Ranchi /Bokaro : झारखंड के बोकारो जिले में पुलिस विभाग के कथित वित्तीय घोटाले के बाद अब शिक्षा विभाग में भी सरकारी राशि की कथित हेराफेरी का मामला सामने आया है. पेटरवार प्रखंड के उत्क्रमित मध्य विद्यालय, सदमाकला में पदस्थापित रहे एक दिवंगत शिक्षक के नाम पर लाखों रुपये की निकासी किए जाने का आरोप है.

प्राप्त जानकारी के अनुसार, शिक्षक की मृत्यु अगस्त 2021 में हो चुकी थी. इसके बावजूद वित्तीय वर्ष 2024-25 और 2025-26 के दौरान उनके नाम पर कथित तौर पर फर्जी दस्तावेज तैयार किए गए और अंतर वेतन की राशि के नाम पर तीन अलग-अलग बिलों के जरिए कुल 14 लाख 65 हजार रुपये से अधिक की सरकारी राशि निकाल ली गई.
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आरोप है कि यह राशि शिक्षक के परिवार या उनके किसी वैध बैंक खाते में जाने के बजाय शिक्षा विभाग के एक कर्मी के निजी बैंक खाते में स्थानांतरित की गई. मामला सामने आने के बाद विभागीय स्तर पर हड़कंप मचा है और अब यह सवाल उठ रहा है कि मृत शिक्षक के नाम पर तैयार किए गए बिलों को संबंधित स्तर पर जांचे बिना कैसे स्वीकृति मिलती रही.
2021 में हुई शिक्षक की मृत्यु, तीन साल बाद शुरू हुई निकासी
मामला पेटरवार प्रखंड के उत्क्रमित मध्य विद्यालय, सदमाकला में पदस्थापित रहे शिक्षक संतोष कुमार शर्मा से जुड़ा है. उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, संतोष कुमार शर्मा का निधन 14 अगस्त 2021 को हो गया था. लेकिन उनकी मृत्यु के करीब तीन साल बाद उनके नाम पर कथित तौर पर अंतर वेतन और वेतन वृद्धि से संबंधित दावे तैयार किए गए. वित्तीय वर्ष 2024-25 और 2025-26 में तीन अलग-अलग बिलों के माध्यम से सरकारी राशि की निकासी की गई. बताया गया है कि तीनों बिलों से निकाली गई राशि का कुल मूल्य करीब 14.65 लाख रुपये है.
तीन बिलों के जरिए निकाली गई रकम
मामले में सामने आए बिलों के अनुसार राशि तीन किश्तों में निकाली गई.
- बिल संख्या 63/2024-25: करीब 5.16 लाख रुपये
- बिल संख्या 77/2024-25: करीब 4.31 लाख रुपये
- बिल संख्या 22/2025-26: करीब 5.17 लाख रुपये
इन तीनों भुगतानों को जोड़ने पर राशि करीब 14.65 लाख रुपये बैठती है.
बिलिंग असिस्टेंट पर निजी खाते में राशि लेने का आरोप
मामले में शिक्षा विभाग के बिलिंग असिस्टेंट मुकेश कुमार पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं. आरोप है कि उन्होंने दिवंगत शिक्षक के अंतर वेतन और वेतन वृद्धि के नाम पर बिल तैयार कराने और उसे पारित कराने में भूमिका निभाई. सबसे गंभीर आरोप यह है कि इन बिलों से संबंधित राशि शिक्षक के परिजनों या उनके वैध बैंक खाते में भेजे जाने के बजाय सीधे एक निजी बैंक खाते में स्थानांतरित करा दी गई. हालांकि, इन आरोपों की पूरी तस्वीर विभागीय जांच और संबंधित अधिकारियों के आधिकारिक पक्ष के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी.
मृत शिक्षक के नाम पर बिल कैसे तैयार हुए ?
इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस शिक्षक की मृत्यु वर्ष 2021 में हो चुकी थी, उनके नाम पर वर्ष 2024-25 और 2025-26 में भुगतान से जुड़े दस्तावेज कैसे तैयार हुए ? सवाल यह भी है कि एक ही शिक्षक के नाम पर अंतर वेतन से संबंधित दावे के लिए अलग-अलग समय पर तीन बिल तैयार किए गए तो संबंधित कार्यालयों में उनकी जांच क्यों नहीं हुई.
सरकारी भुगतान की प्रक्रिया में कर्मचारी के सेवा रिकॉर्ड, भुगतान से संबंधित दस्तावेज और बैंक खाते जैसी जानकारियों का मिलान किया जाता है. ऐसे में यह जांच का विषय है कि इन प्रक्रियाओं का पालन किया गया या नहीं.
कागजातों के सत्यापन पर भी उठे सवाल
मामले ने शिक्षा विभाग की आंतरिक वित्तीय निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं. यदि बिलों के साथ संबंधित प्रमाण पत्र और अन्य दस्तावेज लगाए गए थे, तो उन्हें स्वीकृत करने से पहले उनकी सत्यता की जांच किस स्तर पर की गई ? क्या संबंधित शिक्षक के सेवा रिकॉर्ड की जांच हुई थी? क्या उनके निधन की जानकारी विभागीय अभिलेखों में दर्ज थी ? इन सवालों के जवाब जांच के बाद ही सामने आएंगे. मामले की जांच के दौरान कथित तौर पर ऐसा प्रमाण पत्र भी सामने आया है, जिसमें इन भुगतानों को नियमसंगत बताया गया था. अब इस प्रमाण पत्र की सत्यता और इसे जारी करने वाले स्तर की भी जांच की जरूरत महसूस की जा रही है.
कोषागार की भूमिका भी जांच के घेरे में
मामले में सिर्फ शिक्षा विभाग के स्तर पर ही सवाल नहीं उठ रहे हैं. यह भी जांच का विषय है कि संबंधित बिल जब कोषागार भेजे गए तो वहां उनकी जांच किस स्तर पर हुई. एक मृत शिक्षक के नाम पर भुगतान से संबंधित बिलों को प्रस्तुत किए जाने के बावजूद यदि राशि जारी हुई, तो यह पूरी भुगतान प्रक्रिया की निगरानी पर सवाल खड़ा करता है. जांच में यह स्पष्ट करना महत्वपूर्ण होगा कि कथित फर्जी बिल तैयार करने, उन्हें प्रमाणित करने, स्वीकृत कराने और राशि को निजी खाते तक पहुंचाने की प्रक्रिया में कौन-कौन लोग शामिल थे.
क्या अकेले कर्मचारी ने किया पूरा फर्जीवाड़ा ?
मामले का एक अहम पहलू यह भी है कि इतनी बड़ी सरकारी राशि की निकासी सिर्फ एक कर्मचारी के स्तर पर संभव थी या इसमें दूसरे स्तर के अधिकारियों और कर्मचारियों की भी भूमिका थी. तीन अलग-अलग बिल तैयार होना, उनका विभागीय स्तर से आगे बढ़ना, प्रमाण पत्र जारी होना और अंततः सरकारी राशि का निजी खाते में पहुंचना,इन सभी कड़ियों की जांच जरूरी है. यदि जांच में किसी अधिकारी या अन्य कर्मचारी की भूमिका सामने आती है तो उनकी जिम्मेदारी भी तय की जा सकती है.
अब जांच के बाद खुलेगा पूरा मामला
फिलहाल इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि 14.65 लाख रुपये की सरकारी राशि किस प्रक्रिया के तहत निकाली गई और इसके पीछे कौन-कौन लोग शामिल थे. एक ओर मृत शिक्षक के नाम पर भुगतान होने का मामला है, तो दूसरी ओर सरकारी राशि के कथित तौर पर निजी बैंक खाते में जाने का आरोप है. इसलिए जांच एजेंसियों और शिक्षा विभाग के लिए यह जरूरी होगा कि पूरे दस्तावेज, बिल, सेवा अभिलेख, बैंक लेन-देन और प्रमाण पत्रों की जांच की जाए.
जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि यह मामला किसी एक कर्मचारी की कथित धोखाधड़ी तक सीमित है या इसके पीछे विभागीय स्तर पर बड़ी मिलीभगत थी.
