
RANCHI : झारखंड और संथाल परगना के आदिवासी इतिहास में ऐसे कई जननायक हुए, जिन्होंने अंग्रेजी शासन, जमींदारी व्यवस्था और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाई. इन्हीं में एक महत्वपूर्ण नाम बाबाजी भगीरथ मांझी का भी लिया जाता है. उन्होंने सामाजिक सुधार को आदिवासी स्वाभिमान और ब्रिटिश राजस्व व्यवस्था के विरोध से जोड़कर एक व्यापक आंदोलन खड़ा किया.
ताराडीहा में हुआ था जन्म
माना जाता है कि 1840 के दशक में वर्तमान झारखंड के गोड्डा जिले के पथरगामा प्रखंड के ताराडीहा गांव में एक आदिवासी परिवार में भगीरथ मांझी का जन्म हुआ था . बचपन से ही उनका जीवन सादगी, अनुशासन और धार्मिक आस्था से जुड़ा रहा। उनके सादा जीवन और ऊंचे विचारों के कारण लोग उन्हें सम्मानपूर्वक ‘बाबाजी’ कहने लगे.
बाद के वर्षों में बाबाजी भगीरथ मांझी ने संथाल समाज में सामाजिक और धार्मिक सुधार का संदेश फैलाया. लगभग 1871 के आसपास उन्होंने ‘सफा होड़’ नामक धार्मिक-सामाजिक संप्रदाय को संगठित किया.
सामाजिक सुधार से शुरू हुआ आंदोलन
सफा होड़ आंदोलन का जोर केवल धार्मिक आस्था पर नहीं था। बाबाजी ने समाज में नैतिक अनुशासन और सुधार पर भी विशेष बल दिया.
उनके संदेश में प्रमुख रूप से…
- मांस और मदिरा का त्याग,
- पवित्र और संयमित जीवन,
- सामाजिक एकता,
- एक ईश्वर के रूप में सिंहबोंगा की उपासना
जैसी बातें शामिल थीं. उनका विचार था कि यदि समाज भीतर से मजबूत और संगठित होगा, तभी वह बाहरी शोषण और दमन का मुकाबला कर सकेगा.

-AI GENERATED IMAGE
अंग्रेजी राज और लगान व्यवस्था के खिलाफ आवाज
उस दौर में संथाल और अन्य आदिवासी समुदाय ब्रिटिश शासन, जमींदारों और महाजनों की शोषणकारी व्यवस्था से परेशान थे. भारी लगान, कर्ज और जमीन पर बढ़ते दबाव ने आदिवासी समाज के सामने गंभीर संकट पैदा कर दिया था.
इसी पृष्ठभूमि में भगीरथ मांझी ने राजस्व व्यवस्था का विरोध तेज किया. ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, 1868 के आसपास बिहार के बांका जिले के बौंसी में आयोजित मेले के दौरान बाबाजी ने बड़ी संख्या में लोगों को संबोधित किया. उन्होंने आदिवासियों से अपने जल, जंगल और जमीन पर अधिकार को लेकर एकजुट होने का आह्वान किया.
उनका संदेश था कि जिस जमीन पर आदिवासी पीढ़ियों से रहते आए हैं, उसके लिए बाहरी शासकों और जमींदारों को लगान क्यों दिया जाए? यहीं से उनका आंदोलन केवल सामाजिक सुधार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आदिवासी अधिकार और स्वशासन की मांग से जुड़ गया.
इसे भा पढें : शादी के बाद बेटी के अधिकार खत्म नहीं होते: झारखंड हाईकोर्ट का अहम फैसला
‘संथाल राज’ की मांग
बाबाजी भगीरथ मांझी ने आदिवासी समाज को संगठित करते हुए लगान नहीं देने का आह्वान किया. उन्होंने स्वयं को धार्मिक और राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका में प्रस्तुत किया तथा ‘संथाल राज’ की मांग को सामने रखा.
इस आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि इसमें आदिवासी अस्मिता, धार्मिक सुधार और आर्थिक शोषण के विरोध को एक साथ जोड़ा गया. आंदोलनकारियों का उद्देश्य केवल लगान से राहत पाना नहीं था, बल्कि अपने समाज और पारंपरिक अधिकारों पर बाहरी नियंत्रण का विरोध करना भी था.
कटोरिया बना आंदोलन का महत्वपूर्ण केंद्र
बांका जिले का कटोरिया क्षेत्र उस समय घने जंगलों और पहाड़ी भूभाग से घिरा हुआ था. कठिन भौगोलिक परिस्थितियों ने आंदोलनकारियों को संगठित होने और ब्रिटिश प्रशासन का विरोध करने में मदद की.
ऐतिहासिक विवरणों में कटोरिया क्षेत्र को आंदोलन के महत्वपूर्ण केंद्रों में गिना जाता है. यहां बैठकों, संगठन और ब्रिटिश प्रशासन के खिलाफ प्रतिरोध की गतिविधियों का उल्लेख मिलता है.
हालांकि आंदोलन का मूल स्वरूप सामाजिक और अहिंसक प्रतिरोध का था, लेकिन ब्रिटिश दमन और प्रशासनिक कार्रवाई के बीच कई स्थानों पर संघर्ष की स्थिति भी पैदा हुई.
ब्रिटिश दमन और बाबाजी की गिरफ्तारी
जैसे-जैसे आंदोलन का प्रभाव बढ़ा, ब्रिटिश प्रशासन की चिंता भी बढ़ने लगी. 1870 के दशक के मध्य में भगीरथ मांझी को गिरफ्तार कर जेल भेजे जाने का उल्लेख मिलता है.
जेल में ही उनकी मृत्यु होने की बात कही जाती है. उनकी मृत्यु का सटीक वर्ष लेकर ऐतिहासिक स्रोतों में मतभेद मिलता है और कई विवरण इसे 1879 या 1880 के आसपास बताते हैं. लेकिन बाबाजी की गिरफ्तारी और मृत्यु के बावजूद आंदोलन की भावना समाप्त नहीं हुई.
आंदोलन की विरासत
1874 के आसपास यह आंदोलन व्यापक खरवार आंदोलन से जुड़ता दिखाई देता है. बाद के वर्षों में आदिवासी समाज के विभिन्न सुधार आंदोलनों और धार्मिक-सामाजिक धाराओं पर भी इसका प्रभाव देखा गया.
सफा होड़ परंपरा की चर्चा आज भी संथाल परगना के सामाजिक-धार्मिक इतिहास में मिलती है. बाबाजी भगीरथ मांझी को उनके अनुयायी सामाजिक सुधार, धार्मिक अनुशासन और आदिवासी स्वाभिमान के प्रतीक के रूप में याद करते हैं.
आज भी प्रासंगिक है ‘जल, जंगल, जमीन’ का सवाल
बाबाजी भगीरथ मांझी के आंदोलन को केवल अंग्रेजों के खिलाफ एक स्थानीय विद्रोह के रूप में देखना इसकी व्यापकता को सीमित कर देता है. उनके आंदोलन में सामाजिक सुधार, धार्मिक चेतना, आर्थिक शोषण का विरोध और आदिवासी स्वशासन,इन सभी तत्वों का मेल दिखाई देता है.
उनकी सबसे बड़ी सीख यह थी कि किसी समाज की राजनीतिक ताकत उसकी सामाजिक एकता और आत्मसम्मान से भी पैदा होती है. आज जब आदिवासी अधिकारों, जमीन, जंगल और प्राकृतिक संसाधनों को लेकर बहस जारी है, तब भगीरथ मांझी की कहानी इतिहास से निकलकर वर्तमान से भी जुड़ती है.
ताराडीहा से बौंसी तक उठी बाबाजी की आवाज हमें याद दिलाती है कि अपने अधिकारों की लड़ाई केवल सत्ता के खिलाफ नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति, समाज और पहचान को बचाने की लड़ाई भी होती है.
बाबाजी भगीरथ मांझी का जीवन आदिवासी समाज में सामाजिक सुधार और अधिकार चेतना के इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है. उन्होंने लोगों को संगठित किया, सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाई और शोषणकारी लगान व्यवस्था को चुनौती दी.
उनकी कहानी आज भी यह सवाल छोड़ती है,क्या किसी समाज की असली आजादी केवल राजनीतिक सत्ता हासिल करने में है, या अपनी जमीन, संस्कृति, परंपरा और आत्मसम्मान पर अधिकार बनाए रखने में भी?
