RANCHI / JAMSHEDPUR : अधिकारियों के देर से दफ्तर पहुंचने पर माला पहनाकर स्वागत करने वाले झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के पोटका विधायक संजीव सरदार अब एक अलग विवाद में घिर गए हैं. सुवर्णरेखा परियोजना से जुड़े दो आदिवासी अभियंताओं ने विधायक पर मारपीट का आरोप लगाया है. आरोप लगाने वालों में कार्यपालक अभियंता शिवराम गागराई और सहायक अभियंता विजय तिर्की शामिल हैं. इस मामले के विरोध में अभियंता संघ ने एक सप्ताह तक काला बिल्ला लगाकर काम करने का ऐलान किया है.
एक ही विधायक के दो अलग-अलग तरीकों की चर्चा है.कार्यालय में देर से आने वाले अधिकारियों के लिए माला, जबकि घर पर योजना पर चर्चा करने पहुंचे अभियंताओं के साथ कथित मारपीट का आरोप. सवाल यह है कि आखिर जनप्रतिनिधियों के लिए अनुशासन और जवाबदेही का पैमाना क्या होना चाहिए?

देर से पहुंचे अधिकारी, तो विधायक ने गेट पर ही लगा ली कुर्सी
13 अक्टूबर 2026 को पोटका प्रखंड सह अंचल कार्यालय में विधायक संजीव सरदार के पहुंचने की कहानी सामने आई. बताया जाता है कि उन्हें लगातार शिकायतें मिल रही थीं कि अधिकारी और कर्मचारी समय पर कार्यालय नहीं पहुंचते, जिसके कारण आम लोगों को अपने काम के लिए इंतजार करना पड़ता है. इन्हीं शिकायतों के बीच विधायक सुबह करीब 10 बजे कार्यालय पहुंचे. वहां कुछ कर्मचारियों को छोड़कर कई अधिकारी मौजूद नहीं थे.
इसके बाद विधायक ने कार्यालय के गेट पर कुर्सी लगाई और अधिकारियों के आने का इंतजार करने लगे. बताया गया कि वह करीब डेढ़ घंटे तक बैठे रहे. इसके बाद अंचलाधिकारी निकिता बाला, आपूर्ति पदाधिकारी मनीषा कुमारी, श्रम पदाधिकारी धीरज कुमार और मनरेगा के प्रखंड कार्यक्रम पदाधिकारी गुरुचरण महतो सहित अन्य अधिकारी कार्यालय पहुंचे.

विधायक ने देर से पहुंचे अधिकारियों को डांटने या सार्वजनिक रूप से अपमानित करने के बजाय माला पहनाकर उनका स्वागत किया. इस कदम को सरकारी कार्यालयों में समयपालन और जवाबदेही का संदेश देने की कोशिश के तौर पर देखा गया. आखिर सरकारी दफ्तर जनता के काम के लिए हैं. अगर अधिकारी समय पर नहीं पहुंचते, तो सबसे ज्यादा परेशानी उस आम आदमी को होती है, जो अपनी छोटी-सी समस्या लेकर घंटों कार्यालय के चक्कर काटता है. लेकिन कहानी का दूसरा हिस्सा सामने आने के बाद विधायक के इस तरीके पर भी सवाल उठने लगे हैं.
माला पहनाने वाले विधायक पर थप्पड़ मारने का आरोप क्यों?
विवाद का दूसरा सिरा सुवर्णरेखा परियोजना से जुड़ा है. आरोप है कि जल संसाधन विभाग के दो आदिवासी अभियंता-कार्यपालक अभियंता शिवराम गागराई और सहायक अभियंता विजय तिर्की-किसी योजना के सिलसिले में विधायक संजीव सरदार के आवास पर पहुंचे थे. इसी दौरान बातचीत बिगड़ गई. आरोप लगाया गया कि विधायक ने दोनों अभियंताओं के साथ मारपीट की और उन्हें थप्पड़ मारे.

हालांकि, इस मामले में विधायक का पक्ष, घटना की पूरी परिस्थितियां और उपलब्ध स्वतंत्र साक्ष्यों के आधार पर आरोपों की पुष्टि आवश्यक है. इसलिए आरोप को स्थापित तथ्य मानने से पहले संबंधित पक्षों की बात और जांच के निष्कर्ष सामने आना जरूरी है.
फिर भी, आरोप गंभीर हैं. अगर किसी जनप्रतिनिधि पर सरकारी अधिकारियों के साथ मारपीट का आरोप लगता है, तो यह केवल दो व्यक्तियों के बीच का विवाद नहीं रह जाता. यह सरकारी कर्मचारियों की सुरक्षा, जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही और प्रशासनिक व्यवस्था में संवाद के तरीकों से भी जुड़ जाता है.
बीजेपी ने हेमंत सरकार को घेरा, उठाया आदिवासी सम्मान का सवाल
इस मामले को लेकर बीजेपी ने हेमंत सोरेन सरकार पर निशाना साधा है. पार्टी ने आरोप लगाया कि सरकार में आदिवासी अधिकारी ही सुरक्षित नहीं हैं. बीजेपी ने कहा कि पोटका से झामुमो विधायक संजीव सरदार पर सुवर्णरेखा परियोजना के आदिवासी अभियंताओं के साथ मारपीट का गंभीर आरोप लगा है. पार्टी ने सवाल उठाया कि आदिवासी हितों और अधिकारों की बात करने वाली सरकार के कार्यकाल में अधिकारियों की सुरक्षा पर सवाल क्यों खड़े हो रहे हैं.
हेमंत सरकार का आदिवासी विरोधी चेहरा बेनकाब!
पोटका से झामुमो विधायक संजीव सरदार पर सुवर्णरेखा परियोजना के आदिवासी अभियंताओं- कार्यपालक अभियंता शिवराम गागराई और सहायक अभियंता विजय तिर्की के साथ मारपीट का गंभीर आरोप लगा है। इसके विरोध में अभियंता संघ ने एक सप्ताह तक काला बिल्ला लगाकर काम करने का ऐलान किया है।
जो हेमंत सरकार आदिवासियों के हित और अधिकारों की बात करती है, उसी के राज में आदिवासी अधिकारी खुद असुरक्षित और प्रताड़ित हैं। आखिर यह कैसा आदिवासी हितैषी शासन है, जहां आदिवासी अधिकारियों की सुरक्षा पर ही सवाल खड़े हो रहे हैं?
— BJP JHARKHAND (@BJP4Jharkhand) October 14, 2026
वहीं, अभियंता संघ की ओर से एक सप्ताह तक काला बिल्ला लगाकर काम करने के ऐलान ने इस विवाद को और गंभीर बना दिया है. अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संबंधित विभाग और सरकार इस मामले में क्या कदम उठाते हैं.
लेकिन बीजेपी से भी एक सवाल-आदिवासी सम्मान की याद विपक्ष में ही क्यों आती है?
बीजेपी के सवाल अपनी जगह हैं, लेकिन राजनीतिक दलों से एक सवाल यह भी पूछा जाना चाहिए कि आदिवासी सम्मान, अधिकारियों की सुरक्षा और जवाबदेही के मुद्दे पर उनका रुख सत्ता में रहते हुए और विपक्ष में रहते हुए कितना समान रहता है? यह सवाल केवल बीजेपी तक सीमित नहीं है. झारखंड की राजनीति में सत्ता बदलती रहती है और विपक्ष में बैठने वाले दल अक्सर उन्हीं मुद्दों को उठाते हैं, जिन पर सत्ता पक्ष को जवाब देना पड़ता है.
इसलिए सवाल किसी एक पार्टी से आगे का है. आदिवासी सम्मान केवल राजनीतिक भाषणों, प्रेस विज्ञप्तियों और आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रहना चाहिए. इसका मतलब है-आदिवासी नागरिकों के अधिकारों की रक्षा, सरकारी कर्मचारियों की सुरक्षा, प्रशासनिक जवाबदेही और कानून के प्रति समान सम्मान.
अगर किसी अधिकारी की लापरवाही है, तो उसके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए. और अगर किसी जनप्रतिनिधि पर मारपीट का आरोप है, तो उसकी भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए.किसी व्यक्ति का पद, पार्टी या राजनीतिक प्रभाव जांच के रास्ते में बाधा नहीं बनना चाहिए.
जनता के सवाल का जवाब कौन देगा?
पोटका प्रखंड सह अंचल कार्यालय में अधिकारियों के देर से पहुंचने का मुद्दा जनता की रोजमर्रा की परेशानी से जुड़ा है. विधायक का वहां पहुंचना और अधिकारियों की मौजूदगी पर सवाल उठाना प्रशासनिक जवाबदेही की चर्चा को सामने लाता है.
लेकिन अभियंताओं के साथ कथित मारपीट का मामला एक अलग सवाल खड़ा करता है-क्या सरकारी व्यवस्था में सुधार की कोशिश नियमों और संवाद के दायरे में रहकर नहीं होनी चाहिए? देर से आने वाले अधिकारियों को समय पर कार्यालय पहुंचना चाहिए. योजनाओं पर काम करने वाले अभियंताओं को भी अपने काम के सिलसिले में सुरक्षित माहौल मिलना चाहिए. और जनप्रतिनिधियों से अपेक्षा की जाती है कि वे शिकायतों का समाधान संस्थागत तरीके से कराएं.
क्योंकि सवाल सिर्फ माला पहनाने या थप्पड़ मारने के आरोप का नहीं है. सवाल यह है कि सरकारी व्यवस्था में जवाबदेही तय करने का अधिकार किसे है, उसकी सीमा क्या है और क्या कानून सभी के लिए एक समान तरीके से लागू होगा?
