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर आम जनता को भरोसा करने के लिए कहा जाता है, क्या उस व्यवस्था पर राज्य के जनप्रतिनिधियों का भरोसा है? और अगर नहीं… तो फिर सवाल यह है कि उस भरोसे को वापस लाने के लिए सरकार कब तक ठोस कदम उठाएगी?
