PATNA /RANCHI : आजकल कोर्ट-कचहरी के कुछ फैसलों को देखकर पब्लिक का माथा पूरी तरह चकरा गया है. एक तरफ आए दिन सड़कों से लेकर गलियों तक महिलाओं के साथ छेड़छाड़ और जबरदस्ती की खबरें थमने का नाम नहीं ले रहीं, वहीं दूसरी तरफ जब ऐसे मामलों में इंसाफ की उम्मीद अदालत से की जाती है, तो वहां से ऐसी कानूनी दलीलें सामने आ जाती हैं कि लोग सिर पकड़ लें.
हाई कोर्ट का ‘अजीबोगरीब’ गणित
मामला इस बार बिहार के पटना हाई कोर्ट का है, जहां अदालत ने एक बेहद अजीबोगरीब व्याख्या दे डाली. आरोप सीधे-साधे और साफ थे की महिला की सलवार उतारने की कोशिश हुई और उसके साथ जबरदस्ती की गई. लेकिन हाई कोर्ट ने अपनी बारीक कानूनी चश्मे से देखकर कहा कि ‘चूंकि कोई पेनिट्रेशन साबित नहीं हुआ, इसलिए इसे रेप की कोशिश (IPC 376/511) नहीं माना जा सकता, ये बस महिला की गरिमा भंग करने (IPC 354) का मामला है.’ यानी जहां गंभीर सजा बनती थी, वहां मामला महज छेड़छाड़ में समेट दिया गया.
मनचलों की बढ़ती हिम्मत
अब जरा खुद सोचिए, आम जनता के बीच ये बात कैसे हजम होगी? गली-मोहल्ले से लेकर इंटरनेट के गलियारों तक लोग यही पूछ रहे हैं कि क्या किसी की इज्जत तार-तार करने की नीयत समझने के लिए वारदात का पूरी तरह अंजाम तक पहुंचना ही जरूरी है? जब-जब ऐसे टेक्निकल लूपहोल्स के सहारे आरोपियों को राहत मिलती है, तो उसका सीधा असर सड़क पर खड़े उन मनचलों की हिम्मत पर पड़ता है, जिन्हें लगने लगता है कि ‘थोड़ा-बहुत हाथ-पैर मार भी लिया तो ज्यादा से ज्यादा छेड़छाड़ ही तो लगेगी!
सुप्रीम कोर्ट का सख्त ऐतराज
गनीमत ये रही कि बात सुप्रीम कोर्ट के कानों तक पहुंच गई. चीफ जस्टिस की बेंच ने इस पर खुद संज्ञान (Suo Motu) लेते हुए दो-टूक कहा कि हाई कोर्ट की ये टिप्पणियां पहली नजर में ही पूरी तरह आपत्तिजनक हैं. सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को नोटिस भेजा है ताकि उसका पक्ष सुनकर इस फैसले पर हथौड़ा चलाया जा सके.
पुरानी गलतियों की पुनरावृत्ति
वैसे, ये कोई पहला मामला नहीं है. अभी कुछ ही समय पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भी एक नाबालिग के साथ हुई ऐसी ही बदसलूकी को ‘रेप की कोशिश’ मानने से इनकार कर दिया था, जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट ने सख्ती से रद्द किया और जजों को संवेदनशीलता बरतने की नसीहत तक दी थी.
कब बदलेगी सोच?
अब बड़ा सवाल यही है कि सुप्रीम कोर्ट के बार-बार टोकने के बाद भी निचली अदालतों में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर यह ‘कागजी और तकनीकी’ नजरिया कब बदलेगा? जब तक हर ऐसी हरकत को सख्त से सख्त नजरिए से नहीं देखा जाएगा, तब तक ऐसे फैसलों की आड़ में मनचलों का मनोबल ऐसे ही बढ़ता रहेगा.
