रांची : झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक शिबू सोरेन की पहली पुण्यतिथि पर उनके जीवन की कहानी एक बार फिर चर्चा में है. एक छोटे से गांव से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति तक पहुंचे शिबू सोरेन का जीवन सिर्फ सत्ता और राजनीति की कहानी नहीं है. यह संघर्ष, जंगल, पहाड़, महाजनी प्रथा के खिलाफ आंदोलन, आदिवासी समाज को संगठित करने और अलग झारखंड राज्य के लिए लंबे संघर्ष की कहानी भी है.

11 जनवरी 1944 को तत्कालीन बिहार के रामगढ़ इलाके के नेमरा गांव में जन्मे शिबू सोरेन ने बचपन में ही ऐसे अनुभव देखे, जिन्होंने उनके जीवन की दिशा बदल दी. बाद के वर्षों में यही बच्चा आदिवासी समाज के बीच ‘गुरुजी’ और ‘दिशोम गुरु’ के नाम से जाना गया.
नौ साल की उम्र में चिड़िया की मौत ने बदल दिया नजरिया
शिबू सोरेन के जीवन से जुड़ी एक घटना उनके अहिंसक जीवन-दर्शन से जोड़कर बताई जाती है. जब उनकी उम्र करीब नौ साल थी, तब उनके घर में एक चिड़िया पाली जाती थी. दशहरे के दिन उनके पिता सोबरन सोरेन घर में मोर के पंख निकाल रहे थे. उसी दौरान चिड़िया बार-बार उनके पैरों में चोंच मार रही थी. पिता ने उसे हटाने की कोशिश की. इसी दौरान बंदूक की नोक से चिड़िया को हटाने की कोशिश में उसकी मौत हो गई.
बताया जाता है कि इस घटना से बालक शिबू बेहद विचलित हो गए. वह चिड़िया को जिंदा करने की जिद करने लगे. गुस्से में उन्होंने घर में रखा फरसा तक उठा लिया था. परिवार ने किसी तरह उन्हें शांत किया. लेकिन चिड़िया की मौत उनके मन में गहरी छाप छोड़ गई. उन्होंने खुद उसका अंतिम संस्कार किया और धीरे-धीरे जीव हत्या को पाप मानते हुए मांस-मछली से दूरी बना ली. यही घटना उनके जीवन में अहिंसा की एक महत्वपूर्ण शुरुआत के तौर पर याद की जाती है.
पिता की हत्या ने पढ़ाई से दूर कर दिया
शिबू सोरेन के जीवन में अगला बड़ा झटका तब आया, जब उनके पिता सोबरन सोरेन की हत्या कर दी गई. 27 नवंबर 1957 को सोबरन सोरेन अपने बेटों शिबू और राजाराम सोरेन के लिए खाना लेकर घर से निकले थे. दोनों रामगढ़ के एक हॉस्टल में रहकर पढ़ाई कर रहे थे. लेकिन रास्ते में लुकरैयाटांड़ जंगल के पास उनकी हत्या कर दी गई.
पिता की हत्या ने किशोर शिबू सोरेन को भीतर तक हिला दिया. पढ़ाई से उनका मन हटने लगा. घर की आर्थिक परिस्थितियां भी कठिन थीं. उन्होंने कुछ समय छोटे-मोटे काम किए. बाद में पतरातू-बड़काकाना रेल लाइन के निर्माण में कुली का काम भी किया. यह वह दौर था जब उनके सामने जीवन का सवाल था,लेकिन इसी संघर्ष ने उन्हें आगे चलकर समाज और राजनीति की तरफ मोड़ दिया.
पहली बार चुनाव लड़े तो मिली हार
रेल लाइन निर्माण का काम छोड़ने के बाद शिबू सोरेन ने सामाजिक काम और राजनीति में कदम रखने का फैसला किया. उन्होंने बड़लंगा पंचायत के मुखिया का चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए. इसके बाद जरीडीह विधानसभा सीट से भी चुनाव लड़ा. यहां भी उन्हें सफलता नहीं मिली. लेकिन लगातार मिली हार ने उनका रास्ता नहीं रोका.
1980 में वह दुमका लोकसभा सीट से पहली बार सांसद चुने गए.तीर-धनुष चुनाव चिह्न के साथ संसद पहुंचने वाले शिबू सोरेन धीरे-धीरे राष्ट्रीय राजनीति में अपनी पहचान बनाने लगे.
पोखरिया में आश्रम और महाजनी प्रथा के खिलाफ अभियान
शिबू सोरेन ने धनबाद के टुंडी इलाके के पोखरिया गांव को अपनी सामाजिक गतिविधियों का केंद्र बनाया. यहां उन्होंने आश्रम स्थापित किया और आदिवासी समाज में फैली समस्याओं के खिलाफ अभियान शुरू किया. उनका सबसे बड़ा संघर्ष महाजनी प्रथा के खिलाफ था.
उस दौर में ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में आर्थिक तंगी का फायदा उठाकर कई महाजन लोगों को कर्ज के जाल में फंसा लेते थे. आरोप था कि शराब पिलाकर या कर्ज के नाम पर आदिवासियों की जमीन पर अंगूठा लगवा लिया जाता था. कई मामलों में जमीन के साथ मवेशी और दूसरी संपत्ति भी हाथ से निकल जाती थी. शिबू सोरेन ने इसी व्यवस्था के खिलाफ गांव-गांव जाकर लोगों को संगठित करना शुरू किया.
संताल परगना बना आंदोलन की कर्मभूमि
शिबू सोरेन ने आदिवासी बहुल संताल परगना को अपनी राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों का केंद्र बनाया. जंगल और पहाड़ों के बीच बसे गांवों में वह पैदल पहुंचते थे. लोगों के बीच बैठते, उनकी समस्याएं सुनते और उन्हें अपने अधिकारों के लिए खड़े होने के लिए प्रेरित करते. उनके साथ जुड़ने वाले लोगों की संख्या बढ़ती गई. कहा जाता है कि कई बार लोग उन्हें देखने या उनसे मिलने के लिए 20-30 किलोमीटर तक पैदल चलकर सभाओं में पहुंचते थे.
उनके पास आर्थिक संसाधन सीमित थे। लोग अपनी क्षमता के मुताबिक एक-दो या पांच रुपये तक सहयोग देते थे. यह पैसा किसी राजनीतिक चंदे से ज्यादा उस भरोसे का प्रतीक था, जो धीरे-धीरे शिबू सोरेन और आदिवासी समाज के बीच बन रहा था.
जंगलों और पहाड़ों में गुजरती थीं रातें
शिबू सोरेन के आंदोलन का एक दौर ऐसा भी था, जब उन्हें लंबे समय तक भूमिगत रहना पड़ा. गिरिडीह, पारसनाथ और धनबाद के जंगल-पहाड़ उनके लिए सिर्फ भौगोलिक इलाके नहीं थे, बल्कि आंदोलन के दौरान ठिकाने भी बन गए. कहा जाता है कि वह रात में एक ही जगह नहीं रुकते थे और सुरक्षा के लिहाज से कई बार रात में ही ठिकाना बदलते थे.
महाजनों और शराब कारोबारियों के खिलाफ उनके अभियान से कई लोगों के हित प्रभावित हो रहे थे। दूसरी तरफ आंदोलन के कारण पुलिस भी उनकी तलाश में थी. ऐसे समय में उनका जीवन किसी राजनीतिक नेता से ज्यादा एक भूमिगत आंदोलनकारी जैसा था.दिन में गांव-गांव जाना और रात जंगल या पहाड़ में गुजारना उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया था.
‘धनकटी आंदोलन’ ने दिलाई अलग पहचान
महाजनी प्रथा के खिलाफ शिबू सोरेन के नेतृत्व में चलाए गए आंदोलनों में ‘धनकटी आंदोलन’ का विशेष महत्व रहा. आदिवासी इलाकों में जमीन और फसल से जुड़े विवादों के बीच यह आंदोलन महाजनों और साहूकारों के खिलाफ प्रतिरोध का बड़ा माध्यम बना. इन आंदोलनों में महिलाओं की बड़ी भूमिका रही. महिलाएं हाथ में हंसिया लेकर और पुरुष तीर-कमान के साथ आंदोलन में शामिल होते थे.
गांवों और पंचायतों में बड़ी संख्या में लोगों के जुटने से शिबू सोरेन की पहचान सिर्फ संताल परगना तक सीमित नहीं रही.धीरे-धीरे उनका नाम पूरे बिहार और फिर देश के राजनीतिक नक्शे पर उभरने लगा.
4 फरवरी 1972 : जब बना झारखंड मुक्ति मोर्चा
अलग झारखंड राज्य की मांग उस समय नई नहीं थी। लेकिन 1972 में इस आंदोलन को एक नया राजनीतिक आधार मिला.4 फरवरी 1972 को शिबू सोरेन, बिनोद बिहारी महतो और मजदूर नेता कॉमरेड एके राय एक साथ आए. तीनों नेताओं ने झारखंड के अलग राज्य की मांग को लेकर एक राजनीतिक संगठन बनाने का फैसला किया.
यहीं से झारखंड मुक्ति मोर्चा यानी JMM के गठन की शुरुआत हुई. झामुमो ने अलग झारखंड राज्य की मांग को आंदोलन और राजनीति दोनों के स्तर पर आगे बढ़ाया.आदिवासी समाज के मुद्दों से लेकर जमीन, जंगल और स्थानीय अधिकारों तक,झामुमो धीरे-धीरे झारखंड की राजनीति का प्रमुख चेहरा बन गया.
आंदोलन से सत्ता तक का सफर
शिबू सोरेन का राजनीतिक सफर संघर्ष से सत्ता तक पहुंचा, लेकिन यह रास्ता सीधा नहीं था. वह लोकसभा और राज्यसभा के सदस्य रहे. विधानसभा की राजनीति में भी सक्रिय रहे और झारखंड के मुख्यमंत्री के तौर पर तीन बार जिम्मेदारी संभाली. लेकिन तीनों बार वह अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके. इसके बावजूद झारखंड की राजनीति में उनका प्रभाव लगातार बना रहा. अलग राज्य बनने के बाद भी आदिवासी अधिकार, जल-जंगल-जमीन और स्थानीय पहचान से जुड़े मुद्दों पर उनकी राजनीति की छाप दिखाई देती रही.
गुरुजी से ‘दिशोम गुरु’ तक
शिबू सोरेन के समर्थकों ने उन्हें ‘गुरुजी’ कहना शुरू किया. समय के साथ यही संबोधन उनके राजनीतिक व्यक्तित्व की पहचान बन गया. झारखंड के आदिवासी समाज के एक बड़े हिस्से के लिए वह सिर्फ राजनेता नहीं थे. वह उस आंदोलन के प्रतीक बन गए थे, जिसने दशकों तक अलग झारखंड राज्य की मांग को जिंदा रखा. इसी वजह से उन्हें ‘दिशोम गुरु’ के नाम से भी जाना गया. उनकी राजनीति में चुनावी जीत और हार से ज्यादा महत्वपूर्ण वह सामाजिक आधार था, जो उन्होंने वर्षों के संघर्ष से बनाया था.
नेमरा से दिल्ली तक का सफर
शिबू सोरेन की कहानी को अगर कुछ शब्दों में समेटना हो तो इसकी शुरुआत नेमरा के एक छोटे से गांव से होती है. एक ऐसा बच्चा जिसने नौ साल की उम्र में एक चिड़िया की मौत देखी. फिर किशोरावस्था में पिता की हत्या देखी. जिसने पढ़ाई छोड़ी, मजदूरी की, गांव-गांव घूमकर लोगों को संगठित किया. महाजनी प्रथा के खिलाफ आंदोलन किया. जंगल और पहाड़ों में रातें बिताईं. चुनाव हारे फिर संसद पहुंचे. झारखंड के अलग राज्य की मांग को राजनीतिक ताकत दी और आखिरकार तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने.
यह सफर सिर्फ एक व्यक्ति की राजनीतिक यात्रा नहीं है. यह उस दौर की भी कहानी है, जब झारखंड की पहचान, जमीन और अधिकार के सवालों को लेकर एक पूरी पीढ़ी आंदोलन कर रही थी.
पहली पुण्यतिथि पर फिर याद किए जा रहे ‘दिशोम गुरु’
लंबी बीमारी के बाद शिबू सोरेन का निधन 4 अगस्त 2025 को दिल्ली में हुआ. अब उनकी पहली पुण्यतिथि पर झारखंड उन्हें अलग-अलग रूपों में याद कर रहा है. किसी के लिए वह अलग झारखंड राज्य आंदोलन के सबसे बड़े चेहरों में से एक हैं. किसी के लिए महाजनी प्रथा के खिलाफ संघर्ष करने वाले नेता. किसी के लिए आदिवासी अधिकारों की आवाज. और किसी के लिए वह ‘गुरुजी’ हैं.
लेकिन शिबू सोरेन की पूरी कहानी को समझने के लिए शायद सत्ता के उनके वर्षों से ज्यादा जरूरी है वह लंबा संघर्ष, जो उन्होंने सत्ता तक पहुंचने से बहुत पहले शुरू कर दिया था. नेमरा के उस छोटे से गांव से शुरू हुई कहानी जंगलों, पहाड़ों, आंदोलनों और संसद से होती हुई झारखंड की राजनीति के इतिहास का हिस्सा बन गई.
