RANCHI/HAZARIBAGH : झारखंड में एक महिला की हिरासत का मामला अब झारखंड हाईकोर्ट पहुंच गया है. महिला को साल 2018 में बच्चा अपहरण के मामले में गिरफ्तार किया गया था और अदालत ने उसे दो साल की सजा सुनाई थी. कोर्ट के आदेश के मुताबिक उसकी सजा 4 फरवरी 2020 को पूरी हो गई. इसके बावजूद उसे रिहा करने के बजाय हजारीबाग सेंट्रल जेल के अधीन विदेशी नागरिकों के लिए बनाए गए डिटेंशन सेंटर में रखा गया.
मामला तब और गंभीर हो गया, जब महिला के रिकॉर्ड में उसके सरनेम को ‘देवी’ से बदलकर ‘खान’ किए जाने और धर्म को हिंदू से मुस्लिम दर्ज किए जाने का आरोप सामने आया. महिला को विदेशी नागरिक बताकर उस पर Foreigners Act के तहत कार्रवाई भी की गई थी. हालांकि, पुलिस अदालत में यह साबित नहीं कर सकी कि महिला बांग्लादेशी नागरिक है. इसके बाद अदालत ने उसे Foreigners Act की धारा 14 के आरोप से बरी कर दिया.
2020 में सजा पूरी, फिर भी क्यों नहीं हुई रिहाई?
जानकारी के मुताबिक, जामताड़ा थाना में 2 फरवरी 2018 को बच्चा अपहरण के आरोप में FIR संख्या 19/2018 दर्ज हुई थी. पुलिस ने 4 फरवरी 2018 को महिला को गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया. उसी दिन कोर्ट ने मामले का संज्ञान लेते हुए उसे जेल भेज दिया. 15 दिसंबर 2018 को अदालत ने मामले में फैसला सुनाते हुए महिला को दो साल की सजा सुनाई. साथ ही जेल में पहले बिताए गए समय को भी सजा की अवधि में शामिल करने का आदेश दिया गया. इस हिसाब से उसकी सजा 4 फरवरी 2020 को पूरी हो गई थी. लेकिन आरोप है कि सजा पूरी होने के बाद उसे जामताड़ा जेल से रिहा करने के बजाय हजारीबाग सेंट्रल जेल के अधीन विदेशी नागरिकों के डिटेंशन सेंटर भेज दिया गया. यही इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल है कि आखिर किस आदेश या कानूनी आधार पर सजा पूरी कर चुकी महिला को डिटेंशन सेंटर में रखा गया?
जामताड़ा जेल में कब बनी विदेशी नागरिक?
हाईकोर्ट में दाखिल Habeas Corpus याचिका में कहा गया है कि जामताड़ा जेल में रहने के दौरान महिला को विदेशी नागरिक घोषित किए जाने से संबंधित कोई नोटिस नहीं दिया गया था. याचिका के मुताबिक, उसने विदेशी नागरिकता से जुड़े किसी मामले में ट्रायल का भी सामना नहीं किया. ऐसे में यह सवाल भी उठ रहा है कि महिला को विदेशी नागरिक मानने का आधार क्या था और उसे डिटेंशन सेंटर भेजने का आदेश किस प्राधिकारी ने दिया?
2025 में डिटेंशन सेंटर से भागी, धनबाद में मिली
मामले के मुताबिक, वर्ष 2025 में महिला दो अन्य महिलाओं के साथ डिटेंशन सेंटर से निकल गई थी. 9 जून 2025 को उसे धनबाद रेलवे स्टेशन से पकड़ा गया. अगले दिन 10 जून को उसे धनबाद से हजारीबाग के लोहसिंगना थाना लाया गया. यहीं से उसके रिकॉर्ड में नाम और धर्म बदलने का आरोप सामने आया. याचिका में दावा किया गया है कि 10 जून 2025 को उसके सरनेम ‘देवी’ की जगह ‘खान’ दर्ज कर दिया गया और धर्म भी हिंदू से मुस्लिम कर दिया गया. इसके बाद लोहसिंगना थाना में FIR दर्ज की गई. महिला पर BNS की धारा 262 सहपठित धारा 3(5) और Foreigners Act, 1946 की धारा 14 के तहत मामला दर्ज किया गया.
कोर्ट ने Foreigners Act के आरोप से किया बरी
इस मामले में एडिशनल चीफ जुडिशियल मजिस्ट्रेट ने 9 जुलाई 2025 को महिला को जमानत दे दी थी. हालांकि, वह बेल बॉन्ड नहीं भर सकी और जेल से बाहर नहीं आ पाई. बाद में 20 जुलाई 2026 को हजारीबाग के एडिशनल चीफ जुडिशियल मजिस्ट्रेट ने मामले में फैसला सुनाया. कोर्ट ने सरकारी आदेश के उल्लंघन से जुड़े आरोप में छह महीने की सजा सुनाई और जेल में बिताई गई अवधि को इसमें समायोजित करने का आदेश दिया. वहीं, महिला के विदेशी नागरिक होने का आरोप पुलिस अदालत में साबित नहीं कर सकी. इसके चलते उसे Foreigners Act की धारा 14 के तहत लगे आरोप से बरी कर दिया गया. इस फैसले के बाद भी महिला की हिरासत को लेकर सवाल बना हुआ है, क्योंकि उसकी पहले की दो साल की सजा 2020 में ही पूरी हो चुकी थी.
डिटेंशन सेंटर में दुष्कर्म का भी आरोप
मामला सिर्फ अवैध हिरासत के आरोपों तक सीमित नहीं है. महिला ने डिटेंशन सेंटर में रहने के दौरान एक सिपाही पर दुष्कर्म करने का आरोप भी लगाया है. यह मामला भी झारखंड हाईकोर्ट के समक्ष विचाराधीन है. हालांकि, इस आरोप की स्वतंत्र रूप से पुष्टि अदालत के अंतिम निर्णय के बिना नहीं की जा सकती.
समाज सेविका की याचिका पर हाईकोर्ट सख्त
समाज सेविका अपूर्वा विवेक की ओर से झारखंड हाईकोर्ट में Habeas Corpus याचिका दाखिल किए जाने के बाद यह मामला सामने आया. हाईकोर्ट ने मामले को गंभीरता से लेते हुए झारखंड स्टेट लीगल सर्विसेज अथॉरिटी (JHALSA) और जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) को मामले की जांच कर रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया है. कोर्ट की कार्रवाई के बाद गृह विभाग ने हजारीबाग के उपायुक्त और पुलिस अधीक्षक से जांच कर यह बताने को कहा है कि महिला को सजा पूरी होने के बाद किस आदेश के आधार पर डिटेंशन सेंटर में रखा गया. वहीं, जामताड़ा के उपायुक्त और पुलिस अधीक्षक से महिला की नागरिकता, जन्म स्थान और शिक्षा समेत अन्य जानकारियां मांगी गई हैं.
अब जांच में सामने आएगा असली आधार
पूरे मामले में अब सबसे अहम सवाल यही है कि महिला को 2020 में सजा पूरी होने के बाद किस कानूनी आदेश के तहत डिटेंशन सेंटर में रखा गया और उसके रिकॉर्ड में नाम व धर्म बदलने की प्रक्रिया किस स्तर पर हुई. हाईकोर्ट और संबंधित एजेंसियों की जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि इस मामले में प्रशासनिक स्तर पर क्या हुआ और महिला की हिरासत का कानूनी आधार क्या था.
