झारखंड की राजनीति में ढोल-नगाड़ों की थाप पर ‘आदिवासी अस्मिता’ का बिगुल फूंकना कोई नई बात नहीं है, लेकिन रांची के मोरहाबादी मैदान में आयोजित ‘आदिवासी एकता महाजुटान’ में जो नजारा दिखा, उसने सियासी पंडितों के होश उड़ा दिए. लाखों की भीड़, उबलते तेवर और मंच के ठीक बीचों-बीच रखी मुख्य अतिथि की खाली कुर्सी! कांग्रेस के कद्दावर आदिवासी नेता बंधु तिर्की खुद सीएम आवास पहुंचकर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को न्योता सौंपकर आए थे. सबको लगा कि ‘शेर’ गरजेंगे, मगर जब शो शुरू हुआ, तो मंच पर मुख्यमंत्री की जगह झामुमो विधायक विकास मुंडा ‘सरकारी हाजिरी’ लगाते नजर आए. जिस राज्य की सत्ता ही आदिवासी वोटबैंक की धुरी पर घूमती हो, वहां के सीएम का अपने ही समाज के सबसे बड़े जमावड़े से यूं कन्नी काट लेना कोई इत्तेफाक नहीं, बल्कि एक बेहद नपी-तुली सियासी बाजीगरी है.
दूसरे के सजाए मंच पर क्यों बनें ‘शोपीस’?
राजनीति का सबसे पुराना और अनकहा नियम है ‘भीड़ किसी की भी हो, तालियां सिर्फ अपने नाम बजनी चाहिए.’ इस पूरे महाजुटान के डायरेक्टर और प्रोड्यूसर बंधु तिर्की थे. अगर हेमंत सोरेन वहां चले जाते, तो पूरा नैरेटिव और सुर्खियां बंधु तिर्की के खाते में चली जातीं कि कैसे उन्होंने सीएम को अपने मंच पर खींच लिया. अपने ही राज्य में किसी सहयोगी दल के नेता को ‘आदिवासी मसीहा’ का ताज पहनने का मौका देना हेमंत सोरेन के सियासी स्टाइल में फिट नहीं बैठता. सीएम ने दूरी बनाकर बहुत साफ संदेश दे दिया कि वे किसी और के लिखे नाटक के मुख्य अभिनेता नहीं बनेंगे.
विपक्ष वाली दहाड़ बनाम सत्ता की लाचारी
महाजुटान के मंच से हवा में जो तीर चल रहे थे, वे बेहद तीखे थे. प्रस्तावित परिसीमन (Delimitation) के विरोध में आदिवासी सीटों को बचाने की हुंकार थी और सीएनटी-एसपीटी एक्ट से लेकर 5वीं अनुसूची तक सीधे आर-पार का मूड बनाया जा रहा था. अब पेंच यह है कि विपक्ष में बैठकर माइक पर आग उगलना बहुत आसान होता है, लेकिन जब आप खुद सत्ता के तख्त पर बैठे हों, तो मंच से ऐसे वादे करना नामुमकिन हो जाता है जिन्हें कल सुबह पूरा करना पड़े. अगर सीएम वहां जाते, तो जनता भाषण के बदले ऑन-द-स्पॉट फैसलों और सरकारी आदेशों की उम्मीद करती, जो किसी भी सत्तारूढ़ दल के लिए अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा होता.
सांप भी मरा, लाठी भी बची
राजनीतिक कूटनीति का असली रंग तब दिखा जब सीएम खुद तो नहीं पहुंचे, लेकिन अपनी पार्टी के प्रमुख आदिवासी चेहरे और विधायक विकास मुंडा को मंच पर भेज दिया. इसे कहते हैं क्लासिक डैमेज कंट्रोल! अब न तो समाज यह ताना मार सकता है कि ‘सरकार ने आदिवासियों को नजरअंदाज कर दिया’ और न ही विपक्ष यह आरोप लगा सकता है कि सीएम ने मंच से कोई ऐसा गैर-जिम्मेदाराना वादा कर दिया जिससे बाद में सरकार घिर जाए. बिना एक शब्द बोले और बिना मंच पर कदम रखे, सीएम साहब ने अपना पूरा सियासी गणित एकदम दुरुस्त कर लिया.सियासत के अखाड़े में कभी-कभी ‘हाजिर’ रहने से ज्यादा असरदार ‘गायब’ रहना साबित होता है. मोरहाबादी में नारे गूंजते रहे, प्रस्ताव पास होते रहे, विकास मुंडा भाषण देते रहे और सीएम आवास के बंद कमरों में शांति से पूरी बाजी अपने पक्ष में घुमा ली गई. अब देखना यह है कि यह ‘मास्टरस्ट्रोक’ था या आने वाले वक्त में अपने ही कोर वोटबैंक की नाराजगी मोल लेने की शुरुआत.
