JHARKHAND : दुर्गा पूजा आते ही कहीं भव्य पंडाल सजने लगते हैं, तो कहीं मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित करने की तैयारी होती है. लेकिन झारखंड के चांडिल में एक ऐसी परंपरा भी है, जहां दुर्गा पूजा शुरू होने से पहले आदिवासी समुदाय के लोग मां दुर्गा की खोज में गांव-गांव निकल पड़ते हैं. सिर पर मोर पंख, पारंपरिक वेशभूषा, संथाली गीत और ढोल-मांदल की थाप के साथ निभाई जाने वाली इस परंपरा को ‘मांगन’ कहा जाता है. स्थानीय लोगों के मुताबिक, यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है.

मां दुर्गा की खोज, गीत-संगीत और गांव-गांव का सफर
मांगन की शुरुआत नवरात्रि के दौरान होती है. स्थानीय परंपरा के अनुसार, नवरात्रि की चतुर्थी के आसपास समुदाय के लोग अलग-अलग समूहों में निकलते हैं. पारंपरिक कपड़े पहनकर, सिर पर मोर पंख सजाकर और ढोल-मांदल की थाप पर नाचते-गाते हुए वे घर-घर पहुंचते हैं.यह सफर सिर्फ एक धार्मिक रस्म निभाने तक सीमित नहीं है. हर घर से मिलने वाला सहयोग सामूहिक पूजा की तैयारियों में काम आता है. गीत-संगीत और नृत्य के बीच लोग अपनी परंपरा को आगे बढ़ाते हैं और गांवों के बीच आपसी जुड़ाव को मजबूत करते हैं.
सोचिए, आज जब त्योहारों की तैयारियों में बड़े बजट, भव्य सजावट और आकर्षक लाइटिंग की चर्चा होती है, तब एक परंपरा ऐसी भी है, जिसमें लोग घर-घर जाकर सहयोग जुटाते हैं और मिलकर पूजा की तैयारी करते हैं. यहां उत्सव की ताकत सिर्फ पैसों में नहीं, बल्कि लोगों की भागीदारी में दिखाई देती है.

घर-घर से जुटता है सहयोग, फिर होती है सामूहिक पूजा
मांगन के दौरान घरों से जुटाई गई राशि का इस्तेमाल सामूहिक पूजा की व्यवस्था में किया जाता है. स्थानीय जानकारी के मुताबिक, इसके बाद गांव के ‘गट गौ माता’ मैदान में अलग-अलग समुदायों के लोग एकत्रित होते हैं. यहां मां महिषासुर मर्दिनी की पूजा-अर्चना की जाती है और लोग मिल-जुलकर उत्सव मनाते हैं.
इस परंपरा की खास बात यह है कि पूजा की तैयारी में केवल आयोजकों की भूमिका नहीं होती. घर-घर से मिलने वाला सहयोग पूरे समुदाय को इस आयोजन से जोड़ता है. हर व्यक्ति की भागीदारी सामूहिक उत्सव का हिस्सा बनती है. यही वजह है कि मांगन को केवल धार्मिक आयोजन के रूप में नहीं, बल्कि सामुदायिक एकता और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी परंपरा के रूप में भी देखा जाता है.

परंपरा में छिपी है आदिवासी संस्कृति की पहचान
झारखंड की सांस्कृतिक पहचान में गीत, नृत्य, पारंपरिक वाद्ययंत्र और सामुदायिक उत्सवों की अहम भूमिका रही है. झारखंड पर्यटन विभाग भी राज्य की सांस्कृतिक विरासत में आदिवासी संगीत और नृत्य की महत्वपूर्ण जगह को रेखांकित करता है.
मांगन जैसी परंपराओं में यह सांस्कृतिक विरासत रोजमर्रा के सामुदायिक जीवन से जुड़ी दिखाई देती है. पारंपरिक वेशभूषा, संथाली गीत और मांदल की थाप के जरिए नई पीढ़ी को भी अपने समुदाय की परंपराओं से जुड़ने का अवसर मिलता है.
हालांकि, इस परंपरा की शुरुआत कब और किस ऐतिहासिक घटना से हुई, इसे लेकर विस्तृत ऐतिहासिक दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं. इसलिए इसकी प्राचीनता के बारे में स्थानीय लोगों की मौखिक परंपरा को उसी रूप में समझना जरूरी है.
बदलते समय में भी क्यों खास है ‘मांगन’?
आज त्योहारों का स्वरूप बदल रहा है. सोशल मीडिया, आधुनिक सजावट और बड़े आयोजनों के बीच पारंपरिक रीति-रिवाजों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना भी एक चुनौती है. ऐसे में मांगन जैसी परंपराएं यह दिखाती हैं कि संस्कृति केवल किताबों या संग्रहालयों में सुरक्षित नहीं रहती, बल्कि लोगों के रोजमर्रा के जीवन में निभाई जाती है.
इस परंपरा में गांव-गांव जाना, लोगों से सहयोग लेना, गीत गाना और सामूहिक पूजा करना एक-दूसरे से जुड़ी गतिविधियां हैं. इनके जरिए धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक रिश्ते भी मजबूत होते हैं.
मांगन की पूरी परंपरा को केवल एक ही अर्थ में बांधना भी सही नहीं होगा. इसके धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व को सबसे बेहतर ढंग से वही लोग समझा सकते हैं, जो इसे पीढ़ियों से निभाते आ रहे हैं.
यह सिर्फ पूजा नहीं, अपनी जड़ों से जुड़े रहने की कहानी है
मांगन की कहानी हमें याद दिलाती है कि झारखंड की पहचान केवल उसके जंगलों, खनिजों और प्राकृतिक संसाधनों तक सीमित नहीं है. यहां की असली विरासत उन लोगों की जीवनशैली, लोकगीतों, परंपराओं और सामूहिक स्मृतियों में भी बसती है. मां दुर्गा की खोज में गांव-गांव निकलने वाले इन समूहों के लिए मांगन आस्था के साथ अपनी सांस्कृतिक परंपरा को आगे बढ़ाने का माध्यम भी है.
सवाल यह है कि आधुनिकता की दौड़ में हम ऐसी परंपराओं को कितना जान रहे हैं और अगली पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए क्या कर रहे हैं? क्योंकि किसी संस्कृति को जीवित रखने के लिए सिर्फ उसकी तारीफ करना काफी नहीं. उसे समझना, उसके बारे में दस्तावेज तैयार करना और उसे निभाने वाले लोगों की आवाज को जगह देना भी जरूरी है.
