RANCHI : नागपुरी संगीत ने करम, सरहुल, फगुआ और शादी-ब्याह से लेकर डिजिटल मंचों तक का लंबा सफर तय किया है. बदलते समय के साथ इसकी धुनें और प्रस्तुति भले ही बदली हों, लेकिन झारखंड की भाषा, संस्कृति और सामुदायिक जीवन से इसका जुड़ाव आज भी कायम है.
वर्ष 1927 से 2026 तक के सफर को नागपुरी संगीत की सौ वर्षों की यात्रा के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है. हालांकि, नागपुरी संगीत की शुरुआत किसी एक वर्ष में हुई थी, ऐसा मानने के लिए ऐतिहासिक प्रमाणों की आवश्यकता है. इसकी लोकपरंपरा इससे भी पुरानी मानी जाती है.

अखड़ा से शुरू हुई सुरों की परंपरा
नागपुरी संगीत का इतिहास केवल गीतों और धुनों तक सीमित नहीं है. यह झारखंड के ग्रामीण और सामुदायिक जीवन का भी हिस्सा रहा है. आधुनिक रिकॉर्डिंग तकनीक और स्टूडियो के व्यापक प्रचलन से पहले गीतों को मौखिक परंपरा के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाया जाता था. करम, सरहुल, जितिया, फगुआ और शादी-ब्याह जैसे अवसरों पर लोकगीतों की विशेष भूमिका रही है. गांवों के अखड़ा सामूहिक नृत्य, गायन और सांस्कृतिक मेलजोल के प्रमुख केंद्र हुआ करते थे.
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फगुआ के उल्लास से लेकर पावस के भाव, विरह की उदासी और झूमर की लय तक, नागपुरी गीतों में जीवन के अनेक रंग दिखाई देते हैं. मांदर, नगाड़े और बांसुरी जैसे पारंपरिक वाद्ययंत्र इन गीतों को विशिष्ट पहचान देते रहे हैं. इन गीतों के माध्यम से स्थानीय समाज ने अपनी परंपराओं, भावनाओं और सामूहिक अनुभवों को सहेजकर रखा.
कैसेट और वीसीडी के दौर में घर-घर पहुंचा नागपुरी संगीत
नागपुरी संगीत के प्रसार में कैसेट और वीडियो कैसेट का दौर महत्वपूर्ण रहा. विशेष रूप से 1980 और 1990 के दशक में रिकॉर्ड किए गए गीतों और वीडियो प्रस्तुतियों ने स्थानीय कलाकारों को व्यापक श्रोताओं तक पहुंचने का अवसर दिया. इस दौर में नागपुरी गीत गांवों और अखड़ा से निकलकर बाजारों, घरों और विवाह समारोहों तक पहुंचने लगे. स्थानीय कलाकारों और संगीतकारों ने सीमित संसाधनों के बावजूद ऐसे गीत तैयार किए, जिन्हें लोगों ने खूब पसंद किया.
वीसीडी के प्रसार ने संगीत के साथ-साथ नागपुरी गीतों की दृश्य प्रस्तुति को भी लोकप्रिय बनाने में भूमिका निभाई. गीतों के वीडियो में स्थानीय पहनावे, नृत्य, ग्रामीण परिवेश और क्षेत्रीय जीवन की झलक दिखाई देने लगी. इस बदलाव ने नागपुरी भाषा और संगीत के प्रति नई पीढ़ी का आकर्षण बढ़ाने में भी योगदान दिया. स्थानीय कलाकारों के लिए अपनी भाषा में पहचान बनाने का एक नया रास्ता खुला.
आधुनिक संगीत के साथ नागपुरी धुनों का मेल
डिजिटल तकनीक के विस्तार के साथ नागपुरी संगीत ने भी नया रूप अपनाया है. अब पारंपरिक मांदर और लोकधुनों के साथ आधुनिक संगीत संयोजन, इलेक्ट्रॉनिक बीट्स और डीजे की धुनों का इस्तेमाल किया जा रहा है. यूट्यूब, सोशल मीडिया और डिजिटल संगीत मंचों ने कलाकारों को अपने गीत सीधे श्रोताओं तक पहुंचाने का अवसर दिया है. इससे झारखंड के बाहर रहने वाले लोगों के लिए भी अपनी भाषा और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहना आसान हुआ है.
आज नागपुरी संगीत केवल पारंपरिक आयोजनों तक सीमित नहीं है. युवा कलाकार नए प्रयोग कर रहे हैं और पुराने लोकगीतों को नए अंदाज में प्रस्तुत कर रहे हैं. हालांकि, इस बदलाव के बीच पारंपरिक धुनों, गीतों के मूल स्वरूप और लोकसंगीत की विरासत को संरक्षित रखना भी जरूरी है.
क्षेत्रीय वेब रेडियो और डिजिटल मंचों की भूमिका
नागपुरी संगीत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में क्षेत्रीय डिजिटल मंचों की भूमिका भी बढ़ रही है. ‘आपन रेडियो’ इसका एक उदाहरण है। उपलब्ध कराए गए विवरण के अनुसार, यह क्षेत्रीय वेब रेडियो के माध्यम से नागपुरी और अन्य स्थानीय धुनों को श्रोताओं तक पहुंचाने का प्रयास कर रहा है. इसके 57 हजार से अधिक श्रोताओं से जुड़ने का दावा किया गया है. हालांकि, इस आंकड़े और क्षेत्र का पहला क्षेत्रीय वेब रेडियो होने के दावे की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है.
ऐसे मंच क्षेत्रीय भाषा के गीतों को लगातार उपलब्ध कराने, स्थानीय कलाकारों को पहचान दिलाने और झारखंड से बाहर रहने वाले श्रोताओं को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़े रखने में मदद कर सकते हैं.
संस्कृति के साथ रोजगार और पहचान का सवाल
नागपुरी संगीत का बदलता स्वरूप स्थानीय कलाकारों, गीतकारों, संगीतकारों, वीडियो निर्माताओं और डिजिटल सामग्री तैयार करने वालों के लिए नए अवसर भी पैदा कर सकता है. संगीत निर्माण, वीडियो रिकॉर्डिंग, संपादन और डिजिटल प्रचार जैसे क्षेत्रों में रोजगार की संभावनाएं बढ़ी हैं.
हालांकि, इन अवसरों का वास्तविक लाभ कलाकारों तक कितना पहुंच रहा है, यह उनके पारिश्रमिक, कॉपीराइट और डिजिटल मंचों से होने वाली आय जैसे पहलुओं पर निर्भर करता है.नागपुरी संगीत की लोकप्रियता के साथ यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि पारंपरिक कलाकारों और लोकधुनों के रचनाकारों को उचित सम्मान और आर्थिक लाभ कैसे मिले.
पूर्वजों की विरासत, नई पीढ़ी की जिम्मेदारी
नागपुरी संगीत की यात्रा यह दिखाती है कि किसी भाषा और संस्कृति की पहचान केवल उसके अतीत में नहीं, बल्कि वर्तमान में उसके इस्तेमाल और भविष्य में उसके संरक्षण में भी होती है.अखड़ा की सामूहिक थाप से लेकर डिजिटल मंचों की आधुनिक धुनों तक नागपुरी संगीत ने समय के साथ खुद को ढाला है. इसके बावजूद अपनी भाषा, लोकधुनों और सांस्कृतिक स्मृतियों से जुड़ाव इसकी सबसे महत्वपूर्ण विशेषता बना हुआ है.
इस विरासत को आगे बढ़ाने के लिए पुराने गीतों का दस्तावेजीकरण, वरिष्ठ कलाकारों के अनुभवों का संग्रह, नई पीढ़ी को नागपुरी भाषा से जोड़ना और स्थानीय संगीतकारों को प्रोत्साहित करना आवश्यक है. नागपुरी संगीत झारखंड की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है. इसकी असली ताकत केवल इसकी धुनों में नहीं, बल्कि उन लोगों में भी है, जो पीढ़ियों से इसे गाते, बजाते और अपने जीवन का हिस्सा बनाते आए हैं.
