RANCHI : बड़ी-बड़ी इमारतें, आलीशान कमरे और नेताओं की तस्वीरें. लेकिन पत्रकारों के बैठने पर रोक क्यों? रांची स्थित बीजेपी प्रदेश कार्यालय के मीडिया विभाग के दरवाजे पर चिपके एक नोटिस ने पत्रकारों और राजनीतिक संचार के तौर-तरीकों को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं. पत्रकारों का काम सिर्फ नेताओं के बयान रिकॉर्ड करना और प्रेस रिलीज को खबर में बदल देना नहीं है. सवाल पूछना, अलग-अलग पक्षों को सुनना और सत्ता-संगठन के दावों की पड़ताल करना भी पत्रकारिता का हिस्सा है. लेकिन जब किसी राजनीतिक दल के मीडिया विभाग के दरवाजे पर पत्रकारों को बिना जरूरी काम के नहीं बैठने की हिदायत वाला नोटिस चिपका हो, तो चर्चा होना स्वाभाविक है. रांची के हरमू रोड स्थित बीजेपी प्रदेश कार्यालय के मीडिया विभाग में ऐसा ही एक नोटिस लगाया गया है. नोटिस में पत्रकारों से बिना आवश्यक काम के वहां बैठकर अपना और मीडिया विभाग के सदस्यों का समय बर्बाद नहीं करने का आग्रह किया गया है.

‘प्रिय बंधु’ से शुरुआत, लेकिन संदेश पर बहस
नोटिस की शुरुआत ‘प्रिय बंधु’ संबोधन से होती है. आगे पत्रकारों से अनावश्यक रूप से मीडिया विभाग में नहीं बैठने की अपील की गई है. शब्दों के स्तर पर यह एक आग्रह है, लेकिन इसके व्यावहारिक मायने क्या हैं? क्या पत्रकारों के लिए पार्टी कार्यालय में बैठकर जानकारी जुटाने की गुंजाइश सीमित की जा रही है, या यह सिर्फ कामकाज को व्यवस्थित करने की कोशिश है? इस अंतर को समझने के लिए बीजेपी मीडिया विभाग का पक्ष भी जरूरी है.
पत्रकारों के लिए राजनीतिक दलों के कार्यालय महज बयान लेने की जगह नहीं होते. वहीं से उन्हें कार्यक्रमों, संगठन की गतिविधियों, नेताओं की प्रतिक्रियाओं और राजनीतिक घटनाक्रम से जुड़ी जानकारी मिलती है. कई बार किसी खबर का अहम सुराग औपचारिक प्रेस कॉन्फ्रेंस में नहीं, बल्कि बातचीत के दौरान मिलता है.
पत्रकारिता सिर्फ कैमरा ऑन करने और बाइट लेने तक सीमित नहीं
मान लीजिए, किसी नेता ने कैमरे के सामने एक बयान दिया. पत्रकार ने उसे रिकॉर्ड किया और खबर चला दी. लेकिन उस बयान के पीछे की कहानी क्या है? क्या पार्टी के भीतर कोई मतभेद है? क्या किसी फैसले से स्थानीय लोग नाराज हैं? क्या नेता के दावे की पुष्टि दस्तावेजों से होती है? इन सवालों के जवाब तलाशना भी पत्रकारिता का हिस्सा है.
यही वजह है कि मीडिया और राजनीतिक दलों के बीच संबंध केवल बयान देने और खबर चलाने तक सीमित नहीं रह सकते. राजनीतिक दलों को अपना पक्ष रखने का अधिकार है, वहीं पत्रकारों की भूमिका सवाल पूछने और स्वतंत्र रूप से तथ्यों की जांच करने की है.

आलीशान कार्यालय बनाम पत्रकारों के लिए जगह का सवाल
यहां असली सवाल केवल कुर्सी या कमरे का नहीं है. सवाल यह है कि राजनीतिक दल मीडिया के साथ किस तरह का संवाद चाहते हैं. क्या संवाद सिर्फ तय कार्यक्रमों, प्रेस नोट और रिकॉर्डेड बयानों तक सीमित रहेगा, या पत्रकारों को स्वतंत्र सवाल पूछने और अतिरिक्त जानकारी जुटाने का अवसर भी मिलेगा?
अब जवाब जरूरी है
राजनीतिक दलों के लिए मीडिया विभाग का उद्देश्य पत्रकारों तक सही जानकारी पहुंचाना और पार्टी का पक्ष स्पष्ट करना होता है. वहीं, पत्रकारों का दायित्व है कि वे केवल उपलब्ध कराई गई जानकारी पर निर्भर न रहें, बल्कि जरूरी सवाल पूछें और खबर के सभी पक्षों की जांच करें.
रांची के बीजेपी कार्यालय में लगाए गए नोटिस को लेकर अब सबसे अहम सवाल यही है कि क्या यह केवल कार्यालय के कामकाज को व्यवस्थित करने का निर्देश है, या पत्रकारों के साथ संवाद के तरीके में बदलाव का संकेत? इसका स्पष्ट जवाब बीजेपी मीडिया विभाग की प्रतिक्रिया और इस निर्देश के व्यावहारिक असर से ही मिल सकेगा. क्योंकि लोकतंत्र में प्रेस और राजनीतिक संगठनों के बीच संवाद जरूरी है. लेकिन इस संवाद की मजबूती केवल बाइट की उपलब्धता से नहीं, बल्कि सवाल पूछने और जवाब देने की गुंजाइश से भी तय होती है.
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