RANCHI : सच-सच बतायगा…कभी किसी नाके या चौराहे से निकले हो और बिना बात के पुलिस वाले से दो-चार ‘प्यार भरे’ अपशब्द यानी गालियां ना खाई हों ऐसा तो हुआ नही होगा? सड़क पर बाइक का इंडिकेटर देना भूल जाओ या हेलमेट का फीता थोड़ा ढीला रह जाए, चालान की पर्ची तो बाद में हाथ में आती है, पहले ऐसी-ऐसी बातें सुनने को मिलती हैं कि बंदा सोचे ‘भाई, मैंने किसी का मर्डर कर दिया क्या? और थाने का हाल तो पूछो ही मत! गलती से अपनी ही चोरी हुई बाइक की रिपोर्ट लिखाने पहुंच जाओ, तो दरोगा जी ऐसे घूरते हैं जैसे गुनाह चोर ने नहीं, तुमने थाने का दरवाजा खटखटा के कर दिया हो.

अमीरों के आगे ‘जी हुजूर’, आम जनता पर तू-तड़ाक
अब सबसे बड़ा तमाशा देखो! वही पुलिस वाले जो किसी सफेदपोश, नेताजी या बड़ी गाड़ी वाले रसूखदार को देखते ही हाथ जोड़कर ‘जी सर, हां जी सर’ करने लगते हैं, वही सड़क पर चल रहे एक सीधे-सादे टैक्सपेयर को देखते ही सीधे ‘तू-तड़ाक’ और मां-बहन की गालियों पर उतर आते हैं. मतलब सीन ऐसा बन गया है कि क्या गाली बकना अब खाकी का कोई ऑफिशियल स्वैग या स्टाइल बन चुका है?
क्या वर्दी पहनते ही कुछ भी बोलने की छूट मिल जाती है?
अब जरा कायदे-कानून की बात भी समझ लो, क्योंकि संविधान में ऐसा कोई झोल नहीं है:
- तमीज से बात करना कोई एहसान नहीं, नियम है : सुप्रीम कोर्ट से लेकर पुलिस की अपनी नियमावली तक, सबमें साफ लिखा है कि पब्लिक के साथ इज्जत से पेश आना पुलिस की पहली जिम्मेदारी है.
- गाली देना सीधा-सीधा जुर्म है : कानून की किताबों में साफ-साफ दर्ज है कि सड़क पर किसी भी नागरिक को बेवजह धमकाना, गालियां देना या बेइज्जत करना दंडनीय अपराध है.
- वर्दी कोई कवच नहीं : जो कानून आम आदमी को शांति और तमीज बनाए रखने को कहता है, वही कानून वर्दी वाले पर भी उतना ही लागू होता है. खाकी पहनने से किसी को बदजुबानी का फ्री-पास नहीं मिल जाता भाई!
तो फिर ये बदतमीजी रुकती क्यों नहीं?
सब जानते हैं कि गाली देना गलत है, फिर भी हर चौराहे पर ये ड्रामा रोज क्यों चलता है? इसके पीछे के तीन बड़े पंगे समझो:
- अंग्रेजों के जमाने वाला हैंगओवर : अंग्रेजों ने पुलिस इसलिए बनाई थी ताकि जनता को डरा-धमका कर दबाया जा सके. देश को आजाद हुए अरसा बीत गया, लेकिन सिस्टम के दिमाग से वो ‘माई-बाप’ वाला नशा आज तक नहीं उतरा. आज भी कई जगह पुलिस वाले पब्लिक को ‘नागरिक’ नहीं, अपनी ‘रैयत’ समझते हैं.
- 14 घंटे की ड्यूटी की फ्रस्ट्रेशन : पुलिस महकमे की अपनी रोना-धोना रहता है भाई, 14-16 घंटे ड्यूटी करते हैं, छुट्टी मिलती नहीं, स्टाफ कम है और दिमाग पर 24 घंटे टेंशन रहती है. पर बात वही है ना बॉस, डिपार्टमेंट की कमियों और अपने फ्रस्ट्रेशन का गुस्सा सड़क पर चल रहे किसी शरीफ आदमी पर क्यों झाड़ना?
- ज्यादा हीरो मत बन, सरकारी काम में रुकावट का केस ठोक दूंगा : असली खेल ग्राउंड पर यहीं शुरू होता है. जब भी कोई पढ़ा-लिखा बंदा अपने हक की बात करता है या मोबाइल निकाल कर बदसलूकी रिकॉर्ड करने लगता है, तुरंत धमकी मिलती है फोन अंदर रख, अभी सरकारी काम में बाधा डालने की धारा लगा दूंगा. बस इसी फर्जी केस के डर से आम आदमी चुपचाप बेइज्जती का घूंट पीकर निकल लेता है.
जनता की सुरक्षा या आत्मसम्मान का रोज तमाशा?
हम जिस देश में रहते हैं, वहां संविधान ने हर इंसान को इज्जत के साथ जीने का पूरा हक दिया है. फिर अपनी जेब से पाई-पाई टैक्स भरने वाला आम आदमी उसी पुलिस से डरकर और जलील होकर कब तक चलेगा, जिसकी सैलरी उसी के टैक्स से कटती है? वर्दी का असली मतलब सुरक्षा और भरोसा होता है भाई, सड़कछाप दबंगई नहीं. जब तक गाली-गलौज करने वाले अफसरों पर सच में गाज नहीं गिरेगी, तब तक ‘मित्र पुलिस’ की बातें सिर्फ दीवारों पर लिखे सरकारी स्लोगन तक ही सिमट कर रह जाएंगी.
