Aanchal
RANCHI : रोशनी खलखो जिन पर कभी आरोप था मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के काफिले को रुकवाने का, आज वही रोशनी खलखो रांची की मेयर बन गई हैं. कभी सड़क पर विरोध करते हुए चर्चा में आईं रोशनी खलखो आज राजधानी रांची की पहली नागरिक चुनी गई हैं. यह जीत सिर्फ एक चेहरे की जीत नहीं, बल्कि राजनीति के गणित को समझने वाली बड़ी कहानी है. भाजपा समर्थित रोशनी खलखो ने रांची नगर निगम मेयर चुनाव में कुल 1,57,669 वोट हासिल किए. उन्होंने कांग्रेस समर्थित उम्मीदवार रमा खलखो को 14,363 वोटों के अंतर से हराया. रमा खलखो को 1,43,306 वोट मिले. वहीं दूसरी तरफ राष्ट्रीय जनता दल समर्थित सुजाता कच्छप और झारखंड मुक्ति मोर्चा समर्थित सुजीत विजय आनंद कुजूर भी मैदान में थे, लेकिन वे निर्णायक मुकाबले में पीछे रह गए. यानी साफ है कि रोशनी खलखो ने तीन-तीन बड़ी पार्टियों के समर्थित उम्मीदवारों को पीछे छोड़ दिया.

कैसे किया किला फतह
अब सबसे बड़ा सवाल—आखिर भारतीय जनता पार्टी की यह जीत कैसे हुई? जबकि राज्य में सत्ता झारखंड मुक्ति मोर्चा, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल के गठबंधन की है!
इसका जवाब बहुत सीधा है—ज़मीन पर गठबंधन एकजुट नहीं दिखा. तीनों पार्टियों ने अलग-अलग उम्मीदवारों को समर्थन दिया. कांग्रेस ने रमा खलखो को आगे किया, राष्ट्रीय जनता दल ने सुजाता कच्छप को और झारखंड मुक्ति मोर्चा ने सुजीत विजय आनंद कुजूर को. यानी जो वोट एक साथ आ सकता था, वह तीन हिस्सों में बंट गया. चुनाव में सबसे बड़ा नियम है—वोट बंटा तो खेल खत्म.
अगर यही तीनों पार्टियां मिलकर एक ही मजबूत उम्मीदवार उतारतीं, तो मुकाबला बहुत कड़ा हो सकता था. लेकिन अलग-अलग काम करने और अलग-अलग उम्मीदवार उतारने की वजह से उनका पारंपरिक वोट बैंक बिखर गया. बूथ स्तर पर भी कार्यकर्ताओं में पूरा तालमेल नहीं दिखा. कई जगह कार्यकर्ता खुद असमंजस में थे कि किसे पूरी ताकत से समर्थन करें.
दूसरी तरफ रोशनी खलखो को भारतीय जनता पार्टी समर्थित चेहरा माना गया और उनका वोट बैंक काफी हद तक एकजुट रहा. भारतीय जनता पार्टी ने अपनी पूरी ताकत रोशनी के समर्थन में लगा दी और अब देखिए—पूरे रांची में रोशनी ही रोशनी है. शहरी इलाकों में भारतीय जनता पार्टी का कोर वोट पहले से मजबूत है. जब सामने वाले खेमे में बिखराव हो और आपका वोट एक दिशा में जाए, तो फायदा किसे मिलेगा—यह साफ है.
सही उम्मीदवार
एक और बात—उम्मीदवार चयन पर भी सवाल उठ रहे हैं कि गठबंधन की पार्टियों ने समर्थित उम्मीदवार तय करते समय लोकप्रियता और ज़मीनी पकड़ पर पूरा ध्यान नहीं दिया. अगर उम्मीदवार ऐसा हो जो सभी दलों के समर्थकों को जोड़ सके, तो वोट का स्थानांतरण आसान होता है. लेकिन यहां ऐसा नहीं हुआ.
रोशनी खलखो की व्यक्तिगत छवि भी उनके काम आई. मुख्यमंत्री का काफिला रोकने वाली घटना ने उन्हें एक साहसी और बेबाक नेता की पहचान दी. लोगों को लगा कि यह महिला अपनी बात खुलकर रखती है. स्थानीय मुद्दों जैसे सड़क, पानी, सफाई और यातायात पर उन्होंने सीधा संवाद किया. कई मतदाताओं ने पार्टी नहीं, बल्कि व्यक्ति को चुना.
शुरू से बढ़त
आपको बता दें, पहले दौर से ही रोशनी खलखो बढ़त में रहीं और यह बढ़त हर दौर के साथ बढ़ती गई. पहले दौर में उन्हें 44,574 वोट मिले, जबकि रमा खलखो को 31,063 मत मिले. दूसरे दौर में रोशनी को 40,208 और रमा को 29,635 वोट मिले. तीसरे दौर में भी यही अंतर कायम रहा और अंत तक रोशनी की बढ़त बरकरार रही. अंतिम परिणाम में रोशनी खलखो को कुल 1,57,669 वोट मिले, जबकि रमा खलखो को 1,43,306 वोट मिले. इस तरह रोशनी ने 14,363 मतों के अंतर से जीत दर्ज की.
मतगणना स्थल ट्रांसपोर्ट नगर में रात करीब 12 बजे जीत की औपचारिक घोषणा की गई. घोषणा के बाद समर्थकों ने नारेबाजी की और फूल-मालाओं से स्वागत किया. कुल मिलाकर बात साफ है—अगर सत्ताधारी दल एकजुट होकर काम करता, तो शायद तस्वीर कुछ और ही होती.
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