VARANASI/RANCHI : प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन तृतीय सम्मेलन प्रस्तुति कमेटी यानी टीएसपीसी के सुप्रीमो बृजेश सिंह गंझू उर्फ गोपाल सिंह भोक्ता, दुलारचंद गंझू, रंजन, फुलचंद गंझू, मुखिया जी और सरदार जी के पुलिस मुठभेड़ में मारे जाने के बाद संगठन के अस्तित्व को लेकर भी सवाल खड़े हो गए हैं. करीब दो दशक तक चतरा और आसपास के इलाकों में सक्रिय रहे इस संगठन की कमान अब नेतृत्वविहीन हो गई है.

2004 में खड़ा किया समानांतर संगठन
लावालौंग थाना क्षेत्र के लुटू सोहावन गांव निवासी स्वर्गीय पच्चु गंझू के पुत्र बृजेश गंझू ने वर्ष 2004 में प्रतिबंधित भाकपा माओवादी के खिलाफ एक समानांतर संगठन खड़ा किया था. देखते ही देखते टीएसपीसी ने चतरा के अलावा रांची, हजारीबाग, रामगढ़, पलामू, लातेहार और बिहार के कुछ जिलों में अपनी गतिविधियां बढ़ा लीं. बृजेश गंझू लंबे समय से सुरक्षा एजेंसियों के निशाने पर था. उस पर झारखंड सरकार की ओर से 25 लाख रुपये और एनआईए की ओर से 5 लाख रुपये का इनाम घोषित किया गया था. वह एनआईए की मोस्ट वांटेड सूची में भी शामिल था.
माओवादियों के साथ दो दशक तक वर्चस्व की लड़ाई
टीएसपीसी और भाकपा माओवादी के बीच करीब दो दशक तक वर्चस्व को लेकर संघर्ष चलता रहा. दोनों संगठनों के बीच कई बार मुठभेड़ और हिंसक घटनाएं हुईं. इस संघर्ष में दोनों पक्षों के उग्रवादियों के साथ ग्रामीणों और अन्य लोगों की भी जान गई. इसका असर चतरा के लावालौंग, कुंदा, प्रतापपुर समेत आसपास के ग्रामीण इलाकों में भी देखने को मिला. लंबे समय तक चले इस संघर्ष ने इन क्षेत्रों में भय का माहौल बनाए रखा. एक ओर माओवादी संगठन का प्रभाव था, तो दूसरी ओर टीएसपीसी खुद को उसके समानांतर एक ताकत के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा था.
उग्रवाद के बीच मुखिया भी बना बृजेश
बृजेश गंझू का सफर सिर्फ उग्रवादी संगठन की कमान संभालने तक सीमित नहीं रहा. वर्ष 2010 में वह लावालौंग पंचायत से निर्विरोध मुखिया भी निर्वाचित हुआ था. हालांकि, मुखिया बनने के बाद भी उसका नाम उग्रवादी गतिविधियों से जुड़ा रहा. पुलिस के अनुसार, टीएसपीसी में बृजेश की महत्वपूर्ण भूमिका थी और वह संगठन की गतिविधियों को संचालित करने वाले प्रमुख चेहरों में शामिल था. उसके नेतृत्व में संगठन ने चतरा और आसपास के इलाकों में अपना प्रभाव बढ़ाया. पुलिस के अनुसार, संगठन का उद्देश्य भाकपा माओवादी के प्रभाव को चुनौती देने के साथ रंगदारी वसूलना भी था.
लगातार कार्रवाई से कमजोर हुआ संगठन
पिछले कुछ वर्षों में सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई और उग्रवाद विरोधी अभियानों के कारण टीएसपीसी समेत दूसरे उग्रवादी संगठनों की गतिविधियों पर असर पड़ा. संगठन के कई प्रमुख सदस्य मारे गए या गिरफ्तार किए गए. इससे टीएसपीसी की सक्रियता लगातार कमजोर होती गई.
अब बृजेश गंझू के पुलिस मुठभेड़ में मारे जाने के बाद संगठन के शीर्ष नेतृत्व पर भी बड़ा असर पड़ा है. करीब दो दशक तक भाकपा माओवादी के समानांतर खड़े रहे टीएसपीसी के लिए यह घटनाक्रम एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है.
बृजेश गंझू के साथ संगठन का शीर्ष नेतृत्व कमजोर पड़ चुका है. ऐसे में टीएसपीसी की आगे की दिशा और उसके बचे हुए नेटवर्क को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं. करीब दो दशक तक चतरा और आसपास के इलाकों में सक्रिय रहे इस संगठन के प्रभाव के अब सिमटने की स्थिति बन गई है.
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