RANCHI / KHUNTI : सपने देखने के लिए हौसले की जरूरत होती है और उन्हें पूरा करने के लिए संघर्ष की. लेकिन जब संघर्ष के बीच आर्थिक तंगी भी आड़े आने लगे, तो रास्ता और कठिन हो जाता है. झारखंड के खूंटी की रहने वाली आदिवासी छात्रा सुकर्मणी टूटी की कहानी कुछ ऐसी ही है. एक पैर से दिव्यांग सुकर्मणी तीरंदाजी की खिलाड़ी हैं और राष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा दिखाना चाहती हैं. लेकिन उनका कृत्रिम पैर टूट जाने के कारण अब उन्हें चलने-फिरने में भी काफी परेशानी हो रही है.
सुकर्मणी कालामाटी स्थित कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय की छात्रा हैं. वह कृत्रिम पैर के सहारे चलती थीं. इसी के सहारे अपनी पढ़ाई और खेल की गतिविधियों को जारी रखे हुए थीं. लेकिन अब उनका कृत्रिम पैर टूट गया है। इसकी वजह से उनकी रोजमर्रा की गतिविधियां प्रभावित हो रही हैं.
16 दिसंबर से कोच्चि में पैरा नेशनल गेम्स, हिस्सा लेना चाहती हैं सुकर्मणी
सुकर्मणी के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती 16 दिसंबर से केरल के कोच्चि में होने वाले पैरा नेशनल गेम्स में शामिल होने की है. वह इस प्रतियोगिता में हिस्सा लेकर तीरंदाजी के क्षेत्र में अपनी प्रतिभा दिखाना चाहती हैं. इसके लिए उन्हें एक नए कृत्रिम पैर की जरूरत है. लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि वह आसानी से कृत्रिम पैर का खर्च उठा सके. ऐसे में सुकर्मणी की खेल यात्रा आर्थिक तंगी और शारीरिक परेशानी के बीच फंसती नजर आ रही है.

पिता दिहाड़ी मजदूर, भाई रोजगार के लिए मुंबई में
सुकर्मणी के परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर है. उनके पिता दिहाड़ी मजदूरी करके परिवार का भरण-पोषण करते हैं. वहीं, रोजगार की तलाश में उनका भाई मुंबई पलायन कर चुका है. परिवार की सीमित आमदनी में घर का खर्च चलाना ही चुनौती है. ऐसे में कृत्रिम पैर की व्यवस्था करना और कोच्चि में होने वाली राष्ट्रीय प्रतियोगिता में शामिल होने का खर्च उठाना परिवार के लिए मुश्किल हो रहा है.
मदद मिले तो राष्ट्रीय स्तर पर दिखा सकती हैं प्रतिभा
सुकर्मणी की कहानी केवल एक खिलाड़ी के संघर्ष की कहानी नहीं है, बल्कि उन चुनौतियों की भी याद दिलाती है, जिनका सामना आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को करना पड़ता है. एक तरफ सुकर्मणी के भीतर तीरंदाजी में आगे बढ़ने का जुनून है, तो दूसरी तरफ संसाधनों की कमी उनकी राह रोक रही है. उन्हें नए कृत्रिम पैर के साथ आर्थिक सहयोग की जरूरत है, ताकि वह कोच्चि पहुंचकर पैरा नेशनल गेम्स में हिस्सा ले सकें.
अब जरूरत है कि प्रशासन, खेल विभाग, सामाजिक संगठनों और सक्षम लोगों की नजर सुकर्मणी की परेशानी पर पड़े. समय रहते मदद मिलती है, तो खूंटी की यह आदिवासी बेटी अपने सपनों की दिशा में एक और कदम बढ़ा सकती है. सुकर्मणी को सिर्फ सहानुभूति नहीं, बल्कि सहयोग की जरूरत है. एक कृत्रिम पैर की व्यवस्था और थोड़ी आर्थिक मदद उनके लिए राष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा दिखाने का रास्ता खोल सकती है.
