HAZARIBAGH : गणित का सीधा-साधा नियम है कि एक के बाद दो आता है. लेकिन हजारीबाग के भवन निर्माण विभाग में सामने आई परिस्थितियां इस सामान्य नियम पर ही सवाल खड़े कर रही हैं. आरोप है कि यहां कुछ निर्माण कार्यों में टेंडर प्रक्रिया से पहले ही काम करा लिया गया और बाद में उन्हीं कामों के लिए टेंडर निकाला गया.
पूरे झारखंड में भवन निर्माण विभाग में 3 प्रतिशत और 5 प्रतिशत के नियम को लेकर ठेकेदार और संवेदक परिचित हैं. इससे पहले Loktantra19 ने मेदनीनगर भवन निर्माण विभाग से जुड़े कथित मामले को लेकर सवाल उठाए गए थे. अब हजारीबाग भवन निर्माण विभाग की टेंडर प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं.
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11 निर्माण कार्यों के लिए निकाला गया टेंडर
मिली जानकारी के अनुसार, भवन निर्माण विभाग, हजारीबाग की ओर से कुल 11 निर्माण कार्यों के लिए टेंडर निकाला गया. टेंडर भरने की प्रक्रिया शुरू होने के बाद संवेदकों के बीच चर्चा शुरू हुई कि इनमें से तीन काम पहले ही एक संवेदक द्वारा कर दिए गए हैं. यानी जिस काम के लिए अब टेंडर मांगा जा रहा है, उसका काम कथित तौर पर पहले ही जमीन पर कराया जा चुका है.
ऐसे में सवाल उठता है कि जब काम पहले ही पूरा कराया जा चुका है तो उसके लिए टेंडर किस आधार पर निकाला गया? साथ ही, टेंडर प्रक्रिया पूरी होने से पहले काम किस नियम के तहत कराया गया?
करीब 1 करोड़ 40 लाख रुपये के तीन काम
जानकारी के अनुसार, इन तीनों कामों की कुल कीमत करीब 1 करोड़ 40 लाख रुपये है. आरोप है कि तीनों काम एक ही ठेकेदार विजय सिंह को दिए जाने की तैयारी चल रही है. बताया जा रहा है कि एक संवेदक इन तीनों कामों में फॉर्म डालने की कोशिश कर रहा था, लेकिन उसे समझा-बुझाकर पीछे कर दिया गया.
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हालांकि, तत्काल उपलब्ध जानकारी के अनुसार अभी तक टेंडर नहीं हुआ है. तीनों कामों में दो-दो प्रतियोगी भाग ले रहे हैं. इनमें से एक को डमी संवेदक बताया जा रहा है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या टेंडर में प्रतियोगिता केवल कागजों पर दिखाने के लिए की जा रही है?
सरकारी काम में टेंडर का उद्देश्य क्या है?
सरकारी निर्माण कार्यों में आम लोगों का पैसा खर्च होता है. टेंडर प्रक्रिया का उद्देश्य यही है कि कई संवेदक प्रतिस्पर्धा में शामिल हों, सरकारी धन का उचित इस्तेमाल हो और निर्माण कार्य नियमों के अनुसार कराया जाए. लेकिन अगर आरोप सही हैं और किसी काम को टेंडर से पहले ही किसी संवेदक से करा लिया गया है, तो पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठना स्वाभाविक है.
अगर वास्तव में ऐसा हुआ है तो यह भी जांच का विषय है कि विभाग में कितने काम इसी तरह पहले करा लिए गए और बाद में उनकी टेंडर प्रक्रिया पूरी की गई. साथ ही, ऐसी स्थिति में सरकारी राशि की निकासी किस प्रक्रिया के तहत हुई, इसकी भी जांच जरूरी है.
मुख्यमंत्री सुइट के रिनोवेशन का काम भी शामिल
इसी टेंडर सूची में करीब 46 लाख रुपये के मुख्यमंत्री सुइट के रिनोवेशन का काम भी शामिल है. इसके अलावा डीसी आवास में गोपनीय कक्ष और विजिटर रूम के रेनोवेशन का काम भी टेंडर सूची में शामिल है. ऐसे में सवाल सिर्फ टेंडर प्रक्रिया तक सीमित नहीं है. सवाल यह भी है कि सरकारी निर्माण कार्यों में पहले काम होता है या टेंडर प्रक्रिया पूरी होने के बाद काम शुरू किया जाता है?
2 प्रतिशत, 5 प्रतिशत और 10 प्रतिशत के कथित खेल पर भी सवाल
सरकारी महकमे में 2 प्रतिशत, 5 प्रतिशत और 10 प्रतिशत के खेल की बातें अक्सर सुनने को मिलती हैं. लेकिन हजारीबाग के इस मामले में सवाल इससे आगे का है. कहीं ऐसा तो नहीं कि टेंडर केवल फाइल की प्रक्रिया पूरी करने और सरकारी राशि की निकासी का रास्ता तैयार करने के लिए किया जा रहा हो? हालांकि, यह हमारा आरोप नहीं है. सामने आई परिस्थितियों और लगाए जा रहे आरोपों के आधार पर ये सवाल उठ रहे हैं, जिनकी जांच होना जरूरी है.
अब भवन निर्माण विभाग को सामने आकर स्पष्ट करना चाहिए कि इन तीनों कामों की शुरुआत कब हुई? काम किसके आदेश से शुरू हुआ? और अगर टेंडर प्रक्रिया पूरी होने से पहले काम कराया गया है तो किस नियम के तहत कराया गया? सरकारी टेंडर ऐसी प्रक्रिया नहीं है जिसमें ठेकेदार पहले काम शुरू कर दे और विभाग बाद में टेंडर निकालकर कागजी प्रक्रिया पूरी करे. अब देखना होगा कि भवन निर्माण विभाग इन सवालों का क्या जवाब देता है और क्या पूरे मामले की जांच कराई जाती है.
गणित में एक के बाद दो आता है. लेकिन अगर यहां सच में दो के बाद एक आ रहा है, तो इस गणित की जांच जरूरी है.
