RANCHI: 15 अगस्त 2025. देश जब आजादी का जश्न मना रहा था, झारखंड के एक हिस्से में मातम पसरा था. पूर्वी सिंहभूम के घोड़ाबांधा गांव की आंखें उस मनहूस खबर का इंतजार कर रही थीं, जिसे कोई सुनना नहीं चाहता था. दिल्ली से खबर आई कि झारखंड के तत्कालीन स्कूली शिक्षा मंत्री और झारखंड मुक्ति मोर्चा के वरिष्ठ नेता रामदास सोरेन नहीं रहे.घोड़ाबांधा में उनके चाहने वाले जुटने लगे थे. आंखों में आंसू थे और मन में एक ही सवाल – आखिर इतनी जल्दी कैसे कोई अपना छोड़कर चला गया? वह सिर्फ एक मंत्री नहीं थे. किसी के लिए रामदास सोरेन नेता थे, किसी के लिए मार्गदर्शक और बहुतों के लिए वह ‘मांझी बाबा’ थे. एक ऐसा नाम, जिसके साथ पद और राजनीति से कहीं ज्यादा जुड़ी थी समाजसेवा, सहजता और अपने लोगों के लिए खड़े रहने की पहचान. आज उनकी पहली पुण्यतिथि पर झारखंड उन्हें सिर्फ एक पूर्व मंत्री के तौर पर नहीं, बल्कि उस जननेता के रूप में याद कर रहा है, जिसने सत्ता से पहले समाज को चुना और कुर्सी से ज्यादा अपने लोगों के भरोसे को महत्व दिया.
10 दिन तक चली जिंदगी की जंग, फिर टूट गई उम्मीद
2 अगस्त 2025 की सुबह रामदास सोरेन के सिर में गंभीर चोट लगी. इलाज के दौरान ब्लड क्लॉटिंग की समस्या सामने आई. अगले करीब 10 दिनों तक दवा के साथ दुआओं का दौर चलता रहा. हर दिन उम्मीद थी कि वह ठीक होकर वापस लौटेंगे. उनके समर्थक, साथी और परिवार लगातार उनके स्वस्थ होने की प्रार्थना कर रहे थे. लेकिन 15 अगस्त को वह खबर आई, जिसने हर उम्मीद को तोड़ दिया. जिस दिन देश तिरंगे के रंग में रंगा था, उसी दिन झारखंड ने अपना एक लोकप्रिय जननेता खो दिया. इसके कुछ ही दिन पहले, 4 अगस्त को झारखंड आंदोलन के महानायक और झामुमो के संस्थापक नेताओं में से एक शिबू सोरेन के निधन का दुख झेल चुका था झारखंड. अगस्त 2025 झारखंड मुक्ति मोर्चा और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के लिए एक के बाद एक गहरे सदमे लेकर आया.
जिस घर में ‘मांझी बाबा’ होना ही सबसे बड़ा सम्मान था
1 जनवरी 1962 को पूर्वी सिंहभूम के घोड़ाबांधा गांव में जन्मे रामदास सोरेन को नेतृत्व की सीख किसी राजनीतिक स्कूल से नहीं, बल्कि अपने गांव और परिवार से मिली थी. उनके दादा गांव के मांझी बाबा थे. परंपरा के मुताबिक उनके बाद उनके पिता और फिर रामदास सोरेन ने यह जिम्मेदारी संभाली. गांव के विवाद सुलझाने हों, सामाजिक और धार्मिक परंपराओं को निभाना हो, किसी जरूरतमंद की मदद करनी हो या त्योहारों में लोगों के बीच खड़े रहना हो – रामदास सोरेन हमेशा आगे नजर आते थे. यही वजह थी कि लोगों के बीच उनकी पहचान किसी विधायक या मंत्री के तौर पर बाद में बनी. पहले वह उनके मांझी बाबा थे. उनके लिए यह सिर्फ एक सामाजिक पद नहीं था. यह लोगों के बीच रहने, उनकी परेशानियां सुनने और जरूरत के वक्त उनके साथ खड़े होने की जिम्मेदारी थी.

समाजसेवा से सियासत तक का सफर
झारखंड आंदोलन का दौर था. अलग राज्य की मांग को लेकर आंदोलन तेज था और युवाओं के बीच झारखंड मुक्ति मोर्चा एक बड़ी राजनीतिक ताकत बन रहा था. वर्ष 1980 में रामदास सोरेन ने झामुमो की प्राथमिक सदस्यता ली. इसके बाद शुरू हुआ उनका लंबा राजनीतिक सफर. पार्टी संगठन में उन्होंने लगातार काम किया और चार बार जिलाध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाली. झारखंड आंदोलन में सक्रिय भागीदारी के दौरान उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा. लेकिन उनके लिए राजनीति कभी सिर्फ चुनाव जीतने का माध्यम नहीं बनी. जनसेवा का जो भाव गांव में मांझी बाबा के रूप में उनके भीतर था, वही भाव आगे उनकी राजनीति की पहचान बना.
हार से जीत तक, तीन दशक का संघर्ष
रामदास सोरेन के लिए चुनावी राजनीति का रास्ता आसान नहीं था.1995 में उन्होंने पहली बार जमशेदपुर पूर्वी विधानसभा सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा. सामने थे रघुवर दास. इस चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा. 2005 में अलग झारखंड राज्य बनने के बाद हुए पहले विधानसभा चुनाव में उन्होंने घाटशिला सीट से झामुमो का टिकट पाने की उम्मीद की, लेकिन टिकट नहीं मिला. उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ा और एक बार फिर हार गए.लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. 2009 में झामुमो ने उन पर भरोसा जताया और उन्हें पार्टी के टिकट पर पहली चुनावी जीत मिली. 2014 में भाजपा के लक्ष्मण टुडू से हार के बाद भी उनका राजनीतिक सफर नहीं रुका. 2019 और 2024 में उन्होंने लगातार दो बार घाटशिला विधानसभा सीट पर जीत दर्ज की. तीसरी बार विधानसभा पहुंचने के बाद उनके राजनीतिक सफर में वह मोड़ आया, जिसका इंतजार वर्षों से था.
30 अगस्त 2024 – पहली बार मंत्री बने
30 अगस्त 2024 को रामदास सोरेन पहली बार हेमंत सोरेन सरकार में मंत्री बने. चंपाई सोरेन के भाजपा में जाने के बाद बने राजनीतिक समीकरणों के बीच रामदास सोरेन को उच्च एवं तकनीकी शिक्षा और जल संसाधन विभाग की जिम्मेदारी मिली. हालांकि, यह कार्यकाल बहुत छोटा रहा. विधानसभा चुनाव की घोषणा के बाद 28 नवंबर 2024 तक ही वह इस जिम्मेदारी में रहे लेकिन चुनाव के बाद जब महागठबंधन को दोबारा सरकार बनाने का जनादेश मिला, तो रामदास सोरेन को एक और बड़ी जिम्मेदारी मिली. 5 दिसंबर 2024 को उन्हें स्कूली शिक्षा मंत्री बनाया गया. और यहीं से उन्होंने अपने विजन को जमीन पर उतारना शुरू किया.
सिर्फ 9 महीने का कार्यकाल, लेकिन छोड़ गए बड़ा विजन
स्कूली शिक्षा मंत्री के तौर पर रामदास सोरेन का कार्यकाल करीब नौ महीने का रहा. समय कम था, लेकिन उनके काम करने का नजरिया साफ था. उनके कार्यकाल में 26 हजार पदों पर सहायक आचार्य की भर्ती प्रक्रिया शुरू हुई. ‘स्कूल रूअर अभियान 2025’ के तहत 5 से 18 वर्ष तक के बच्चों का शत-प्रतिशत नामांकन सुनिश्चित कराने की मुहिम शुरू की गई. उन्होंने जिला शिक्षा पदाधिकारियों और जिला शिक्षा अधीक्षकों को हर महीने कम से कम एक स्कूल का निरीक्षण करने, बच्चों से संवाद करने और कक्षा में जाकर पढ़ाने का निर्देश दिया. यानी मंत्री की नजर सिर्फ फाइलों पर नहीं, स्कूल की जमीन पर भी थी. उन्होंने घाटशिला प्रखंड के हैदलजुड़ी में पंडित रघुनाथ मुर्मू विश्वविद्यालय और ट्राइबल म्यूजियम की नींव रखी. स्थानीय और जनजातीय भाषाओं के संरक्षण और विकास को लेकर भी वह गंभीर थे. उन्होंने स्थानीय एवं जनजातीय भाषाओं के 10 हजार शिक्षकों की बहाली का प्रस्ताव तैयार कराया था. शायद नियति को यही मंजूर नहीं था कि वह इन योजनाओं को उनके मुकाम तक पहुंचा पाते.
सपने अधूरे रह गए, लेकिन कहानी अधूरी नहीं हुई
रामदास सोरेन उन समस्याओं को बचपन से देखते आए थे, जिनके समाधान की जिम्मेदारी उन्हें मंत्री बनने के बाद मिली. उन्हें पहली बार संवैधानिक ताकत मिली थी कि वह उन मुद्दों पर फैसले ले सकें, जिनके लिए वर्षों तक आवाज उठाते रहे. लेकिन किस्मत ने उन्हें ज्यादा वक्त नहीं दिया. 2 अगस्त की दुर्घटना के बाद शुरू हुई जिंदगी की जंग 15 अगस्त को खत्म हो गई. उनके कई सपने अधूरे रह गए. कई योजनाएं जमीन पर पूरी तरह नहीं उतर सकीं. लेकिन एक चीज पीछे रह गई – उनकी राजनीतिक और सामाजिक विरासत.
पिता की विरासत संभालने मैदान में उतरे सोमेश
रामदास सोरेन के निधन के बाद घाटशिला विधानसभा सीट खाली हुई. नवंबर 2025 में हुए उपचुनाव में उनके बड़े बेटे सोमेश सोरेन ने झामुमो के टिकट पर चुनाव लड़ा.मुकाबला बेहद अहम था. सामने थे पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन के बेटे बाबूलाल सोरेन. नतीजा आया तो रामदास सोरेन के परिवार के पक्ष में एक बार फिर जनता का भरोसा दिखाई दिया. सोमेश सोरेन ने बड़े अंतर से जीत दर्ज की. इस जीत को सिर्फ एक चुनावी जीत के तौर पर देखना मुश्किल है. यह उस भावनात्मक जुड़ाव की भी तस्वीर थी, जो रामदास सोरेन ने वर्षों में अपने क्षेत्र के लोगों के साथ बनाया था. आज सोमेश सोरेन के सामने सबसे बड़ी चुनौती है – पिता की उस विरासत को आगे बढ़ाना, जिसमें राजनीति से ज्यादा जनता और पद से ज्यादा जिम्मेदारी मायने रखती थी.
कोल्हान का वह ‘कोहिनूर’, जिसे झारखंड नहीं भूलेगा
कोल्हान की राजनीति में रामदास सोरेन का कद सिर्फ एक विधायक या मंत्री का नहीं था. खासकर संताल आदिवासी समाज के बीच उन्होंने लंबे समय तक काम किया. संगठन को मजबूत किया. आंदोलन में भाग लिया. चुनाव हारे, फिर लड़े. जीत हासिल की. मंत्री बने. लेकिन इतने लंबे राजनीतिक सफर के बाद भी उनकी पहचान का सबसे मजबूत हिस्सा शायद उनका मंत्री पद नहीं था. वह पहचान थी – मांझी बाबा.
एक ऐसा जनप्रतिनिधि, जिसने सत्ता की सीढ़ियां चढ़ते हुए भी अपने गांव की मिट्टी को नहीं छोड़ा. 15 अगस्त 2025 को जब उनका निधन हुआ, देश आजादी का जश्न मना रहा था. लेकिन झारखंड के लिए वह दिन एक ऐसे जननेता को खोने का दिन बन गया, जिसने अपना जीवन समाज, संगठन और अपने लोगों के लिए समर्पित किया.आज उनकी पहली पुण्यतिथि पर घोड़ाबांधा से लेकर पूरे कोल्हान तक उन्हें याद किया जा रहा है. क्योंकि कुछ नेता चुनाव जीतकर इतिहास में जगह बनाते हैं. और कुछ लोग लोगों के दिल जीतकर इतिहास बन जाते हैं. रामदास सोरेन शायद इसी दूसरी कतार के नेता थे.मांझी बाबा से मंत्री तक का उनका सफर भले ही थम गया, लेकिन उनकी कहानी यहीं खत्म नहीं होती. वह उन लोगों की यादों में जिंदा है, जिनके लिए उन्होंने पूरी जिंदगी आवाज उठाई. रामदास सोरेन को पहली पुण्यतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि.
