
RANCHI/DHANBAD : क्या किसी बेटी की शादी हो जाने के बाद उसके सभी अधिकार खत्म हो जाते हैं? झारखंड हाईकोर्ट ने इस सवाल पर एक अहम टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि सिर्फ शादीशुदा होने के आधार पर किसी महिला को अनुकंपा नियुक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता.
मामला धनबाद की किरण ए. पासवान से जुड़ा है। उनके पिता CMPFO में कार्यरत थे और वर्ष 2013 में ड्यूटी के दौरान उनका निधन हो गया था.
पिता की मृत्यु के बाद किरण ने नियमों के तहत अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया. हालांकि, विभाग ने उनका दावा यह कहते हुए खारिज कर दिया कि वह शादीशुदा हैं और उनके पति की आमदनी है.
विभाग के इस फैसले के खिलाफ किरण ने झारखंड हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया.
सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह तथ्य आया कि शादी के बाद भी किरण अपने पिता पर आर्थिक रूप से निर्भर थीं. उनके भाई अलग रह रहे थे और मां की जिम्मेदारी उठाने के लिए तैयार नहीं थे.
अदालत ने माना कि महिला का शादीशुदा होना अपने आप में उसकी आर्थिक आत्मनिर्भरता का प्रमाण नहीं माना जा सकता. किसी व्यक्ति की वास्तविक आर्थिक स्थिति और परिवार पर उसकी निर्भरता को भी देखा जाना जरूरी है.
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने विभाग के फैसले को रद्द कर दिया और किरण को संबंधित नियमों के तहत आठ सप्ताह के भीतर अनुकंपा नियुक्ति देने का आदेश दिया.
क्या है इस फैसले का बड़ा संदेश?
इस फैसले का सीधा संदेश है कि बेटी की शादी हो जाना उसके अधिकारों को अपने आप खत्म नहीं करता. खासकर अनुकंपा नियुक्ति जैसे मामलों में केवल वैवाहिक स्थिति के आधार पर किसी महिला के दावे को खारिज नहीं किया जा सकता.
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में वास्तविक आर्थिक निर्भरता और पारिवारिक परिस्थितियों को ध्यान में रखना जरूरी है.
यानी, शादीशुदा बेटी भी परिस्थितियों के आधार पर अपने अधिकारों की हकदार हो सकती है. शादी किसी महिला की आर्थिक निर्भरता या पारिवारिक जिम्मेदारियों की वास्तविकता को खत्म नहीं कर देती.
