RANCHI : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आज, 17 सितंबर को 76वां जन्मदिन है. देशभर में उनके जन्मदिन को लेकर अलग-अलग कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं. पटना में भी प्रधानमंत्री के जन्मदिन की पूर्व संध्या पर बीजेपी कार्यकर्ताओं ने कालीघाट पर उनके कटआउट का 76 किलो दूध से दुग्धाभिषेक किया. इसके अलावा पटना के मरीन ड्राइव पर दीप जलाने का कार्यक्रम भी आयोजित किया गया.

लेकिन इन आयोजनों के बीच बिहार में जारी बाढ़ ने एक अलग सवाल खड़ा कर दिया है.राज्य के 15 जिलों में करीब 50 लाख लोग बाढ़ से प्रभावित हैं. कई इलाकों में नदियां खतरे के निशान से ऊपर बह रही हैं और बड़ी आबादी अब भी बाढ़ के असर से जूझ रही है. ऐसे में प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर आयोजित इन कार्यक्रमों और उनमें दूध तथा संसाधनों के इस्तेमाल को लेकर सवाल उठ रहे हैं.
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एक तरफ जन्मदिन का जश्न, दूसरी तरफ बाढ़ की मार
बिहार में इस साल बाढ़ की स्थिति कई जिलों में गंभीर बनी हुई है. आपदा प्रबंधन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, 14 सितंबर तक 15 जिलों में करीब 49.36 लाख लोग बाढ़ से प्रभावित थे. प्रभावित जिलों में पटना, भोजपुर, सारण, वैशाली, भागलपुर, बेगूसराय, बक्सर, समस्तीपुर, मुंगेर, कटिहार, पूर्णिया, मधेपुरा और अररिया समेत अन्य जिले शामिल हैं. भागलपुर के सुल्तानगंज में गंगा का जलस्तर खतरे के निशान से 1.71 मीटर ऊपर दर्ज किया गया था. राज्य की कई अन्य नदियां भी उफान पर रही हैं.
बाढ़ के कारण बड़ी संख्या में लोगों के सामने घर, भोजन, पीने के पानी और रोजमर्रा की जरूरतों का संकट खड़ा हुआ है. प्रशासन की ओर से राहत और बचाव अभियान चलाए जा रहे हैं, लेकिन कई इलाकों में स्थिति चुनौतीपूर्ण बनी हुई है. इसी बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के मौके पर पटना में हुए आयोजनों ने राजनीतिक और सामाजिक बहस को जन्म दिया है.
76 किलो दूध से हुआ दुग्धाभिषेक
16 सितंबर को प्रधानमंत्री के जन्मदिन की पूर्व संध्या पर पटना के कालीघाट में बीजेपी कार्यकर्ताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कटआउट पर 76 किलो दूध चढ़ाया. कार्यक्रम के दौरान वैदिक मंत्रोच्चार और आरती की गई. इसके बाद मिठाई भी बांटी गई. आयोजकों ने प्रधानमंत्री की लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य की कामना की. यह आयोजन ऐसे समय हुआ है, जब बिहार के कई हिस्से बाढ़ से प्रभावित हैं और लाखों लोग राहत की जरूरत में हैं. यहीं से सवाल उठता है-क्या किसी नेता के जन्मदिन पर इस तरह का धार्मिक या सांकेतिक आयोजन करना गलत है?
जवाब सीधा नहीं है. किसी नेता का जन्मदिन मनाना और उसके प्रति अपनी आस्था या समर्थन व्यक्त करना लोगों का अधिकार है. लेकिन जब उसी समय बड़ी संख्या में लोग आपदा से जूझ रहे हों, तब सार्वजनिक रूप से संसाधनों के इस्तेमाल और ऐसे आयोजनों की प्राथमिकता पर सवाल उठना स्वाभाविक है.
पांच साल में बिहार को बाढ़ से मुक्त करने का वादा
बिहार में बाढ़ का मुद्दा सिर्फ इस साल का नहीं है. यह राज्य की राजनीति का लंबे समय से महत्वपूर्ण विषय रहा है. मार्च 2025 में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने गोपालगंज की एक चुनावी सभा में कहा था कि अगर एनडीए दोबारा सत्ता में आती है तो बिहार की दशकों पुरानी बाढ़ की समस्या को पांच साल में खत्म करने का प्रयास किया जाएगा.
इसके बाद 2025 के एनडीए घोषणापत्र में भी पांच साल में बिहार को बाढ़ मुक्त बनाने का वादा किया गया. इसके लिए फ्लड मैनेजमेंट बोर्ड, नदी जोड़ परियोजनाओं, तटबंधों और नहरों समेत कई उपायों की बात कही गई थी. अब 2026 में जब बिहार एक बार फिर बड़ी बाढ़ का सामना कर रहा है, तो उस वादे की प्रगति को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है. हालांकि, यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि बाढ़ एक जटिल प्राकृतिक और प्रशासनिक चुनौती है. बिहार में गंगा, कोसी, गंडक, बूढ़ी गंडक और पुनपुन जैसी नदियों के जलस्तर के साथ नेपाल के जलग्रहण क्षेत्रों में बारिश और नदी तंत्र की परिस्थितियां भी बाढ़ को प्रभावित करती हैं.
सवाल जन्मदिन से नहीं, प्राथमिकताओं से है
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जन्मदिन की शुभकामनाएं देना या उनका जन्मदिन मनाना अपने आप में कोई गलत बात नहीं है. लेकिन सवाल यह है कि जब एक तरफ लाखों लोग बाढ़ से प्रभावित हों, तब सरकार और राजनीतिक दलों की प्राथमिकताएं क्या होनी चाहिए? क्या जन्मदिन के जश्न के साथ-साथ बाढ़ प्रभावित परिवारों की समस्याओं पर उतना ही जोर नहीं होना चाहिए? क्या दूध से दुग्धाभिषेक करने के बजाय उसी संसाधन को जरूरतमंदों तक पहुंचाने की पहल ज्यादा उपयोगी नहीं होती?
और सबसे बड़ा सवाल-पांच साल में बिहार को बाढ़ मुक्त बनाने का जो वादा किया गया था, उसकी दिशा में अब तक कितना काम हुआ है? इन सवालों का जवाब सिर्फ राजनीतिक बयान से नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई देने वाले काम और उसके नतीजों से मिलना चाहिए. आखरी में फिर से-प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जन्मदिन की शुभकामनाएं. लेकिन एक पत्रकार के तौर पर सवाल पूछना भी जरूरी है.आज बिहार बाढ़ से जूझ रहा है-तो क्या अगले जन्मदिन तक बिहार को बाढ़ से राहत दिलाने के वादे की दिशा में कोई ठोस बदलाव दिखाई देगा? क्योंकि जन्मदिन हर साल आता है. लेकिन बाढ़ में डूबे परिवारों का इंतजार हर साल नहीं होना चाहिए.
