RANCHI/HAZARIBAGH : झारखंड के हजारीबाग जिले में एक होमगार्ड जवान के साथ कथित मारपीट का मामला सामने आया है. दारू अंचल में तैनात होमगार्ड जवान मनोज कुमार ने आंगो थाना प्रभारी जानू कुमार पर गंभीर आरोप लगाए हैं. मनोज कुमार का आरोप है कि उन्हें थाना परिसर में कई घंटे तक बैठाकर रखा गया और फिर हाथ-पैर बांधकर लाठियों से पीटा गया. जवान के मुताबिक, मारपीट के दौरान उनके हाथ की एक उंगली टूट गई.

जवान ने इस मामले में हजारीबाग के पुलिस अधीक्षक और एसडीपीओ फौजान अहमद से शिकायत कर न्याय की गुहार लगाई है. हालांकि, आंगो थाना प्रभारी जानू कुमार ने जवान के आरोपों को पूरी तरह बेबुनियाद बताया है. उनका कहना है कि लगाए गए आरोपों में कोई सच्चाई नहीं है. इस मामले में वास्तविकता क्या है, यह जांच के बाद ही साफ हो सकेगा. लेकिन इस घटना ने झारखंड पुलिस महकमे में पुलिसकर्मियों और होमगार्ड जवानों के अधिकारों और सुरक्षा को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं.
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पुलिस एसोसिएशन की भूमिका पर सवाल
झारखंड में जब कभी किसी पुलिस अधिकारी या थाना प्रभारी के साथ जनप्रतिनिधि के कथित दुर्व्यवहार का मामला सामने आता है, तो पुलिस एसोसिएशन कई बार खुलकर अपनी बात रखता रहा है.प्रेस कॉन्फ्रेंस किए जाते हैं, बयान जारी होते हैं और कार्रवाई की मांग भी की जाती है. यह पुलिसकर्मियों के हितों की रक्षा के लिए एसोसिएशन की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है.
लेकिन सवाल यह है कि जब एक होमगार्ड जवान ने अपनी ही वर्दीधारी बिरादरी के एक अधिकारी पर हाथ-पैर बांधकर पीटने जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं, तब पुलिस एसोसिएशन की ओर से अब तक ऐसी ही सक्रियता क्यों नहीं दिखाई दे रही ? क्या किसी होमगार्ड जवान के सम्मान और अधिकारों की रक्षा करना भी एसोसिएशन की जिम्मेदारी नहीं है? सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि होमगार्ड जवान भी कानून-व्यवस्था की ड्यूटी में पुलिस के साथ काम करते हैं और कई बार उन्हीं परिस्थितियों में अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं.

क्या वर्दी के भीतर भी अलग-अलग मापदंड हैं?
यह मामला केवल एक जवान और एक थाना प्रभारी के बीच विवाद का नहीं है. इससे बड़ा सवाल पुलिस व्यवस्था के भीतर जवाबदेही का है. अगर किसी जनप्रतिनिधि द्वारा पुलिस अधिकारी के साथ कथित दुर्व्यवहार पर पुलिस संगठन आवाज उठाता है, तो किसी पुलिसकर्मी या होमगार्ड जवान के साथ कथित ज्यादती के आरोप पर भी निष्पक्ष जांच और कार्रवाई की मांग होनी चाहिए. कानून की नजर में किसी व्यक्ति की गरिमा उसके पद से तय नहीं होती.
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के साथ गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार देता है. पुलिस हिरासत या थाने के भीतर किसी व्यक्ति के साथ कथित मारपीट का आरोप इसलिए भी गंभीर माना जाता है, क्योंकि पुलिस से कानून का पालन कराने और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने की अपेक्षा की जाती है. ऐसे मामलों में आरोप सही हैं या गलत, इसका फैसला जांच के आधार पर होना चाहिए. लेकिन शिकायत सामने आने के बाद निष्पक्ष जांच और पारदर्शी कार्रवाई जरूरी है.
अब जांच और कार्रवाई पर नजर
इस मामले में सबसे अहम सवाल यही है कि हजारीबाग पुलिस प्रशासन होमगार्ड जवान मनोज कुमार की शिकायत पर किस तरह की जांच करता है. क्या थाने में मौजूद सीसीटीवी फुटेज की जांच होगी? क्या जवान का मेडिकल परीक्षण कराया गया है? क्या घटना के समय थाने में मौजूद पुलिसकर्मियों और अन्य लोगों के बयान दर्ज किए जाएंगे? और अगर आरोप सही पाए जाते हैं, तो जिम्मेदार अधिकारी के खिलाफ क्या कार्रवाई होगी ? फिलहाल थाना प्रभारी जानू कुमार आरोपों को खारिज कर चुके हैं. इसलिए जांच पूरी होने से पहले किसी को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा.
लेकिन इसी के साथ यह सवाल भी बना हुआ है कि झारखंड पुलिस एसोसिएशन और होमगार्ड एसोसिएशन इस मामले में कब अपनी चुप्पी तोड़ेंगे? क्या वे इस मामले में निष्पक्ष जांच की मांग करेंगे? क्या पीड़ित जवान के पक्ष को भी उतनी ही मजबूती से उठाया जाएगा, जितनी मजबूती से पुलिस अधिकारियों के सम्मान से जुड़े मामलों में आवाज उठाई जाती है? अब सबकी नजर हजारीबाग पुलिस प्रशासन की जांच और दोनों पुलिस संगठनों की अगली भूमिका पर है.
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