हैदराबाद: तेलंगाना के रंगारेड्डी, संगारेड्डी और मेडचल जिलों की चॉकलेट, बिस्किट और केमिकल फैक्ट्रियों में हर सुबह सैकड़ों महिलाएं काम पर पहुंचती हैं. इनमें बड़ी संख्या झारखंड, बिहार और ओडिशा से पलायन कर आई महिलाओं की है. रंगारेड्डी (तेलंगाना) से ये कहानी लिखने वाली ज्योति कुमारी ने इन प्रवासी महिला मजदूरों की स्थिति को करीब से देखा और उनकी परेशानियों को सामने रखा है.

इन महिलाओं की जिंदगी फैक्ट्री में बनने वाली चॉकलेट जितनी मीठी नहीं, बल्कि संघर्षों से भरी है. सुबह से देर शाम तक करीब 12 घंटे काम करने के बावजूद उन्हें औसतन 10 हजार रुपये प्रतिमाह मजदूरी मिलती है. इसमें से लगभग 3 हजार रुपये किराए में खर्च हो जाते हैं, जबकि बाकी राशि से परिवार का खर्च चलाना भी मुश्किल हो जाता है.
बच्चों से दूर रहने का दर्द
रोजगार की तलाश में हजारों किलोमीटर दूर आई इन महिलाओं का सबसे बड़ा दर्द अपने बच्चों और परिवार से बिछड़ना है. कई महिलाओं ने अपने छोटे-छोटे बच्चों को झारखंड में परिजनों के भरोसे छोड़ रखा है. आर्थिक मजबूरी के कारण वे महीनों तक अपने बच्चों से नहीं मिल पातीं.
दलालों पर मजदूरी काटने का आरोप
प्रवासी महिला मजदूरों का आरोप है कि कई मामलों में उन्हें काम दिलाने वाले बिचौलिये या दलाल उनकी मजदूरी का हिस्सा काट लेते हैं, जिससे हाथ में मिलने वाली राशि और भी कम हो जाती है. इसके अलावा किराया, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और असुरक्षित कार्य परिस्थितियां उनकी परेशानियों को और बढ़ा देती हैं.
पलायन नहीं थम रहा
रोजगार के सीमित अवसरों के कारण झारखंड से पलायन लगातार जारी है. महिलाएं बेहतर जीवन की उम्मीद लेकर तेलंगाना पहुंचती हैं, लेकिन कम वेतन और कठिन परिस्थितियों के बीच उनका संघर्ष जारी रहता है.
महिला मजदूरों के लिए बेहतर व्यवस्था की मांग
सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों का कहना है कि केंद्र और राज्य सरकारों को प्रवासी महिला मजदूरों के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए. महिला श्रमिकों के लिए हॉस्टल, क्रेच, स्वास्थ्य सुविधाएं और न्यूनतम 18 हजार रुपये मासिक मजदूरी जैसी व्यवस्थाएं सुनिश्चित की जाएं, ताकि उन्हें सम्मानजनक जीवन और सुरक्षित कार्य वातावरण मिल सके.

