RANCHI : कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खुली बहस की चुनौती दी है. इस चुनौती को दिए गए 36 घंटे बीत जाने के बाद भी प्रधानमंत्री की ओर से कोई सीधा जवाब सामने नहीं आया है. हालांकि, भाजपा के कई नेता राहुल गांधी की चुनौती पर बयान दे रहे हैं, लेकिन प्रधानमंत्री की चुप्पी ने राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया है. सवाल सिर्फ राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी के बीच बहस का नहीं है, बल्कि देश के लोकतंत्र में जवाबदेही की भूमिका का भी है. क्या लोकतंत्र का मतलब केवल पांच साल में एक बार मतदान करना है, या फिर जनता को हर दिन अपनी चुनी हुई सरकार से सवाल पूछने का अधिकार भी है?
दरअसल, देश की राजनीति में इन दिनों विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है. विपक्ष पर विदेशी कनेक्शन को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं, वहीं केंद्रीय गृह मंत्री की ओर से विशेष सत्र बुलाने की बात कही जा रही है. दूसरी तरफ विपक्ष का आरोप है कि संसद में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को अपनी बात रखने और सरकार से सवाल पूछने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया जाता. ऐसे में राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मीडिया और देश के युवाओं के सामने खुली बहस करने की चुनौती दी है. लेकिन इस चुनौती के बीच एक बड़ा सवाल यह भी खड़ा होता है कि क्या प्रधानमंत्री वास्तव में ऐसी किसी खुली बहस के लिए तैयार होंगे?
2014 से अब तक प्रेस कॉन्फ्रेंस को लेकर उठते रहे हैं सवाल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कामकाज के तरीके पर विपक्ष लंबे समय से सवाल उठाता रहा है. खासकर पत्रकारों के सीधे सवालों का सामना करने और खुली प्रेस कॉन्फ्रेंस करने को लेकर उनकी आलोचना होती रही है. आलोचकों का कहना है कि साल 2014 में सत्ता संभालने के बाद प्रधानमंत्री ने ऐसी नियमित और खुली प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की है, जहां पत्रकारों को बिना किसी पूर्व निर्धारित सीमा के सीधे सवाल पूछने का अवसर मिले.
प्रधानमंत्री हर महीने रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ के जरिए देश को संबोधित करते हैं. इस कार्यक्रम के माध्यम से सरकार की योजनाओं, उपलब्धियों और विभिन्न सामाजिक मुद्दों पर अपनी बात रखते हैं. लेकिन विपक्ष का सवाल है कि जब प्रधानमंत्री देश की जनता से संवाद करते हैं, तो उस संवाद में जनता और पत्रकारों के सवालों के लिए जगह क्यों नहीं होती? ‘मन की बात’ में प्रधानमंत्री अपनी बात रखते हैं, लेकिन यह संवाद एकतरफा होता है. इसमें न तो पत्रकारों को तत्काल सवाल पूछने का अवसर मिलता है और न ही जनता प्रधानमंत्री से सीधे जवाब मांग सकती है.
दो करोड़ रोजगार का वादा, पेपर लीक और टैक्स के पैसे पर सवाल
राहुल गांधी की बहस की चुनौती के बीच सरकार की जवाबदेही से जुड़े कई पुराने सवाल भी फिर चर्चा में हैं. हर साल दो करोड़ रोजगार देने के वादे को लेकर विपक्ष लगातार सरकार को घेरता रहा है. देश का युवा रोजगार की तलाश में है. प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक की घटनाएं भी युवाओं की चिंता बढ़ाती रही हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि युवाओं को पर्याप्त रोजगार कब मिलेगा? प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता कैसे सुनिश्चित होगी? पेपर लीक जैसी घटनाओं पर प्रभावी रोक कब लगेगी? और जनता के टैक्स से जमा होने वाले पैसे का इस्तेमाल किन योजनाओं पर और किस तरह किया जा रहा है?
ये ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब जनता अपनी चुनी हुई सरकार से चाहती है. लोकतंत्र में सरकार की उपलब्धियों का प्रचार जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी उसकी नीतियों और फैसलों पर सवाल उठाना भी है.
अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह के दौर की याद क्यों?
देश की राजनीति में एक दौर ऐसा भी रहा है, जब प्रधानमंत्री मीडिया के सामने बैठकर पत्रकारों के सवालों का सामना करते थे. पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में कई मौकों पर पत्रकारों ने सरकार और प्रधानमंत्री से सीधे सवाल पूछे.

मीडिया की भूमिका केवल सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाना नहीं, बल्कि सरकार से जवाब मांगना भी है. पत्रकारों के सवाल दरअसल जनता की जिज्ञासाओं और परेशानियों को सामने रखते हैं. इसी आधार पर विपक्ष प्रधानमंत्री मोदी की मीडिया से दूरी को लेकर सवाल उठाता रहा है. विपक्ष का तर्क है कि जब सरकार लोकतंत्र और पारदर्शिता की बात करती है, तो उसे आलोचनात्मक सवालों का सामना करने से पीछे नहीं हटना चाहिए.
17 मई 2019, जब मोदी ने अमित शाह की ओर बढ़ा दिया था माइक
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रेस कॉन्फ्रेंस को लेकर चर्चा होती है, तो 17 मई 2019 की घटना का जिक्र भी सामने आता है. लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा मुख्यालय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस में शामिल हुए थे. पत्रकारों को उम्मीद थी कि प्रधानमंत्री उनके सवालों का सीधे जवाब देंगे.
लेकिन जब पत्रकारों ने प्रधानमंत्री से सवाल पूछे, तो उन्होंने खुद जवाब देने के बजाय माइक अमित शाह की ओर बढ़ा दिया. इस दौरान प्रधानमंत्री ने कहा था, “मैं अनुशासन का पालन करने वाला सिपाही हूं. इसके बाद अमित शाह ने पत्रकारों के सवालों का जवाब दिया. इस घटना को लेकर विपक्ष और आलोचकों ने प्रधानमंत्री पर सीधे सवालों से बचने का आरोप लगाया था.
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लोकतंत्र में भाषण ही नहीं, जवाबदेही भी जरूरी
सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप राजनीति का हिस्सा हैं. विपक्ष पर आरोप लगाना या चुनावी रैलियों में सरकार की उपलब्धियां गिनाना किसी भी राजनीतिक दल के लिए मुश्किल नहीं है. लेकिन लोकतंत्र की असली परीक्षा तब होती है, जब सरकार से असहज सवाल पूछे जाते हैं और उसे उनका जवाब देना पड़ता है. देश का प्रधानमंत्री केवल सरकार का प्रमुख नहीं होता, बल्कि करोड़ों लोगों की उम्मीदों और विश्वास का प्रतिनिधि भी होता है. इसलिए उससे सवाल पूछना किसी राजनीतिक दल का विशेषाधिकार नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है.

राहुल गांधी की चुनौती पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी क्या जवाब देते हैं, यह देखना बाकी है. लेकिन इस पूरे विवाद ने एक बार फिर देश के सामने बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है.क्या प्रधानमंत्री केवल ‘मन की बात’ के जरिए देश को अपनी बात सुनाते रहेंगे, या कभी जनता के सवालों का सामना करने के लिए भी खुलकर सामने आएंगे? क्योंकि लोकतंत्र में जनता को केवल सरकार चुनने का अधिकार नहीं होता, बल्कि चुनी हुई सरकार से सवाल पूछने का अधिकार भी होता है। और यही अधिकार लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है.
