RANCHI : झारखंड हाई कोर्ट ने पति-पत्नी के बीच स्त्रीधन को लेकर चल रहे विवाद में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. जस्टिस एसएन प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि पत्नी के स्त्रीधन के रूप में रखे गए गहनों पर उसका अधिकार बना रहता है. अदालत ने पति को पत्नी की जानकारी और सहमति के बिना संयुक्त बैंक लॉकर संचालित करने से भी रोक दिया.
हाई कोर्ट ने बोकारो फैमिली कोर्ट के दिसंबर 2024 में दिए गए आदेश को बरकरार रखते हुए पति की ओर से दाखिल प्रथम अपील को खारिज कर दिया. यह मामला बोकारो स्थित यूनियन बैंक ऑफ इंडिया की एक शाखा के संयुक्त लॉकर से जुड़ा था.
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क्या है पूरा मामला
बोकारो निवासी एके सिंह और उनकी पत्नी पी राज के नाम बैंक लॉकर संयुक्त रूप से दर्ज था. पत्नी का कहना था कि उनके मायके और ससुराल पक्ष से विवाह के दौरान मिले उपहारों में शामिल करीब 25 लाख रुपये मूल्य के सोने और अन्य आभूषण इस लॉकर में रखे गए थे .पत्नी के अनुसार ये सभी सामान उनका स्त्रीधन था और सुरक्षा के लिहाज से लॉकर में रखा गया था.
विवाह के बाद दोनों के बीच विवाद हो गया और पत्नी ने अपना वैवाहिक घर छोड़ दिया. इसके बाद उनके आभूषण बैंक लॉकर में ही रह गए. पत्नी ने आरोप लगाया कि कई बार मांग करने के बावजूद पति ने उनके गहने वापस नहीं किए. इसके बाद पत्नी ने बोकारो फैमिली कोर्ट का रुख किया. उन्होंने अपने स्त्रीधन की सुरक्षा सुनिश्चित करने और उनकी जानकारी या सहमति के बिना संयुक्त लॉकर संचालित किए जाने पर रोक लगाने की मांग की.
पति ने क्या दिया तर्क
पति ने पत्नी के आरोपों से इनकार करते हुए दावा किया कि पत्नी अपना पूरा स्त्रीधन अपने साथ ले गई थी. उसका यह भी कहना था कि बैंक लॉकर में उसकी मां, बहन और भाभी के गहने भी रखे हुए हैं. इसलिए लॉकर में मौजूद आभूषणों को केवल पत्नी के स्त्रीधन के तौर पर नहीं माना जा सकता. हालांकि, हाई कोर्ट ने पति के इस दावे को स्वीकार नहीं किया. अदालत ने पाया कि अपने पक्ष को साबित करने के लिए पति कोई ठोस साक्ष्य पेश नहीं कर सका. खास तौर पर उसने अपनी मां, बहन या भाभी में से किसी को भी अदालत के समक्ष गवाह के रूप में पेश नहीं किया, जिससे यह साबित हो सके कि लॉकर में उनके आभूषण रखे गए थे.
पत्नी के बयान को अदालत ने माना विश्वसनीय
खंडपीठ ने मामले में पत्नी के बयान और उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण किया. अदालत ने पाया कि पति के परिवार की ओर से दिए गए साक्ष्यों से भी यह संकेत मिलता है कि संबंधित बैंक लॉकर का संचालन विवाह के बाद किया गया था. ऐसी स्थिति में केवल यह दावा कर देना कि लॉकर में पति के परिवार की अन्य महिलाओं के गहने भी रखे थे, पर्याप्त नहीं माना जा सकता. अदालत ने कहा कि इस दावे के समर्थन में ठोस प्रमाण नहीं होने के कारण इसे स्वीकार करना उचित नहीं होगा.
फैमिली कोर्ट के आदेश में नहीं मिली कोई कानूनी खामी
सभी तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों पर विचार करने के बाद हाई कोर्ट ने कहा कि बोकारो फैमिली कोर्ट के दिसंबर 2024 के आदेश में कोई ऐसी कानूनी त्रुटि नहीं है, जिसके आधार पर उसमें हस्तक्षेप किया जाए. खंडपीठ ने पत्नी के स्त्रीधन संबंधी अधिकार को बरकरार रखा और पति को पत्नी की जानकारी या सहमति के बिना संयुक्त बैंक लॉकर संचालित करने से रोक दिया. इसके साथ ही अदालत ने पति की ओर से दाखिल प्रथम अपील को खारिज कर दिया. यह फैसला वैवाहिक विवादों में स्त्रीधन की सुरक्षा और उस पर महिला के अधिकार के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
