RANCHI : भारतीय जनता पार्टी की प्रदेश प्रवक्ता राफिया नाज़ ने स्वास्थ्य मंत्री इरफ़ान अंसारी के रिम्स पार्ट-2 संबंधी बयान पर तीखा पलटवार करते हुए कहा कि झारखंड की जनता को नए सपने नहीं, बल्कि अस्पतालों में जीवन बचाने वाली सुविधाएं चाहिए. जब राज्य का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल रिम्स आज भी डॉक्टरों, नर्सों, दवाइयों, बेड और आवश्यक उपकरणों की कमी से जूझ रहा है, तब रिम्स पार्ट-2 की घोषणा जनता के जख्मों पर मरहम नहीं, बल्कि नमक छिड़कने जैसा ही है.

अस्पतालों में लोग इलाज के अभाव में दम तोड़ रहे हों, तब रिम्स पार्ट-2 केवल एक छलावा है
राफिया नाज़ ने कहा कि झारखंड का गरीब मरीज इलाज के लिए अस्पताल पहुंचता है, लेकिन उसे इलाज से पहले लंबी कतारें, खाली वार्ड, दवाइयों की कमी और डॉक्टरों का इंतजार मिलता है. कई परिवार अपने परिजनों को बचाने के लिए कर्ज लेने, जमीन बेचने और दर-दर भटकने को मजबूर हैं। यह केवल व्यवस्था की कमी नहीं, बल्कि स्वास्थ्य विभाग की संवेदनहीनता का परिणाम है. उन्होंने कहा कि भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की 2025 की रिपोर्ट ने स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही को उजागर कर दिया है. मार्च 2022 तक राज्य में 3,634 स्वीकृत चिकित्सा पदों में से 2,210 पद, 5,872 स्टाफ नर्सों में से 3,033 पद तथा 1,080 पैरामेडिकल पदों में से 864 पद रिक्त थे. वर्षों बीत जाने के बावजूद इन रिक्तियों को नहीं भर पाना बताता है कि स्वास्थ्य विभाग की प्राथमिकताओं में गरीब मरीज कभी शामिल ही नहीं रहे.
राफिया नाज़ ने कहा कि रिम्स की बदहाल व्यवस्था किसी से छिपी नहीं है.दवाइयों की कमी, उपकरणों का अभाव, लंबी प्रतीक्षा और संसाधनों की कमी से रोज़ मरीज और उनके परिजन परेशान होते हैं. झारखंड उच्च न्यायालय भी कई बार रिम्स की अव्यवस्था और रिक्त पदों पर सवाल उठा चुका है. ऐसे में पहले रिम्स पार्ट-1 को पूरी तरह सक्षम बनाना स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी है, उसके बाद ही किसी नए प्रोजेक्ट की बात होनी चाहिए. राफिया नाज ने कहा कि भाजपा को राज्य सरकार के रिम्स टू की योजना से रत्ती भर भी आपत्ति नहीं है. आपत्ति है इसके लिए सरकार द्वारा गलत स्थल चयन को लेकर, आपत्ति है राज्य में पूर्व के चिकित्सीय संस्थान में बिना व्यवस्था दुरुस्त किए नए संस्थान का सपना दिखाने से क्या सिर्फ आलीशान भवन समुचित इलाज की गारंटी होती है ? या इसके लिए अस्पतालों में उपकरण, दवा, डॉक्टर सहित अन्य तमाम संसाधन जरूरी होते हैं. रही बात भाजपा की तो भाजपा ने झारखंड में एम्स बनाया, कई मेडिकल कॉलेज बनाया। आयुष्मान योजना जैसी योजना दी, जो गरीबों के लिए वरदान बनी.
उन्होंने कहा कि हाल ही में रांची के एक निजी अस्पताल में एक मरीज के इलाज के बाद लगभग 22 लाख रुपये का बिल थमा दिया गया. यह केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की विफलता है, जिसने निजी अस्पतालों की मनमानी पर अंकुश लगाने की जिम्मेदारी ही छोड़ दी है.यदि सरकारी अस्पताल मजबूत होते तो गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों को ऐसी आर्थिक तबाही का सामना नहीं करना पड़ता. राफिया नाज़ ने कहा कि आज भी झारखंड के कई जिलों में ब्लड बैंक की सुविधा नहीं ह. कहीं गलत ब्लड चढ़ने से लोगों की जान जा रही है, तो कहीं समय पर एम्बुलेंस नहीं मिलने से मरीज रास्ते में दम तोड़ रहे हैं. गर्भवती महिलाओं को समय पर इलाज नहीं मिल रहा, गंभीर मरीज अस्पतालों के चक्कर काट रहे हैं और सरकारी अस्पतालों में मुफ्त मिलने वाली दवाइयां तक उपलब्ध नहीं हैं. मजबूर होकर गरीब मरीज बाहर से महंगी दवाइयां खरीदते हैं या इलाज अधूरा छोड़ देते हैं. आखिर इन मौतों और इस पीड़ा की जिम्मेदारी कौन लेगा?
