RANCHI/CHAIBASA : झारखंड में PESA कानून लागू होने के बाद गांवों की ग्रामसभाओं को अपने इलाके के संसाधनों पर अधिकार देने की बात कही जा रही है. लेकिन पश्चिमी सिंहभूम जिले के चिटीमिटी गांव में अब इसी अधिकार को लेकर विवाद खड़ा हो गया है. गांव की पारंपरिक ग्रामसभा अपने इलाके के बालू घाट का संचालन खुद करना चाहती है. लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि जब उन्होंने इसकी शुरुआत की, तो पुलिस ने उन्हें रोक दिया.

मामला टोंटो प्रखंड के चिटीमिटी गांव का है. ग्रामसभा ने इस संबंध में ग्रामीण विकास विभाग के प्रधान सचिव को पत्र लिखकर शिकायत की है. ग्रामीणों का आरोप है कि टोंटो थाना प्रभारी ने गांव पहुंचकर बालू घाट के संचालन पर रोक लगाई, चालान बुक छीन ली और ग्रामीणों को गिरफ्तारी की धमकी दी.
14 अक्टूबर को ग्रामसभा ने लिया था फैसला
ग्रामसभा की ओर से दिए गए आवेदन के मुताबिक, 14 अक्टूबर 2026 को गांव में ग्रामीण मुंडा जगन्नाथ सावैया की अध्यक्षता में बैठक हुई थी. इस बैठक में गांव के लोगों ने मिलकर फैसला लिया कि गांव के बालू घाट का संचालन ग्रामसभा खुद करेगी. ग्रामीणों का कहना है कि PESA नियमावली 2025 के तहत ग्रामसभा को अपने क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों की देखरेख और उनके इस्तेमाल से जुड़े फैसले लेने का अधिकार दिया गया है. इसी आधार पर ग्रामसभा ने बालू घाट के संचालन के लिए 37 नियम भी बनाए. बैठक में लिए गए फैसले की जानकारी जिला प्रशासन और संबंधित विभागों को भी भेजी गई थी.
28 अक्टूबर को गांव पहुंचे थाना प्रभारी, चालान बुक छीनने का आरोप

ग्रामसभा के आवेदन में बताया गया है कि 28 अक्टूबर 2026 को दोपहर करीब 12 बजे टोंटो थाना प्रभारी गांव पहुंचे. आरोप है कि उन्होंने ग्रामीणों से कहा कि सरकार से अनुमति मिलने तक बालू घाट का संचालन नहीं किया जा सकता. ग्रामीणों का आरोप है कि इस दौरान थाना प्रभारी ने ग्रामसभा की चालान बुक छीन ली और बालू उठाव के लिए रसीद काटने से मना कर दिया. साथ ही ग्रामीणों को गिरफ्तारी की धमकी भी दी गई.
इसके बाद से गांव में नाराजगी है. ग्रामसभा का सवाल है कि जब गांव के लोगों ने बैठक करके फैसला लिया और प्रशासन को इसकी जानकारी भी दी, तो फिर उनके काम को क्यों रोका जा रहा है?
आखिर PESA कानून क्या अधिकार देता है?
PESA कानून का मकसद अनुसूचित क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी समुदायों को अपने गांव के फैसले खुद लेने का अधिकार देना है. झारखंड सरकार ने PESA नियमावली 2025 के जरिए ग्रामसभाओं की भूमिका और अधिकारों को स्पष्ट किया है. इसके तहत गांव के जल, जंगल, जमीन और दूसरे सामुदायिक संसाधनों के प्रबंधन में ग्रामसभा की महत्वपूर्ण भूमिका है. बालू घाट को लेकर भी नियमावली में प्रावधान किए गए हैं. नियम 30 के मुताबिक, तय शर्तों को पूरा करने वाले Category-1 बालू घाट ग्रामसभाओं को सौंपे जा सकते हैं. ऐसे घाटों का संचालन ग्रामसभा कर सकती है. हालांकि, हर बालू घाट पर ग्रामसभा को अपने आप अधिकार नहीं मिल जाता. इसके लिए संबंधित घाट का Category-1 में होना और नियमों के मुताबिक उसे ग्रामसभा को सौंपा जाना जरूरी है.
मुख्यमंत्री और जिला प्रशासन से लगाई न्याय की गुहार
इस मामले को सोशल मीडिया पर भी उठाया गया है. मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, पश्चिमी सिंहभूम के उपायुक्त और चाईबासा पुलिस को टैग करते हुए ग्रामसभा के अधिकारों को लेकर सवाल पूछे गए हैं. सोशल मीडिया पर कहा गया है कि जब सरकार ने PESA नियमावली लागू कर ग्रामसभाओं को अधिकार देने की बात कही है, तो फिर उनके फैसलों में रुकावट क्यों डाली जा रही है? ग्रामसभा ने सरकार से पूरे मामले की जांच कराने, चालान बुक वापस दिलाने और ग्रामीणों को धमकी देने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की है.
अब सवाल प्रशासन से है…
अगर PESA कानून के तहत ग्रामसभा को बालू घाट के प्रबंधन का अधिकार है, तो फिर चिटीमिटी गांव में उसे काम करने से क्यों रोका जा रहा है? वहीं, क्या संबंधित बालू घाट को सरकार ने ग्रामसभा को सौंपा है? क्या ग्रामसभा ने सभी जरूरी नियमों और सरकारी प्रक्रियाओं का पालन किया है? इन सवालों का जवाब जिला प्रशासन को देना होगा. फिलहाल ग्रामसभा ने सरकार से न्याय की गुहार लगाई है. अब देखना होगा कि प्रशासन इस मामले में क्या कार्रवाई करता है और गांव के लोगों को उनका अधिकार मिल पाता है या नहीं.
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