RANCHI/MAHARASTRA : कभी-कभी कोई तस्वीर सिर्फ तस्वीर नहीं होती. वह अपने पीछे कई सवाल छोड़ जाती है. महाराष्ट्र के चंद्रपुर से सामने आई आधे मुंडे सिर वाले बच्चों की तस्वीरें भी कुछ ऐसे ही सवाल खड़े करती हैं.चिमूर तहसील के जांभुलघाट स्थित सरकारी आश्रमशाला में विद्यार्थियों के बाल काटने के दौरान कुछ बच्चों के सिर के आधे बाल काट दिए गए. बाद में बाकी बाल काटने की बात कही गई. तस्वीरें सामने आने के बाद रात में दोबारा बच्चों के बाल काटे गए.
अब यहां एक बात बिल्कुल साफ होनी चाहिए. बाल काटना अपने आप में कोई गलत बात नहीं है. अगर बच्चों के स्वास्थ्य और स्वच्छता के लिए बाल कटवाना जरूरी था, तो स्कूल प्रशासन यह काम व्यवस्थित तरीके से कर सकता था.सवाल उस तरीके को लेकर है, जिसमें बच्चों को आधे कटे बालों के साथ छोड़ दिया गया और बाद में रात तक बाल काटने की नौबत आई.
सवाल बच्चों से नहीं, व्यवस्था से है
सोचिए, जिस बच्चे को आप पढ़ाने, आगे बढ़ाने और आत्मविश्वास देने के लिए आश्रमशाला में रखते हैं, अगर वही बच्चा अगले दिन आधे मुंडे सिर के साथ लोगों के सामने जाए, तो उसके मन पर क्या असर पड़ेगा? बच्चे हैं, उन्हें शायद पूरी घटना की गंभीरता भी समझ न आए. लेकिन उनके साथ काम करने वाले बड़ों की जिम्मेदारी तो यही है कि उनकी गरिमा और सम्मान का ख्याल रखा जाए. अधीक्षक की ओर से सफाई दी गई कि बच्चों के सिर में डैंड्रफ की समस्या थी और बाल काटना इसी वजह से जरूरी था. यह कारण अपनी जगह हो सकता है. लेकिन फिर सवाल है कि पूरी प्रक्रिया पहले से व्यवस्थित क्यों नहीं की गई? अगर ट्रिमर की चार्जिंग खत्म हो गई थी, तो क्या बच्चों को आधे बालों के साथ छोड़ देना ही एकमात्र रास्ता था? और अगर रात में बाल काटना जरूरी था, तो बच्चों के सोने के समय तक इंतजार क्यों करना पड़ा?
और यहां बात सिर्फ एक स्कूल की नहीं है
आदिवासी समाज में आश्रमशालाओं की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है. गांवों और दूरदराज के इलाकों से आने वाले बच्चों के लिए ये सिर्फ स्कूल नहीं, बल्कि रहने और पढ़ने की जगह भी हैं. इन बच्चों के माता-पिता अपनी उम्मीदें इन संस्थानों से जोड़ते हैं. उन्हें लगता है कि उनका बच्चा वहां पढ़ेगा, सुरक्षित रहेगा और आगे बढ़ेगा. इसलिए जब किसी आश्रमशाला से ऐसी तस्वीर सामने आती है, तो सवाल सिर्फ उस दिन की घटना पर नहीं रुकता. सवाल उठता है कि हम अपने बच्चों के लिए कैसी व्यवस्था बना रहे हैं?
आदिवासी समाज के नाम पर नहीं, बच्चों के हक के नाम पर सवाल
इस घटना को लेकर बहस करते समय एक गलती से बचना भी जरूरी है. यह कहना कि कोई व्यक्ति आदिवासी है, इसलिए वह आदिवासी बच्चों के साथ अन्याय नहीं कर सकता, सही सोच नहीं है. और दूसरी तरफ यह कहना भी सही नहीं कि आदिवासी समाज का ही व्यक्ति अपने समाज का शोषक है, और इसलिए पूरी व्यवस्था या पूरे समुदाय पर सवाल खड़ा कर दिया जाए. किसी व्यक्ति की जाति या जनजातीय पहचान उसके व्यवहार का प्रमाण नहीं होती. असल सवाल यह होना चाहिए कि कुर्सी पर बैठा व्यक्ति बच्चों के साथ कैसा व्यवहार करता है? वह आदिवासी हो, गैर-आदिवासी हो, अधिकारी हो, शिक्षक हो या कोई और. पद की जिम्मेदारी जाति देखकर नहीं बदलती.
अपने ही समाज के बच्चे हों तो जिम्मेदारी और बड़ी हो जाती है
एक आदिवासी अभिभावक इस घटना को शायद और अलग नजर से देखेगा. वह सोचेगा कि हमने अपने बच्चे को घर से इतनी दूर इसलिए भेजा था कि वह पढ़ेगा. उसे बेहतर जिंदगी मिलेगी. वह कल नौकरी करेगा, अपने परिवार को संभालेगा. लेकिन अगर उसी बच्चे की गरिमा का ख्याल नहीं रखा गया, तो दर्द सिर्फ उस बच्चे का नहीं होगा. उसके माता-पिता का भी होगा. यही वजह है कि ऐसी घटनाओं पर सवाल उठाना आदिवासी समाज के खिलाफ सवाल उठाना नहीं है. बल्कि यह अपने बच्चों के हक में सवाल उठाना है.
हमें व्यक्ति नहीं, व्यवस्था की जवाबदेही चाहिए
इस पूरे मामले में अगर लापरवाही हुई है तो उसकी जांच होनी चाहिए. अगर नियमों का उल्लंघन हुआ है तो कार्रवाई होनी चाहिए. और अगर प्रशासन की तरफ से कोई गलती नहीं हुई, तो वह भी स्पष्ट रूप से सामने आना चाहिए. क्योंकि बच्चों के मामले में सिर्फ सफाई काफी नहीं होती, जवाबदेही भी जरूरी होती है. और यही बात झारखंड समेत उन सभी राज्यों पर लागू होती है, जहां आदिवासी बच्चों के लिए आश्रम स्कूल और आवासीय विद्यालय चलाए जाते हैं.
आखिर में सबसे बड़ा सवाल
आदिवासी समाज के लिए असली लड़ाई सिर्फ सत्ता में अपना प्रतिनिधि बैठाने की नहीं है. असली सवाल यह है कि जो भी कुर्सी पर बैठे, वह उस कुर्सी की जिम्मेदारी निभाए. बच्चा आदिवासी है या गैर-आदिवासी, गरीब है या अमीर, गांव से आया है या शहर से… इससे उसकी गरिमा कम नहीं हो जाती. कुर्सी किसी की भी हो, बच्चे का सम्मान सबसे ऊपर होना चाहिए. चंद्रपुर की यह घटना हमें इसी सवाल के सामने खड़ा करती है , क्या हमारे आदिवासी बच्चों को सिर्फ स्कूल और हॉस्टल चाहिए, या ऐसी व्यवस्था भी चाहिए जहां उन्हें सम्मान, सुरक्षा और अपनी बात कहने का अधिकार मिले? यही सवाल महाराष्ट्र के चंद्रपुर से उठ रहा है. और शायद झारखंड के हर उस माता-पिता से भी, जो अपने बच्चे को बेहतर भविष्य की उम्मीद में किसी आवासीय स्कूल में भेजता है.
