NEW DELHI/RANCHI : सुप्रीम कोर्ट ने शादी का वादा करके शारीरिक संबंध बनाने से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल इस वजह से कि बाद में शादी नहीं हो सकी, यह मान लेना पर्याप्त नहीं है कि आरोपी ने शुरुआत से ही शादी का झूठा वादा किया था. मामला गुजरात का है. एक महिला ने आरोप लगाया था कि आरोपी ने उससे शादी का वादा किया और इसके बाद उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए. महिला के अनुसार, बाद में आरोपी ने अपनी मां की असहमति का हवाला देते हुए शादी करने से इनकार कर दिया. महिला की शिकायत के आधार पर आरोपी के खिलाफ FIR दर्ज की गई थी. मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचने पर अदालत ने FIR को रद्द कर दिया.
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा
अदालत ने शिकायत में दर्ज घटनाक्रम और उपलब्ध तथ्यों का विश्लेषण किया. कोर्ट ने पाया कि दोनों के बीच संबंध सहमति से बने थे और शिकायत में ऐसा कोई ठोस तथ्य नहीं था, जिससे यह साबित हो कि आरोपी ने शुरुआत से ही महिला से शादी करने का इरादा नहीं रखा था. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि बाद में किसी परिस्थिति के कारण शादी नहीं हो पाती है, तो प्रत्येक ऐसे मामले को शादी का झूठा वादा मानकर आपराधिक मामला नहीं बनाया जा सकता.
BNS की धारा 69 का भी किया जिक्र
अदालत ने भारतीय न्याय संहिता यानी BNS की धारा 69 के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की. यह धारा धोखे से या किसी अन्य माध्यम से महिला की सहमति प्राप्त करके यौन संबंध बनाने को अपराध के दायरे में लाती है, जब मामला धारा में निर्धारित परिस्थितियों के अंतर्गत आता है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 69 लागू करने के लिए केवल शादी का वादा और बाद में शादी न होना पर्याप्त नहीं है. यह भी स्थापित होना चाहिए कि आरोपी का शुरुआत से ही शादी करने का इरादा नहीं था और इसी झूठे वादे के आधार पर महिला की सहमति प्राप्त की गई थी.
शादी का वादा और झूठा वादा अलग-अलग
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अदालत ने शादी का वादा करने और शुरुआत से ही शादी के नाम पर धोखा देने के बीच अंतर स्पष्ट किया है. यदि किसी व्यक्ति ने संबंध बनाते समय वास्तव में शादी करने का इरादा रखा था, लेकिन बाद में परिस्थितियां बदल गईं और शादी नहीं हो सकी, तो केवल इस आधार पर उसे यह नहीं कहा जा सकता कि उसने शुरुआत से ही झूठा वादा किया था. हालांकि, यदि उपलब्ध साक्ष्यों से यह साबित होता है कि आरोपी ने शुरुआत से ही शादी करने का कोई इरादा नहीं रखा था और केवल शारीरिक संबंध बनाने के लिए शादी का झूठा वादा किया था, तो मामला अलग हो सकता है.
फैसले का क्या मतलब है
इस फैसले से यह स्पष्ट होता है कि ऐसे मामलों में अदालत केवल यह नहीं देखेगी कि शादी हुई या नहीं. अदालत आरोपी की शुरुआती मंशा, शिकायत में दर्ज घटनाक्रम और उपलब्ध साक्ष्यों को भी देखेगी.यानी शादी का वादा पूरा न होना और शुरुआत से ही शादी का झूठा वादा करना, दोनों कानूनी रूप से एक जैसी स्थिति नहीं हैं. हालांकि, इस फैसले का प्रभाव हर मामले पर स्वतः लागू नहीं होगा. प्रत्येक मामले का निर्णय उसके अपने तथ्यों, परिस्थितियों और साक्ष्यों के आधार पर किया जाएगा.
